हम आधा-आधा जीने के आदी हैं
धर्मेश सिंह
17 अगस्त 2026
~•~ हमारी अनुभूतियाँ विकृत हैं। हम सही से कुछ महसूस नहीं कर पाते। हमारी स्मृतियाँ क्षत-विक्षत हैं। हम ठीक-ठीक कुछ याद नहीं कर पाते, हम पूरी तरह कुछ विस्मृत नहीं कर पाते और अपनी इस असमर्थता को ‘सब समय के साथ धीरे-धीरे होता है’ कहकर छुपाते हैं। हमारी कल्पनाएँ चोटिल हैं, हमारी योजनाएँ अनिश्चित हैं। वर्तमान भविष्य के वेंटिलेटर के सहारे साँसें ले रहा है। हम आधा-आधा जीने के आदी हैं। हमने आधे मन से बचपन जिया, आधे मन से किशोर हुए, आधे मन से युवा हुए, आधे मन से प्रेम किया और आधे मन से उस प्रेम को जाने दिया। मरते समय हम आधे मन से मरेंगे। पूरे मन से मरने के लिए मन भर जीना पड़ता है। तृप्ति इस संसार में संभव ही नहीं। संभव होती तो लोक और संस्कृत वाङ्मयों में बार-बार यह मनवाने पर ज़ोर ही न दिया जाता कि संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। हम सब अतृप्त जाएँगे इस संसार से, हम सब प्रेत बनेंगे।
~•~ जो कुछ सुंदर है, वो इतना वेध्य क्यों है? सुंदरता इतनी निष्कवच क्यों है? कुरूपता इतनी अभेद्य कैसे हो गई? क्या अभेद्य होने के क्रम में सुंदरता भी कुरूप हो जाएगी? बचे रहना इतना दुष्कर क्यों है? ये पूरी दुनिया एक बड़े-से बूचड़ख़ाने (स्लॉटर हाउस) जैसी क्यों है? क्या मेरा ईश्वर भी क़साई हो गया है? मैंने ईश्वर की जो अवधारणा सुनी थी, वो तो बहुत सुंदर थी। ईश्वर को तो ऐसा नहीं होना चाहिए था।
शायद ईश्वर भी ज़्यादा दिन तक अपनी निष्कवच सुंदरता को बचा नहीं सका। क्या बहेलियों ने उसे भी नहीं छोड़ा? अब तो ईश्वर से डर लगता है, हमें तो उससे प्रेम होना चाहिए था!
प्रेम एक वक़्त के बाद डर में कैसे बदल जाता है? लोग जिससे प्रेम करते हैं, उससे डरने क्यों लग जाते हैं? एक अवधि के बाद उससे भागने क्यों लगते हैं, जबकि सारी जद्दोजहद तो उसके निकट आने की थी? डरते हुए किसी से प्रेम कैसे किया जा सकता है! डरते हुए कोई प्रेम कर कैसे लेता है! मैं तो जिनसे प्रेम करता हूँ, उनसे लेशमात्र भी नहीं डरता। उनके सामने इतना निडर होता हूँ कि बच्चा हो जाता हूँ, कई बार दुस्साहसी भी। कितनी तिलिस्मी है ये दुनिया! शायद तभी इसको माया कहा गया है। फिर तो ईश्वर मायावी है, जादूगर है! जादूगर अच्छे भी होते हैं? सुना है जादूगर लोगों को कबूतर बना देते हैं! कहीं ईश्वर हमको कबूतर बनाकर पिंजरे में क़ैद तो नहीं कर देगा? कहीं हम अभी पिंजरे में ही तो नहीं हैं? हम रिहा कब होंगे? प्रेम हमें रिहा कर सकता था, लेकिन वो तो हाईजैक्ड है! अब मुक्ति कैसे होगी? मुक्ति का हर दरवाज़ा नई किस्म की दासता को जन्म क्यों देता है? क्या मुक्ति छलावा है? फिर तो प्रेम, ईश्वर, सब कुछ एक छलावा है? आख़िर कब तक हम सब छले जाते रहेंगे? आख़िर सच क्या है? मुझे सच जानना है! कहीं मेरा अस्तित्व, मेरे प्रश्न भी छलावा तो नहीं? किसी बात का कोई सीधा जवाब क्यों नहीं है? ...सब कुछ इतना राजनैतिक क्यों है?
~•~ किसी दिन मैं ख़ुद का अतिक्रमण करके तुम बन जाऊँगा। अपनी अस्तित्वहीनता से जूझता हुआ मैं ख़ुद को तुमसे परिभाषित करता हूँ। तुम मेरी परिभाषा हो। तुम मेरी इंद्रियाँ हो, जिनसे मैं दुनिया को महसूस करता हूँ। मेरी आँखें हो, जिससे मैं जीवन को देखता हूँ। तुम वो हो जिसकी वजह से मेरा हृदय सच में ज़िंदा महसूस कर पाता है। तुम्हारे पास होना वो सब एक साथ अपने आस-पास महसूस करना है, जिनकी तमन्ना कभी मेरे हृदय ने की थी। या यूँ कहें कि बचपन से अब तक मैं तमाम चीज़ों, लोगों, पसंद-नापसंद के बहाने बस तुमको तलाश रहा था। मेरी सारी प्रतीक्षाएँ, सारी मनोकामनाएँ, सारी तलाश तुम पर आकर ठहरती है। ऐसा लगता है कि अभी तक की सारी यात्रा, सारा भटकाव बस तुम तक पहुँचने का था। जब तुम नहीं थीं तो मन को बहुत कुछ चाहिए था, अब तुम हो तो बस तुम चाहिए। तुम्हारे पास होने पर तुम्हारे भीतर मैं संपूर्ण सृष्टि को पाता हूँ। तुम्हारी उपस्थिति में तुम्हारे भीतर दुनिया तलाशता हूँ, तुम्हारी अनुपस्थिति में संपूर्ण दुनिया में तुमको तलाशता हूँ। तुम्हें ढूँढ़ने के क्रम में मैं एक साथ सैकड़ों दरवाज़ों पर दस्तक दे रहा होता हूँ, सारे दरवाज़े तुम पर खुलते हैं। अंशु मालवीय एकदम सच कहते हैं—“मैं तुम्हारी त्रिज्या लेकर खींचा गया वृत्त हूँ/मुझे हर कोण पर तुमसे मिलना है।”
मैं तुमको जादू की तरह देखता हूँ। तुम हो तो सब जादू है, तुम हो तो मैं एक पल में पंद्रह साल पीछे जाकर एक बच्चे में तब्दील हो सकता हूँ। तुम हो तो कुछ भी वायवीय नहीं, तुम हो तो हर कल्पना की ज़मीन है। तुम दिखलाओगी तो दुनिया सुंदर दिखेगी, तुम कहोगी तो सब सच्चा लगेगा। तुम हो तो मुझसे बड़ा दुस्साहसी कोई नहीं, तुम नहीं रहो तो मुझसे बड़ा कायर कोई नहीं। तुम्हारा होकर मैं ख़ुद को ख़ुशक़िस्मत समझता हूँ, तुम होती हो तो देवताओं पर हँसने को जी करता है। अशोक वाजपेयी की भाषा में कहूँ तो इठलाते हुए कहना चाहता हूँ—“देवताओं अब तुम जा सकते हो / वो आ गई है।” कितनी ख़ुशनसीब है दुनिया कि इसमें तुम हो, कितने बदनसीब हैं तमाम ईश्वर, देवता और स्वर्ग कि वो तुम्हारे होने से वंचित हैं। मेरी ख़ुशनसीबी का अंदाज़ा इस बात से लगाओ कि आठ अरब की आबादी से भरी, चार अरब साल की उम्र तय कर चुकी इस पृथ्वी पर मैं भी ठीक उसी समय मौजूद हूँ जिस समय तुम हो। तुमसे कभी न मिल पाने के अरबों-खरबों समीकरण थे, लेकिन फिर भी हम मिले। मेरी सबसे बड़ी बदनसीबी होगी कि कहीं मेरे हाथ से तुम्हारा हाथ छूट जाए... कैसे ढूँढ़ पाऊँगा मैं तुम्हें इस अजनबी अनंतता में? मेरा हृदय अभी से काँप रहा... मैं गालियाँ देना चाहता हूँ उस स्रष्टा को जिसने बिछड़ने के अरबों रास्ते बनाए, लेकिन साथ होने के एक भी नहीं। हम दोनों का एक साथ होना उसके अहंकार को चोट पहुँचाता होगा, इसीलिए वो हमें एक साथ नहीं देख पा रहा। मेरे जीवन की सबसे बड़ी टीस है कि मेरे बीस बरस तुम्हारे बग़ैर गुज़रे। मेरा सबसे बड़ा डर है कि आगे के बरस तुम्हारे बग़ैर न बिताने पड़ें। मेरा सबसे बड़ा मलाल है कि मैं तुम्हारे लिए वैसा नहीं हो पा रहा, वो सब नहीं कर पा रहा, वैसे नहीं जी पा रहा, जैसा होना चाहता हूँ, जो कुछ करना चाहता हूँ, जैसे तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ।
~•~ तुम हो तो मुझसे बड़ा दुस्साहसी कोई नहीं, तुम न रहो तो मुझसे बड़ा कायर कोई नहीं... तुम्हारे साथ होने पर देवाधिदेव के सामने भी शक्ति का दंभ भरने वाला मैं, तुम्हारे बिना इतना शक्तिहीन हो जाऊँगा कि एक चींटी के हाथों मेरा वध किया जा सकेगा। तुम हो तो अनमोल हूँ मैं, तुम न रहो तो कौड़ियों के भाव बिकूँगा। तुम्हारे होने पर मैं दुनिया को अपनी शर्तों पर स्वीकारता या ठुकराता, तुम न रहोगी तो दुनिया को उसकी शर्तों पर हासिल होऊँगा मैं। तुम्हारे साथ होने पर दुनिया को पैरों की नोंक पर रखने वाला मैं, तुम्हारे न होने पर तिल-तिल के लिए तरसता नज़र आऊँगा। तुम हो तो पूरा सागर ठुकराया जा सकता है, तुम न रहो तो एक-एक बूँद के लिए भीख माँगता दिख जाऊँगा। मेरा गुरूर हो तुम, मुझसे मेरा स्वाभिमान मत छीनो... मेरी ताक़त हो तुम। तुम्हारे साथ अपनी शर्तों पर जीने वाला मैं, तुम्हारे बिना कठपुतली की तरह नचाया जाऊँगा और नाचना पड़ेगा। बिना तुम्हारे मैं प्रतिरोध भी करूँगा तो कैसे... और क्यों! तुम्हारे साथ पूरी दुनिया जीत लेने का स्वप्न देखने वाला मैं, तुम्हारे बिना रत्ती भर भी कुछ हासिल कर लेने पर फूट-फूटकर रोऊँगा। सब कुछ तो चाहिए ही इसीलिए था न कि तुम थीं, अब क्या करूँगा इन मुर्दा उपलब्धियों का!
~•~ बीबीसी को दिए इंटरव्यू में शिव कुमार बटालवी ने महेंद्र कौल से कहा था कि मुझसे वो तस्वीर मुकम्मल बन नहीं पाई जिससे मैं मोहब्बत करता। कभी किसी के होंठों से, कभी किसी के बालों से, किसी के पैरों से, किसी की उँगलियों से मोहब्बत हुई। बटालवी की मोहब्बत टुकड़ों में थी या शायद जिससे मोहब्बत थी, उसके खो जाने के बाद वो हर शय में उसका एक टुकड़ा ढूँढ़ लेते थे और उससे मोहब्बत कर बैठते थे। वो जिस लड़की के लिए उन्होंने लिखा था : ‘इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत, गुम है… गुम है… गुम है…’, उसी गुम लड़की को वो मुकम्मल प्रेम करते थे। उसके गुम होने के बाद उसकी तस्वीर तलाशने की कोशिश वो करते रहे, लेकिन उन्हें वो कामयाबी बस किश्तों में नसीब हुई। मुख़्तलिफ़ शख़्सियतों में उस लड़की के अक्स थोड़े-थोड़े मिले। जीवन घूँट-घूँट जिए जाने की वस्तु है। तुम्हारे मुकम्मल हिस्से का समूचा मैं जब तुम्हारा न हो सका, तो मेरे अलग-अलग टुकड़े अलग-अलग लोगों में मौजूद तुम्हारे हिस्सों को हासिल हो गए। अंततः मैं रहा तुम्हारा ही।
~•~ Dead Poets Society मूवी का एक दृश्य देखते हुए—उसकी देह ही उसकी सज़ा थी, उसने देह का अंत सज़ा का अंत समझा। उसने नियति के विरुद्ध जाना चाहा, उसने नियति की नियति बनने की कोशिश की। वो नियति के अहंकार को आख़िर तक चुनौती देता रहा और नियति ने इसका प्रतिशोध ऐसे लिया कि उसकी देह को ही उसका शत्रु बना दिया। जिस देह, जिस हृदय और जिस मस्तिष्क के सहारे उसने नियति के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ दंभ भरे स्वर में कहा—
साथ नहीं तो स्मृति में रहूँगा
मगर रहूँगा तुम्हारे साथ
समय के ख़िलाफ़ तुम्हारी जगह
छेंक कर रहूँगा दीवार की तरह
जहाँ तुम लौटकर टिका सको अपनी पीठ
और गुनगुना सको बेफ़िक्री के गीत
—आशुतोष प्रसिद्ध
नियति ने उसी देह, उसी हृदय और उसी मस्तिष्क को असाध्य रोग में तब्दील कर दिया। देह, हृदय और मस्तिष्क ने कभी एक-दूसरे का साथ नहीं दिया। तीनों के तनाव में उसका मन घुटता रहा। देह क़ैदख़ाना हो गई, हृदय ने बुद्धि की नहीं मानी और बुद्धि हृदय का विरोध करती रही। नियति को हराने का दुस्साहसी स्वप्न देखने वाला अंत में ख़ुद से हारा। नियति का वध करने की हिमाकत करने वाला आत्मघात कर बैठा। नियति को स्वीकारने की जगह उसने मृत्यु को स्वीकारना अधिक गरिमापूर्ण समझा। नियति ने उसके प्राण भले छीन लिए, लेकिन उसका गर्व नहीं छीन सकी। उसकी मृत्यु भी नियति को चुनौती थी...
~•~ कितना मुश्किल होता है उन तमाम स्मृतियों, लोगों, जगहों, सपनों और रुचियों के प्रति अनासक्त होना, जिनसे आप ख़ुद को परिभाषित करते आ रहे हों!
अब इस ख़याल ने नींदें हराम कर दी हैं
वो कोई था भी जिसे उम्र भर बुलाया गया?
—शारिक़ कैफ़ी
~•~ स्मृतियों का सुख और दुख तो समझ आता है, लेकिन मुझे जीवन की उस भयावहता से डर लगता है जब याद करने को कुछ हो ही न। कितना मुर्दा और पथराया समय होगा वह, जब किसी भावुक मन के पास सालों-साल बीत चुके अतीत की कोई स्मृति ही न हो। अनुपस्थिति से उपजे मन के ख़ालीपन को स्मृतियाँ कम से कम भर तो सकती हैं। स्मृतियाँ भी न हों, तो उस सन्नाटे को कैसे बर्दाश्त किया जाए? जिस समय को याद करके अपनी हमउम्र के लोग नॉस्टेलजिया महसूस करते हों, जीवन का वो एक पूरा दौर मन के परदे से किसी ब्लैंक रील की तरह गुज़रे तो लगता है कि हम रंगों के बाज़ार में आकर भी रंगों से अनछुआ रह गए हैं।
~•~ मैं तय नहीं कर पाता हूँ कि अधिक ख़राब स्थिति क्या है—आप इस संसार से प्रेम की अभिलाषा रखें, लेकिन आपको प्रेम करने वाला कोई चेहरा ही मन के पटल पर न ध्यान आए; ये अधिक ख़राब स्थिति है या फिर आप इस संसार को प्रेम देना चाह रहे हों, लेकिन लोग आपसे प्रेम पाना ही न चाहें। ये कुछ ऐसा ही है कि आपके आस-पास लोग प्यास से मर रहे हों, पानी-पानी चीख रहे हों, आपके पास पानी से भरा पूरा घड़ा हो, आप घड़े को लेकर खड़े हों, लेकिन कोई आपके पास ही न आए। दैन्यता अस्तित्वहीनता के भी परे की घुटन है।
~•~ मेरा मन जल रहा है, हृदय युद्ध का क्षेत्र बन चुका है और मस्तिष्क सुन्न पड़ चुका है। मेरे मन के कई प्रतिरूप हो गए हैं। सब विरोधी गुणों से युक्त, एक-दूसरे के जन्मजात शत्रु। मेरे सारे प्रतिरूप एक-दूसरे को मार-काट देने पर आमादा हैं। एक अन्य कैरेक्टर भी है मेरा, जो सब कुछ बाहर खड़े होकर देख रहा है। मेरे मन के इतने हिस्से हो चुके हैं कि सब अपना-अपना दुःख रो रहे, सब अपनी-अपनी ख़ुशियाँ जी रहे, सब अलग-अलग दिशाओं में जा रहे, सबका आपस में कोई सामंजस्य नहीं। इस खिंचाव में मेरा हृदय फट रहा...
~•~ आदमी की इंडिविजुअलिटी को इतना अधिक क्राफ़्ट कर दिया गया है कि दुनिया के तमाम लोग एक-दूसरे की फ़ोटोकॉपी मात्र लग रहे हैं। आदमी की वैयक्तिकता ख़त्म कर दी गई है, निजी पहचान को सस्ते साँचे में डालकर सामुदायिक पहचान में खपा दिया गया है। लोगों के चेहरे रिपीटेशन की ऊब से भरे, एक जैसा सोचने वाली, एक जैसा देखने वाली, एक जैसी बातों पर हँसने वाली, एक जैसे दुःख रोने वाली भीड़ की शक्ल में तब्दील होते जा रहे हैं। इतना प्रिडिक्टेबल जीवन जीने के आदी होते समाज के चेहरे की झुर्रियाँ उसकी जवानी को खा गई हैं। कईयों को तो इतनी जल्दी है इस भीड़ का हिस्सा बनने की कि वे चौबीस-पच्चीस की आयु तक आते-आते घिस चुके होते हैं। उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा जीवन को एक्सप्लोर करने में नहीं, बल्कि ख़ुद को कोल्हू में जोतकर किसी लीक को तलाशने में लगा दी। समय से पहले ही उनकी आत्मा बूढ़ी हो चुकी है। हद दर्जे की कृत्रिमता और कुटिलता उनको घेरे रहती है। उनके विचार, उनकी बातें, उनकी अभिव्यक्तियाँ, उनके क्रियाकलाप—सब कुछ से कृत्रिमता झलकती है। उनका पूरा अस्तित्व ही ढोंग हो जा रहा है। विडंबना ये कि उस पर भी इसको एक स्किल की तरह डेवलप किया जा रहा है, हिपोक्रेसी को प्रैक्टिकलिटी का लेवल लगाकर बेचा जा रहा है। संबंधों को निभाने की जगह उनको ‘मैनेज’ किया जा रहा है और ये सब दुनियादारी का तमगा लगाकर किया जा रहा है। जो इसमें जितना अधिक निपुण, वो उतना कुशल ‘दुनियादार’... जय हो!
~•~ दिन-रात रिक्तता और जड़ता के द्वंद्व के झूले पर संतुलन बनाने की कोशिश में बीत रहे हैं। भीतर का ख़ालीपन बेचैनी उत्पन्न करता है, जड़ता इतनी है कि बस हाथ पर हाथ रखकर ख़ुद को बेचैन होते देख रहा हूँ। पता नहीं जड़ता ही है या फिर निरुपाय असहायपन से भरी कातरता? कोई आदमी इतना रिक्त होकर भी इतना जड़ कैसे हो सकता है? कहीं मैं यथास्थितिवादी तो नहीं होता जा रहा? अभी से इतना नियतिवादी होना मुझे उसी थकी हुई भीड़ का हिस्सा न बना दे, ऐसी भीड़ जो एक ब्लैक होल में तब्दील हो चुकी है, जो दुनिया के सारे रंग सोख लेने पर आमादा है। कहीं इसी ब्लैक होल ने मुझे निगलना शुरू तो नहीं कर दिया? कहीं मेरा अस्तित्व इस बुराई को बड़ा करने में न खप जाए? मैं तो इससे लड़ना चाहता था। लड़ना ही होता है न? खपना ही है तो व्हाइट होल जैसी किसी चीज़ में खपता...
~•~ अंततः सारा उपक्रम भीतर की रिक्ति को भरने का है।
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