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कल देखोगे

kal dekhoge

निकोलाई रेरिख

निकोलाई रेरिख

कल देखोगे

निकोलाई रेरिख

और अधिकनिकोलाई रेरिख

    किस चीज़ से तप रहा है मेरा चेहरा?

    चमक रहा है सूर्य

    अपनी गर्मी से भर रहा है हमारे उद्यान को।

    किस चीज़ का शोर है यह?

    यह शोर समुद्र का है

    चट्टान के पीछे वह दिखाई नहीं देता।

    कहाँ से रही है बादाम की यह महक?

    बर्ड चेरी के पौधे खिल उठे हैं पूरे के पूरे।

    सफ़ेद रंग में डूब गए हैं सब पेड़।

    खिल उठे हैं सेब

    सब कुछ चमकने लगा है विविध रंगों में।

    यह क्या है हमारे सामने?

    यह तुम खड़े हो टीले पर।

    हमारे सामने से उतरता है उद्यान।

    चरागाह के पीछे चमक रही है खड़ी की नीलिमा।

    उस ओर पहाड़ हैं और जंगल।

    अंधकार में डूब रहे हैं चीड़ से ढँके पहाड़।

    नीले विस्तार में खो गई हैं आकृतियाँ।

    कब देख पाऊँगा मैं यह सब?

    कल देखोगे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : निकोलाई रेरिख की कविताएँ (पृष्ठ 25)
    • रचनाकार : निकोलाई रेरिख
    • प्रकाशन : रेरिख अध्ययन परिषद, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1995

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