हमहूँ छी एही समाजमे,
जकरा खातिर गान्धी बाबा तिल-तिल जीवन अर्पण कयलनि,
जकरा खातिर सहस-सहस बलिदानी रक्तेँ तर्पण कयलनि,
जकरा खातिर कते माय-बहिनिक सिउँथिक सिन्दूर मेटायल,
ज़करा खातिर कते मनीषी लाठी खा-खा भूमि लेटायल,
जकरा खातिर श्वास-श्वाससँ एक प्रबल फूत्कार उठल छल,
जकरा खातिर प्राण-प्राणसँ प्रलयङ्कर हूंकार उठल छल,
ताहि दिनुक देखल सपना की एखनहुँ धरि साकार भेल अछि?
युग-युगसँ कुण्ठित समाजकेर एखनहुँ धरि उद्धार भेल अछि?
अपनहुँ छी एही समाजमे
जन्म-सिद्ध अधिकार सभक थिक ई स्वतन्त्रता,
देश-समाजक अहंकार नहि थिक स्वतन्त्रता,
करबा लय उपभोग तकर हम लै छी पक्कड़,
एतबे टा बुझबामे सब छी लाल बुझक्कड़,
औँड़ि मारि रहलहुँ सुख-सुविधा पयबा लय हम,
किन्तु न छी तैयार तत्त्व दिस जयबा लय हम
ई समाज स्वाधीनताक की मोल बुझैए?
स्वार्थ-सिद्धि लग हमरो ने भरि टोल सुझैए
नहि आवश्यक वस्तु तुबै छै, आसमानसँ,
नहि उपभोग्य पदार्थ चुबै छै संविधानसँ,
एहि हेतु देशक श्रम-धन अनिवार्य होइत छै,
एहि हेतु प्रत्येक डेग सुविचार्य होइत छै,
हू-हू कयलासँ नहि बढ़इत छै कोनो देशक उत्पादन,
गाल बजौने रचना-मूलक काजक नहि होइ छै सम्पादन।
ओहो छथि एही समाजमे,
भोगवाद कोनो समाजकेँ चिबा जाइ छै
अपन कुकर्मे अपने गर्दनि दबा जाइ छै
भोगवाद सौँसे समाजमे वस्त्र फोलि कऽ नाचि रहल अछि,
भोगवाद अन्तरक आगिकेँ और फूकि कऽ आँचि रहल अछि,
की भविष्य भारतक भालपर अंकित अक्षर बाँचि रहल अछि,
आइ विवेक हमर पौरुषकेँ चढ़ा चाँछपर जाँचि रहल अछि?
ओहो छथि एही समाजमे,
अपनहुँ छी एही समाजमे।
सब क्यो छी एही समाजमे
आइ आत्म-विश्वास कदाचित टूटि जाय तँ,
आकाशक लोभेँ ई धरती छूटि जाय तँ,
थिक बुझबाक अदिन्ता नचइत अछि कपारपर,
पाथर अछि पड़ि गेल सेहन्ताकेर पथारपर,
काक डकै अछि, पहिने पढ़ू एकर ई भाषा,
आइ करक अछि निर्धारित नीतिक परिभाषा,
ई समाज दिग्भ्रान्त परम उत्फाल बनल अछि,
देशक नौकामे ई उनटे पाल तनल अछि।
- पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 327)
- संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
- रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 2025
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