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जौने दिना अउब्या अँजोर होय जाई

jaune dina aubya anjor hoy jai

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

जौने दिना अउब्या अँजोर होय जाई

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    रहिया तकैं मोर दुइनौ नयनवा,

    जाने कब सजना से होई मिलनवा,

    जब-जब याद हमें तोहरी सतावै,

    रतिया की नींद हमें कबहूँ आवै,

    तोहरी सुरतिया तौ होत बा सपनवा।

    जाने कब सजना...

    घेरे बा अँगना कारी बदरिया,

    जियरा बसी मोरे पिया की नगरिया,

    सारा दिन मनवा तौ झूलै झुलनवा।

    जाने कब सजना…

    होठवा नमवा तोहार करी फेरा,

    मनवा हमरे तू कइल्या बसेरा,

    अँजोरिया से चमकै दुअरा-अँगनवा।

    जाने कब सजना...

    जब-जब तू हमरे नगरिया आया,

    गँउवा कै हमरे पलट दिहा काया,

    तर जातै धरती जौ परतै चरनवा।

    जाने कब सजना...

    जौने दिना अउब्या अँजोर होय जाई,

    रतिया लागै की भोर हो जाई,

    तोहरे दरस पै बाटै गुमनवा

    जाने कब सजना...

    तोहरे पिरितिया मा जियरा दिवाना,

    दियना जइसे जरैं परवाना,

    लइजा सँदेस मोर पुर्बी पवनवा

    जाने कब सजना...

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 17)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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