सन्नाटा
sannata
कई-कई दिन हो जाते हैं
अपनी मोबाइल का रिंगटोन सुने
डायल की लिस्ट देखूँ
महज़ दो नाम रोज़ के रोज़, दो सुबह दो शाम
बाहर निकलने को मन उकताता है
सड़क पर चलते लोगों में अपने से लोग नहीं दिखते
कमरे में आने को बेचैनी के बुलबुले फूटते हैं
हताशा से भरा लौट आता हूँ रोज़-रोज़
लगातार होती बारिश में चाय पीने की तलब होती है
अकेले खौलाने की उधेड़बुन में
चाय हर बार बिना चढ़े उतर जाती है
खाना का बर्तन भी रोज़-रोज़ एक ही स्वाद से ऊब चुका है
कमरे के आस-पास बहुत चहल-पहल रहती है
कुछ नए लोग आए हैं इस इमारत में
सबके दरवाज़े पर उनकी दस्तक है, जानता हूँ
अपने कमरे के बाहर आहट होती है
तो कान खड़े हो जाते हैं, शरीर में हरकत आ जाती है
जैसे अपना नाम पुकारा हो किसी ने बाहर
दरवाज़ा खोलते बाहर सन्नाटा गिरा मिलता है
उठाकर टाँग देता हूँ दरवाज़े पर
सन्नाटा अमीबा-सा फैला है पूरे कमरे में
एक बच्चा सामने वाले मकान में रहता है
इशारे से पहले बात हो जाती थी
अब उसकी खिड़की भी बंद रहती है
सीने के भीतर उठता संवाद का सुर एकल होते थक चुका है
न बाहर है चैन
न भीतर है राहत
यूँ गुज़ार ही लिए बरस-दर-बरस
और कब तक!!
- रचनाकार : सुमन शेखर
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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