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नया ख़्वाब फिर से

naya khvaab phir se

महिमा श्रीवास्तव

महिमा श्रीवास्तव

नया ख़्वाब फिर से

महिमा श्रीवास्तव

और अधिकमहिमा श्रीवास्तव

    ख़्यालों के तकिए पर

    थका सिर रख,

    आज रात फिर,

    एक ख़्वाब नया बुनते हैं।

    ख़ामोशी की आहट

    चुपचाप सुनते हैं

    झरोखे से छनके

    आती चाँदनी से

    प्याला भरते हैं

    चलो आज रात फिर

    नया ख़्वाब बुनते हैं।

    उजली ख़ुशियों का

    लिहाफ ओढ़ते हैं

    संदली ख़ुशबू वाली

    चादर पर पसरते हैं

    झपकते दिए की

    रोशनी में

    परछाइयाँ गिनते हैं

    आज रात फिर

    नया ख़्वाब बुनते हैं।

    स्रोत :
    • रचनाकार : महिमा श्रीवास्तव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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