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रउआ कलपाई केतनो हम सहबे करब

raua kalpai ketno hum sahbe karab

सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

रउआ कलपाई केतनो हम सहबे करब

सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

    रउआ कलपाई केतनो हम सहबे करब।

    आपन हियरा के बतिया हम कहबे करब॥

    बालू-रेती के झुठो के बंगला बनल।

    रउआ लाते घेरौना के ढहबे करब॥

    झांक के तनिको हमरा से मुंह फेर ली

    हम झरोखा का नीचा रहबे करब॥

    साधा के नांव डालल बा मझधार में

    ऊँचे-नीचे लहरिया में दहबे करब॥

    जब देखार हो गइनी संसार में

    रउआ चाहीं ना चाहीं हम चहबे करब॥

    सगरी दुनिया जब ढाहे के तइयार बा

    का, जी! रउरो अब हमरों के ढहबे करब?

    स्रोत :
    • पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 9)
    • रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
    • प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
    • संस्करण : 1996

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