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सागर किनारे

sagar kinare

ऋषिता सिंह

ऋषिता सिंह

सागर किनारे

ऋषिता सिंह

और अधिकऋषिता सिंह

    नदी से एक निर्धारित दूरी पर छोटी कुटिया है मेरी

    जहां मैं कबसे रहती आईं हूँ, शायद मुझे भी ज्ञात नहीं!

    मुझे नदी से सर्वाधिक प्रेम है ,

    पर मैं ने उस दूरी को लाँघने की कोशिश नहीं की।

    नदी बहती रही सागर की ओर और मैं मान बैठी उन दोनों को चिर प्रेमी।

    दूर से बैठकर सोचा करती रही कि नदी की मिठास,

    समुद्री खारेपन को समाप्त कर देती होंगी।

    नदी की शीतल धारा जब सागर को आलिंगन में

    भरती होगी तो वह भी लहरों को रोक, शांत हो जाता होगा।

    प्रेम पाश मे बंधकर, नदी उन्मुक्त हो जाती होगी।

    मैं किसी के सुंदर प्रेम में बाधा नहीं बनना चाहती थी।

    पर प्रेम पर किसका वश रहा है?

    निर्धारित दूरी से अनंत तक प्रेम करने का निश्चय कर बैठी—

    फिर एक दिन नदी सूख गई।

    समुद्र अपने खारेपन को समेटे

    नई नदियों से मिलने लगा।

    अनेक नदियों के आलिंगन से ख़ुद को तृप्त करता सागर,

    अपने हलचल को कभी शांत ना कर सका।

    नदी ने प्रेम के सारे अश्रु बहाकर सूखना स्वीकार किया

    और मेरे सामने बची सिर्फ़ एक निर्धारित दूरी,

    जिसे तय करने का कोई उद्देश्य नहीं,

    जिसके अंत पर कोई नदी ना हो।

    शायद उस कुटिया में मेरा प्रवास सदा सर्वदा का नहीं था,

    शायद मैं वहाँ तबसे हूँ जबसे वो नदी थी।

    वही नदी जिससे मुझे सर्वाधिक प्रेम था।

    अब अपने अस्तित्व पर ही प्रश्न उठ रहें हैं—

    कौन हूँ, क्या हूँ के फेर में बँध रहें है!

    उत्तर के अभाव में, प्रश्न खाक हो हैं

    मेरी कुटिया अब किसी साधु का घर है।

    उसके कमंडल मे उसी सुखी नदी का पानी है—

    मेरे घर की प्यास बुझ रही है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ऋषिता सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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