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रात्रि की दस कविताएँ...

ratri ki das kavitayen. . .

योगेंद्र पांडेय

योगेंद्र पांडेय

रात्रि की दस कविताएँ...

योगेंद्र पांडेय

और अधिकयोगेंद्र पांडेय

    एक


    चाँदनी रात...


    चाँदनी रात की दूधिया उजास,
    धरती डूबी हुई चिरनिद्रा में—
    शांत, निस्सीम, क्लांत।

    युगों-युगों की नियत गति,
    और फिर यह गहन विश्राम।

    घनघोर मौन को तोड़ती
    टिटहरी की टिंटिहूँ-टिंटिहूँ बोली—
    कि स्वप्नलोक में जैसे तुम उतरती हो
    धीरे-धीरे, दबे पाँव।

    परियों के विचरण की यह रात—
    गहन, गूढ़, रहस्यमयी रात!
    और रुई के फाहे-सी हल्की
    छू जाती है तुम्हारी याद॥


    दो


    सुहावनी रात...

    ये रात, सुहावनी रात,
    सितारे अपलक तकते हुए
    निहारते हैं धरती को
    चुपचाप।

    मौन की यह भाषा
    सिर्फ समझता है कवि,
    कि चाँद की सफ़ेद, मीठी छुअन से
    सिहर उठी है वसुंधरा
    अभी-अभी।

    यह कौन है जो टाँग देता है नित
    स्वच्छ, साफ़ आकाश में
    चाँद-तारों को झिलमिल?

    यह कौन है जो रचता है
    इतनी सुंदर रात?

    न जाने कितने युगों से
    मन ढूँढ़ता है उस चित्रकार को —
    सर्जना के अनुपम सूत्रधार को॥

    तीन


    अंतिम पहर...

    यह रात—शांत, ठहरा हुआ-सा मौन,
    और कवि स्वयं के भीतर झाँकता हुआ
    चला जाता है निःशब्द,
    अकेले-अकेले, गुमसुम
    विचारों की गहराई में धंसे हुए।

    आसमान से छनकर आ रही चाँदनी,
    मार्ग प्रशस्त करती हुई,
    खिलखिलाती हुई, चमचमाती हुई—
    कविता की पंक्ति
    कवि-मन में उपजाती हुई।

    रात का यह सन्नाटा—
    पसरा हुआ रहस्य,
    झींगुरों के गीत का लय,
    दूर भौंकते स्वान,
    सफ़ेद पर्दे-सा कोहरे का धुँध।

    मौन ओढ़कर सजी है रात—
    मिलन की रात,
    नव-सर्जना की रात।

    इस सघन, शांत रात्रि में
    गूँजता है संवेद-स्वर,
    रागिनी-अलाप।

    बहुत देर तक इस रात्रि में अकेले भटकते हुए
    आख़िर कवि को मिल ही गया
    कालजयी कविता का भाव—
    निश्चल, सुरमयी रात्रि के 
    अंतिम पहर में॥

    चार


    रात्रि की विभीषिका...

    यह रात है कि जिसके आते ही
    खाली हो जाता है पूरा का पूरा शहर।
    दिन में जिस सड़क पर
    दौड़ती-भागती ज़िंदगी दिखती है,
    रात होते ही छा जाता है
    एक अजीब-सा सन्नाटा।

    दिनभर सोए हुए कुत्तों के तेज़ कान
    रात होते ही जाग जाते हैं,
    हो जाते हैं और भी सतर्क।
    एक छोटी-सी आहट पर
    भौंकते हैं कुत्ते,
    कुछ तो आलसी फिर भी सोए रहते हैं,
    नहीं उठाना चाहते चुनौतियों का भार,
    मुँह छिपा लेते हैं देह में सिकुड़कर।

    गहरी, काली रात में
    पुलिस की गश्त—
    गूंजता है हवा में सायरन का साँय-साँय।
    रात के लुटेरे हो जाते हैं सतर्क,
    टल जाता है
    कोई छोटा-मोटा अपराध।

    मगर यह काली रात—
    एक भयानक-सी रात,
    भेड़ियों के लिए शिकार की रात।
    जिसकी डरावनी-सी आवाज़
    सिर्फ़ आम लोग ही नहीं डरते,
    डरती है यहाँ की पुलिस भी।
    बंद कर लेते हैं लोग अपने-अपने घरों के दरवाज़े।
    काम पर गई लड़कियाँ
    शाम होते ही लौट आती हैं घर,
    इस अँधेरे में नहीं निकलतीं
    लड़कियाँ सड़कों पर।

    भेड़िए के आतंक में डूबी हुई,
    यह भयावह, घनघोर काली रात—
    अपराध के चरम-उत्कर्ष की रात॥

    पाँच

     

    रात्रि का चित्रकार...

    ये रात जो भीगी हुई-सी
    डूबी हुई है
    चाँदनी की चासनी में।
    अनंत, विराट आकाश के कोरे काग़ज़ पर
    उतर रही है
    धीरे-धीरे...

    ये किसकी कल्पना है?
    ये कौन चित्रकार है,
    जो रचता है रोज़-रोज
    नई-नई चेतना की आभा।

    चाँदनी रात में
    मैं ढूँढ़ता हूँ उस चित्रकार को,
    जो भर देता है नित नया रंग—
    आशाओं का रंग,
    नवसर्जना का रंग,
    मेरे अंतस के कैनवास पर॥


    छह


    अँधेरा…

    सिर्फ़ उजाले में ही सुंदरता नहीं है, बल्कि
    अँधेरा भी होता है ख़ूबसूरत—
    ख़ूबसूरत-सी रात, जिसमें
    झलकता है गूढ़, गहन, गंभीर रहस्य।

    रात के सन्नाटे में
    खनक उठता है एक शांत संगीत,
    चेतना का गीत,
    जैसे वीणा की झंकार-सा
    झींगुरों का स्वर।

    अँधेरा वाकई ख़ूबसूरत है—
    सितारों की झिलमिल-सी लड़ियाँ,
    चहुँ ओर पसरी हुई
    निस्सीम ख़ामोशी।

    यह अँधेरा डूबता है मुझमें, या
    मैं ही डूब रहा हूँ
    इस सघन अँधेरे में,
    सन्नाटे के रेले में॥

    सात


    रात्रि का रहस्यवाद…

    रात्रि के ठहराव में
    बहता हुआ रहस्य,
    समय के साथ
    भागता हुआ वर्तमान।

    कितना मुश्किल होता है
    रात्रि की यादों को समेटना,
    मुश्किल होता है
    गहन विस्तार को समझ पाना।

    रात्रि की यह बेला—
    गहन चिंतन,
    गूढ विचारमग्न 
    रहस्यवाद की बेला॥


    आठ


    नव चेतना का विस्तार...

    रात्रि का यह आगमन
    कि थकी-हारी लौटती हुई चिड़िया
    अपने घर की ओर,
    सन्नाटे के पीछे से
    झिंगुरों का शोर।

    धीरे-धीरे आँखों में नींद उतरती,
    आत्मा का हुआ यह
    विचरण का समय,
    स्वप्नलोक में होता है
    नव चेतना का विस्तार॥

    नाै

    रात की निःशब्दता...

    रात की निःशब्दता में
    उठती है रहस्यवाद की अनुगूँज
    बरसती चाँदनी में झिल-मिलाता है
    सृष्टा के अस्तित्व का
    मौन प्रतिबिंब।

    रात्रि के सुनहरे उजास में जन्म लेती हैं
    हज़ारों प्रेम कहानियाँ,
    पनपते हैं जीवन के नए-नए फूल,
    टूटता है अनगिनत विषाद का
    मायाजाल।

    रात्रि के इस मध्य पहर में
    सन्नाटे को चीरती हुई
    अंतर्मन में उठती है आवाज़
    कि कोई गा रहा है गीत
    चैतन्यता जगाने के लिए॥

    दस

    नवचेतना की रात...

    ये रात है कि बो रही है
    मन में न जाने कितने बीज—
    नवचेतना के बीज।
    गहन तिमिर के ढलने के बाद
    अरुणोदय की नई आशा के बीज।

    मन को छूती हुई चाँद की मृदु किरणें,
    उठता है हृदय-सिंधु में हिल्लोल।
    ये किसके आने की है आहट?
    कि बीत रही है रात
    अंतहीन प्रतीक्षा में।

    इस रात के बाद होना है
    नव सर्जना का विस्तार।
    जगत के कोरे काग़ज़ पर
    लिखा जाना है स्वर्णिम विहान॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : योगेंद्र पांडेय
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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