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पूरी पृथ्वी अपनी सूफी गति में गुमसुम

निरंतर घूमता ऋतुचक्र का रहँट

खोये हुए इस शहर में कौन सी ऋतू रहती है

यहाँ बसंत कभी महकता दिखाई नहीं देता

ग्रीष्म धूप से चटखता नहीं

हेमंत और शरद तो बचपन में ही गुमशुदा हुए किसी मेले में

शिशिर आया है

यहाँ के पेड़ ही बुदबुदाते हैं

पीले पत्तों के झरने के साथ

उलटी जैसे बरस कर अचानक रुकती है बारिश

और बहुत छद्म हंसी के साथ आवाज़ आती है

मैं आयी हूँ—वर्षा

यही आगे कभी हाथ मरोड़कर पीठ पीछे लेकर

दिखाती है शहर के रास्तों पर फ़ैली हुई

इस शहर के पेट की भरपूर गरल

देखा तेरे शहर का असली रूप

चेहरे का रंग धोने के बाद

देख कैसा दीखता है तेरा शहर

नीले समुंदर से बहकर आयी नमकीन हवा का

दम घुटता है तो घुस जाती है

शहर की किसी इमारत में

भीतर की सभी चीज़ों को

सालों साल सहेजती है

धीरे धीरे इंसानों को भी छीजती जाती है

यहाँ से बेदखल किए गए

दुखी ललचाई नज़रों से दूर से देखने वाले

भूमिपुत्रों का यह शहर

अपनी-अपनी जमीं से उखड़कर

यहाँ बसने आए परदेसियों का यह शहर

कौनसे उत्सव मनाते हुए जीता है

कौनसा चित्रकार आगे आता है

इस शहर के चित्र में रंग भरने के लिए

और अचानक दमक उठता है यह शहर

कौनसा भूलभुलैय्या

मुझे यहाँ तक

खींचकर ले आया

मधुमक्खियों के छत्ते जैसा

भरा-पूरा शहर सिरहाने धधकते हुए

कौन से सपनों की गंध में

मैं यहाँ गहरी नींद सो जाता हूँ।

स्रोत :
  • रचनाकार : प्रफुल्ल शिलेदार
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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