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लज्जाजनक मातृत्व

lajjajanak matritv

अनुवाद : सईद शेख़

आऊलिक्की ओकसानेन

अन्य

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आऊलिक्की ओकसानेन

लज्जाजनक मातृत्व

आऊलिक्की ओकसानेन

और अधिकआऊलिक्की ओकसानेन

    झींगे खींचने लगे छातियाँ। इस पर या तो

    जागना था या फिर मरना। बिच्छू

    भूख से चीख़े। उन्हें भोजन देना था।

    उन्हें मैंने अपनी गोद में लिया

    वे आश्चर्य भरी अपनी छोटी-छोटी

    आँखों से देखते रहे। शिकंजे खरखरा रहे थे

    और गलफड़ों से ज़िद भरी आवाज़ रही थी :

    भूख, भूख।

    मेरा दूध, दूध नहीं था। वह था हरा

    और कडुवा जैसे विष। और जितनी देर तक

    दूध पिलाती रही

    उतनी ही स्पष्टता से समझ पाई यह

    कि वे पीड़ित बच्चे

    मेरे अपने थे।

    मैंने सात झींगों को नहलाया

    सात बिच्छुओं को धुलाया

    और उन्हें तौलिए में लपेटा, ले गई बाहर सूरज में।

    कोई चीख़ा फ़ौरन, किसी ने थूका

    आवाज़ें ऊँची होने लगीं, आँखों में भरने लगी घृणा

    शीघ्र ही श्राप को ढो रही थी जैसे कि एक लंबी दुम :

    झींग-कुमारी, आदमज़ात, विष भरी दुम, कंकाल स्त्री

    सात बार शापित गंदी धूसरित,

    बिच्छू योनि, सात बार शापित

    हरामी झींगा, वेश्या की खुली जाँघें।

    उबकाई भरा औरत का छेद।

    विकृत कोख,

    बालों में भीषण स्वाद और गंध

    सात बार शापित पेट, विषाक्त दूध

    झींगे को छातियाँ

    सात बार शापित, भीषण गंदा मल भिखमंगे,

    उबकाई से भरी

    वेश्या की संतान।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दरवाज़े में कोई चाबी नहीं (पृष्ठ 223)
    • संपादक : वंशी माहेश्वरी
    • रचनाकार : आऊलिक्की ओकसानेन
    • प्रकाशन : संभावना प्रकाशन
    • संस्करण : 2020

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