मैने चाहा है कि तुम मुझे अविरल प्रेम करो
गंगा जैसे सदियों से अविरलता से बहती आई है
जैसे गंगा का पानी मुक्तिदायिनी है
ठीक उसी तरह तुम्हारा प्रेम मेरा मुक्तिधाम हो
मैने चाहा है कि तुम अंतरप्रेम करो
ऐसा अंतरप्रेम एक माँ अपने शिशु से करती है
जैसे माँ सींचती है अपने शिशु के सपनों को
ठीक उसी तरह तुम मुझे सृजित करो
मैंने चाहा है कि तुम मुझे परम प्रेम करो
जैसा भरत ने राम से किया है
भरत का प्रेम राम की महानता का आधार है
ठीक वैसे ही तुम मेरे प्रेममय जीवन का आधार बनो
मैंने चाहा है कि तुम मुझसे निर्भीक प्रेम करो
जैसा गाँधी ने भारत से किया है
इस प्रेम में सत्य और अहिंसा मेरे साथी बनकर
मुझे स्वत्रंता रखे
मैंने चाहा है कि तुम मुझसे अति प्रेम करो
जैसा गोपियों ने कृष्ण से किया है
ठीक राधे की तरह तुम मुझे सब मे मिलो
जहाँ सिर्फ़ प्रेम का रास हो।
- रचनाकार : मुक्ति प्रिया
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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