स्पर्श
sparsh
छूना…
केवल ज्ञानेंद्रिय तक नहीं;
अपितु विस्तृत है सुकुमार भावों से,
धरती, आकाश और पाताल तक,
और चेतन-अचेतन भावों तक भी…
प्रेम में स्पर्श,
की कोई सीमा-रेखा नहीं होती…
वह सीधे आत्मा को छूती है और झंकृत कर देती है;
जैसे चट्टान को फोड़कर प्रवाहित होती है कोई नदी…
ओह! चट्टान का इस तरह से फूटना कितना अविस्मरणीय है!!
एकदम से शीतल हो जाता है प्रस्तर-खंड;
संगीत का साक्षात्कार इस आंतरिक स्पर्श का कारण है।
एक का बहाव और दूसरे की शांत, मधुर स्थीरता,
नहीं डिगा पाती उनके स्वछंद प्रेम में उनके स्वतंत्र अस्तित्व को…
कितना ख़ूबसूरत है यह स्वतंत्र अस्तित्व युक्त स्वछंद प्रेम:
किसी गीतिकाव्य की तरह…
प्रेम में स्पर्श की कोई नैतिक परिभाषा नहीं गढ़ी जा सकती,
ना ही मर्यादा के दबाव में किया गया कोई स्पर्श प्रेम ही होता है…
तुम्हे जब भी होगा प्रेम;
स्पर्श की कोई आंतरिक अनुभूति वेगवती हो उठेगी…
तुम उस प्रथम स्पर्श को महसूस करना चाहोगे,
जिसे तुम्हारी चेतन-अचेतन भावनाएँ—
प्रेम में यूँ ही कर रही हैं महसूस…
- रचनाकार : गरिमा सिंह
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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