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लोग मुझे चाहेंगे

log mujhe chahenge

अनुवाद : सुरेश सलिल

अत्तिला योझेफ

अत्तिला योझेफ

लोग मुझे चाहेंगे

अत्तिला योझेफ

और अधिकअत्तिला योझेफ

    अच्छे और बुरे को लेकर मैं माथापच्ची नहीं करता,

    काम करता हूँ और खटता हूँ; बस्स्।

    बनाता हूँ मैं पंखे से चलने वाली नावें, चीनी मिट्टी के प्याले प्लेटें,

    बुरे वक़्तों में बुरी तरह, औसत वक़्तों में अच्छी तरह।

    अनगिनत हैं मेरे कारख़ाने! सिर्फ़ मेरी प्यारी

    उनकी फ़िक्रमंदी करती है; उनका हिसाब-किताब रखती है।

    मेरी प्यारी ही उस सबका हिसाब-किताब रखती है।

    उसमें विश्वास है, लेकिन पंथ और सौगंध के सम्मुख वह चुप रहती है।

    मुझे दरख़्त बनाओ, यक़ीनन कौआ तभी मुझ पर घोंसला डालेगा

    जब आसपास और कोई दरख़्त हो।

    मुझे खेत बनाओ, बूढ़े किसान का फावड़ा

    मुझमें उगे खरपतवार के सिवा और कुछ नहीं खोदेगा।

    पसीने से सींचनी होगी तुम्हें आलू की खेती

    मेरी नाशुक्रा मिट्टी में उसे फूलते-फलते देखने के लिए।

    पानी बनाया? तो दलदल के फैलने में देर नहीं,

    आग? यानी मैं राख किंतु यदि मुझे लोगों के जाने-पहचाने

    ईश्वर की जगह, एक ईश्वर में रूपांतरित किया जाए,

    लोग सचमुच मुझे चाहेंगे; पूरे मन से।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 206)
    • रचनाकार : अत्तिला योझेफ
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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