तुम हे साजन
tum he sajan
मैं गुनाहगार के आधार हौ तुम हे साजन!
निपटि गँवार के पियार हौ तुम हे साजन!
घास छीलति उयि चउमासन के ख्वादति खन,
तुम सगबगाइ क हमरी अलँग ताक्यउ साजन!
हायि हमहूँ तउ सिसियाइ क मुसक्याइ दिहन!
बसि हँसाहुसी मुहब्बति म बँधि गयन साजन!
आदि कइ-कइ कि सोचि-सोचि क बिगरी बातैं,
अपनिहे चूक करेजे म है सालति साजन।
तुम कहे रहउ कि सुमिरेउ गाढ़े सँकरे मा,
जापु तुमरइ जपित है तुम कहाँ छिपेउ साजन!
बइठि खरिहाने मा ताकिति है तउनें गल्ली,
जहाँ तुम लौटि क आवै क कहि गयौ साजन।
हन्नी उयि आई जुँधय्यउ अथयी छठिवाली
टस ते मस तुम न भयउ कहाँ खपि गयौ साजन?
कूचि कयि आगि करेजे म हायि बिरहा की
कैस कपूर की तना ति उड़ि गयौ साजन!
याक झलकिउ जो कहूँ तुम दिखायि भरि देतिउ
अपनी उढ़नी म तुमका फाँसि कै राखिति साजन।
- पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 155)
- संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
- रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
- प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
- संस्करण : 1998
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