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‘अकविता’ आंदोलन के समय उभरे हिंदी के चर्चित कवि। मरणोपरांत साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

‘अकविता’ आंदोलन के समय उभरे हिंदी के चर्चित कवि। मरणोपरांत साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

धूमिल का परिचय

उपनाम : 'धूमिल'

मूल नाम : सुदामा पांडेय धूमिल

जन्म : 09/11/1936 | वाराणसी, उत्तर प्रदेश

निधन : 10/02/1975 | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

साठोत्तरी कविता में ‘धूमिल’ का उदय एक महत्त्वपूर्ण घटना की तरह हुआ। धूमिल के रूप में नई कविता और अकविता के किसी संक्रमण सुरंग से हाथ में औज़ार लिए हिंदी कविता का एक वास्तविक मज़दूर-किसान सामने आया था जिसने अपने औज़ार हथियार की तरह समकालीन कविता-विमर्श पर तान दिए थे। लेकिन उसके औज़ार हथियार नहीं हैं। वह स्वयं आगाह करते हुए कहते हैं कि ‘‘शब्द और शस्त्र के व्यवहार का व्याकरण अलग-अलग है। शब्द अपने वर्ग-मित्रों में कारगर होते हैं और शस्त्र अपने वर्ग-शत्रु पर।’’ उनका आक्रोश अकविता, क्रुद्ध युवा पीढ़ी, श्मशानी या भूखी पीढ़ी के आक्रोश से इस मायने में भिन्न था कि इसके मूल में शोषण से मुक्ति की प्रबल आकांक्षा मौजूद थी। उनका आक्रोश एक पूरी पीढ़ी, वर्ग और युग का आक्रोश भी था जो कविता, विमर्श, राजनीति में मुखर हो रहा था। 

‘धूमिल’ उपनाम उन्होंने ख़ुद चुना था। उनका मूल नाम सुदामा पांडेय था। उनका जन्म 9 नवंबर 1936 को वाराणसी के खेवली ग्राम में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। परिवार का जीविकोपार्जन किसानी और दुकानी पर निर्भर था। उनकी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा गाँव में ही हुई। तेरह वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह भी संपन्न हो गया। वह उच्च शिक्षा का कुछ सोचते, तभी पिता की मृत्यु से परिवार का उत्तरदायित्व उनके कँधे पर आ गया। उन्होंने कलकत्ता के एक लोहे के कारख़ाने में मज़दूरी की, फिर कुछ समय बाद एक ट्रेड कंपनी की नौकरी करने लगे। बाद में उन्होंने आईटीआई से इलेक्ट्रिक डिप्लोमा किया और अनुदेशक की नौकरी करने लगे। इन कुछ रोज़गार अवसरों से गुज़रते व्यवस्था और पूँजीवादी संरचना के प्रति उनका आक्रोश गहरा ही होता गया। व्यवस्था-विरोध उनके स्वभाव और उनकी कविता की एक विशेष प्रवृत्ति ही रही। उनकी कविताओं में यहाँ-वहाँ नज़र आती ‘अराजकता’ युगीन प्रभाव की देन भी है। नक्सलबाड़ी स्वच्छंदता का प्रभाव उस दौर के कई निम्नमध्यमवर्गीय कवियों में प्रकट हुआ है। ‘धूमिल’ के दृष्टिकोण की कुछ सीमितता उच्च शिक्षा और एक्सपोज़र के अभाव के कारण भी है। 

धूमिल की अपनी विशिष्ट काव्य-भाषा है जिसमें आमफ़हम शब्दों का बहुलता से प्रयोग हुआ है। उनकी कविताओं की सफलता और लोकप्रियता में बिंबों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है जो प्रखर और ताज़े हैं। उनकी काव्य-भाषा की एक अन्य विशेषता बार-बार प्रकट होने वाले सामान्यीकरण हैं जो उनकी कविता में ‘ड्रामा’ के तत्वों का प्रवेश कराते हैं। देश की आज़ादी से मोहभंग उनकी कविताओं में अत्यंत तीक्ष्णता से अभिव्यक्त हुआ है और ये कविताएँ उन तमाम नैतिकताओं, भद्रताओं से लोहा लेती हैं जिनका इस्तिमाल शासन अपनी रक्षा के लिए करता है। उनकी भाषा की सरलता और प्रवाह उन्हें लोकप्रिय कविताओं में शुमार कराती है। उनके विषयों में आम जीवन, उसके संघर्ष और प्रतिरोध के सभी चित्र मौजूद हैं। 

धूमिल का 39 वर्ष की अल्पायु में ब्रेन ट्यूमर से निधन हो गया। उनके जीवनकाल में उनका एक ही काव्य-संग्रह ‘संसद से सड़क तक’ (1972) प्रकाशित हो सका था। मरणोपरांत उनके दो अन्य संग्रह ‘कल सुनना मुझे’ (1977) और ‘सुदामा पाँडे का प्रजातंत्र’ (1984) संकलित हुए। गद्य विधा में उनकी सात कहानियाँ और दर्जनाधिक निबंध विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उनकी डायरी, पत्रों और उनपर लिखे गए संस्मरणों से उनके व्यक्तित्व पर प्रकाश पड़ता है। इसके साथ ही ये उनकी कविताओं तक पहुँच के ‘टूल्स’ के रूप में भी काम आते हैं। इसके साथ ही उन्होंने अनुवाद और नाट्यलेखन में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। 

उनके मरणोपरांत ‘कल सुनना मुझे’ काव्य संग्रह के लिए उन्हें वर्ष 1979 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।