बिंदुघाटी 2.0 : लौट आया हूँ, कोई कुछ भी कह सकता है
अखिलेश सिंह
05 जुलाई 2026
• व्लादिमीर : शुरुआत मुश्किल शय है।
एस्त्रागान : तुम किसी भी चीज़ से शुरू कर सकते हो।
व्लादिमीर : हाँ, लेकिन इसका निर्णय लेना होता है।
एस्त्रागान : सही बात।
— सैमुअल बेकेट | वेटिंग फ़ॉर गोदो
• यह ‘बिंदुघाटी’ का दूसरा सत्र है। इस अवसर पर प्रथम सत्र का प्रवेश यहाँ अनुष्ठानवश उद्धृत है :
इन बिंदुओं को किसी गणना में न देखा जाए। न ही ये किसी उपदेश या वैशिष्ट्य-विधान के लिए प्रस्तुत हैं। ऐसे असंख्य बिंदु संसार में हर क्षण पैदा हो रहे हैं। उनमें से कम ही अवलोकन के वृत्त में आ पाते हैं, और उनमें से भी बहुत कम अभिव्यक्ति में स्थान पा रहे हैं। गहरा अवलोकन और ईमानदार अभिव्यक्ति ही महत्त्वपूर्ण है। बिंदुओं का हासिल तो सरल है, फिर...
• हिंदी में भाँति-भाँति के ‘लौटने’ पर भाँति-भाँति की कविताएँ हैं! मेरे पास एक भी नहीं! मेरी कविता को अब तक यह शब्द ही नहीं मिला! यह चिंता जब थिर होकर आगे बढ़ी तो मैंने पाया कि मैं अभी तक कभी नहीं लौटा हूँ! इस पर दो तरह की बातें फिर आगे मिलीं। क्या मैं कहीं जाता ही नहीं हूँ कि लौटना पड़े या फिर लौटना संभव ही नहीं है... समय और जीवन-क्षय इसकी अनुमति ही नहीं देते। लेकिन जो बहुत लौट रहे हैं, वे अपने लौटने को लौटना क्यों कहते-लिखते हैं! वे क्यों नहीं समझते कि वे महज़ जीवन-कक्षा के दैनिक भ्रमण में हैं!
मैंने बहुत-सी बातों से रगड़े जाने के बाद लौटने को थोड़ी जगह दी और पाया कि व्यक्ति जीवन में सिर्फ़ एक बार ही लौटता है—एक जीवनपर्यंत वापसी। इसके लिए एक सचमुच का प्रयाण भी ज़रूरी है। जैसे कि साहित्य में राम लौटे थे या फिर ओडिसियस लौटा था। लौटता वही है जो अन्यत्र बस नहीं सकता। इसीलिए कृष्ण कभी नहीं लौटे—ब्रज। लौटना अगर जीवन का दूसरा पहलू न हो तो रोज़-रोज़ लौट रहे लोग, दरअस्ल कहीं गए ही नहीं। वे बस चेहरा घुमाते हैं और अभ्यस्त क़दमों से चले जाने को लौटना कह देते हैं। लौटना उन्हीं पग-चिह्नों पर लौटना नहीं है। यह राहगीरी का रियाज़ भर नहीं है।
राम जैसे गए थे, वैसे ही कहाँ लौटे! वह पुष्पक विमान पर बैठकर गाथा और संसार लेकर लौटे। ओडिसियस लौटा तो वह मृत्यलोक से होकर लौटा—एक तिलिस्मी जहाज़ पर सवार होकर, ढेर सारी संपदा लेकर। लेकिन उसका संघर्ष अब भी बाक़ी था, इसीलिए वह अब भी नहीं लौट पाया था। अपने ही घर में छद्मवेशी ओडिसियस उस संघर्ष को पूरा करके ही अपने अंतःपुर में, अपनी संगिनी के साथ उस स्मृति-शैय्या पर... फ़िर इस तरह वह भी लौटा।
• ओडिसियस जब अपने घर इथाका लौटकर आता है तो उसे कोई नहीं पहचान पाता है, सिवाय उसके पालतू कुत्ते के... जो कि बीस साल पहले पिल्ला ही था और अब खौरहा-कुकुर है। मैंने सोचा कि कुत्ते की उम्र ‘लोक’ से लेकर गूगल-लोक तक में दस-बारह बरस ही बताई गई है। फिर मैं डीप-गूगल लोक में गया, जिससे यह पता चला कि कुछ कुत्ते बीस साल भी जी लेते हैं और एक बॉबी नामक कुत्ता तो तीस सालों तक भी जीते चला गया। मैं अपने आस-पास तज्वीज़ करने लगा—जाने किन-किन नामों में अपना मुँह दिखाते हुए कुत्ते जाने कितना-कितना जिए जा रहे हैं!
युधिष्ठिर के समीप भी एक अद्भुत कुत्ता था, लेकिन...
• टेलीमैकस यानी ओडिसियस का पुत्र, ओडिसियस को उसके वास्तविक रूप में देखते ही कहता है—तुम कौन हो! कोई देवता!
ओडिसियस : नहीं...
दीर्घजीवी... महान् ओडिसियस लौट आया है। [ओडिसियस इज बैक...]
• ओडिसियस के तमाम विशेषणों में से कुछ यहाँ भी आ रहे हैं। सँभालिए! ओडिसियस यानी शहरों को तबाह करने वाला। ओडिसियस यानी दाँव-पेच में सबसे माहिर। ओडिसियस यानी तकलीफ़ों की औलाद। ओडिसियस यानी लार्तियस का शाही बेटा।
• अलेक्जेंडर पोप से लेकर रॉबर्ट फ़ागल्स तक और उसके बाद भी, अभी पिछले दशक तक ‘ओडिसी’ के अनगिनत अनुवाद हुए। कहीं उसे गद्य में संभव किया गया और कहीं पद्य में।
कविता का काव्यानुवाद ही आनंदकारी होता है। ‘ओडिसी’ को रॉबर्ट फ़ागल्स के पद्यानुवाद में पढ़ते हुए वही आनंद मिलता है। इसे डॉ. रीउ के गद्यानुवाद में पढने में वह मज़ा नहीं है, भले ही वह सरल हो।
• भाषाविदों, विषयप्रेमियों और जुनूनी लोगों ने संसार की सारी ज्ञान-परंपराओं में समय-समय पर ऐसे-ऐसे अनुवाद संभव किए कि जिससे बहुत कुछ बचता हुआ हम तक चला आ रहा है।
समादृत कवि-अनुवादक असद ज़ैदी की शैली में इसे कुछ यों जानिए :
अनुवाद की भाषा से अच्छी क्या भाषा हो सकती है
वही है एक सफ़ेद पर्दा
जिस पर मैल की तरह दिखती है
हम सबकी कारगुज़ारी
सारे अपराध मातृभाषाओं में किए जाते हैं
जिनमें हरदम होता रहता है मासूमियत का विमर्श
ऐसे दौर आते हैं
जब अनुवाद ही में कुछ बचा रह जाता है
संवेदना को मार रही है अपनी भाषा में
अत्याचार की आवाज़।
— अनुवाद की भाषा | सरे-शाम | पृष्ठ 256
• हवा में जैसे धूल भी है, उस तरह नहीं... जैसे हवा नहीं है यानी निर्वात में धूल ही धूल है, उस तरह अनुवाद अब मशीन से पैदा हो रहे हैं। यह आनंद स्वरूप वर्मा और अभिषेक श्रीवास्तव जैसे प्रबुद्ध-प्रतिबद्ध-कर्मठ अनुवादकों का समय नहीं है। इस समय के सर्वश्रेष्ठ अनुवादक हैं—श्री ChatGPT और अन्य AI. वे किसी भी भाषा में किसी भी कंट्रोल-सी सामग्री को आदेश देते ही अनुवाद कर देते हैं और फिर... और फिर और अधिक उसे सरस-सरल करने के लिए पूछते हैं।
• अनुवादक चाहें तो ख़ुद को भाषा संपादक या प्रस्तोता या इच्छाधारी कह लें, क्योंकि वे अब अनुवादक नहीं दिख रहे हैं।
ChatGPT क्या करता है :
वह लॉन्ग डैस, पंक्चुयेशन की अतिशुद्धता से लैस अनूदित व्यंजन तैयार करता है। बीस-तीस हज़ार शब्द के भुगतानरहित अनुवाद करने वाले फ़र्ज़ी अनुवादक-बंधु चाहें तो ये सब प्रपंच सीखकर क़ायदे से बाक़ायदा हो जाएँ तो भी ठीक... यूँ इस तरह श्रेष्ठ से श्रेष्ठ जगह या निकृष्ट से निकृष्ट जगह कहीं भी छपकर उघाड़ होते रहने में क्या धरा है! वेब-मंचों या कहीं के भी संपादक इसमें कुछ नहीं कर सकते; क्योंकि अनुवाद के मामले में ChatGPT आदि को करेक्ट करना वैसा ही है, जैसे मशीन को करेक्ट करके मनुष्य बनाना; जबकि मशीन में कुछ भी इनकरेक्ट था ही नहीं, लेकिन वह मनुष्य भी नहीं थी।
• शून्य को भी बिंदु कहा गया है और जीवन का आरोपण करने वाले वीर्य को भी। संभवतः इसीलिए शिव को बिंदुदेव और गर्भाधान के दिन को बिंदुवासर् कहा गया है। दो बिंदुओं के मेल से ही रेखाएँ बनती हैं। दो स्थितियों के बीच पुल का काम करने वाली स्थिति ही रेखा है। दो विपरीत बिंदुओं पर बैठे लोग इस तरह जुड़ें, इसके लिए यह मानना पड़ेगा कि स्थितियाँ कम से कम दो हैं। तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो!
• फ़ेसबुक भाँति-भाँति से होने की जगह है। इसकी व्याख्या मैं यहीं छोड़ देता हूँ। इस प्रसंग में सीधा प्रसंग यह है कि अगर कोई कवि फ़ेसबुक पर अपनी किताब ख़रीदने की अपील कर रहा हो तो उसे ऐसी सूचना नहीं देनी चाहिए : ‘किताब के दाम गिर गए हैं, मौक़ा है...’ इससे लोग यों समझते-कहते पाए जाते हैं :
कवि सस्ता हो गया है।
उसकी ख़रीद गिर गई है।
उसका मार्केट नहीं बन पा रहा।
उसका मामला ढीला हो गया है।
• कविता करिए! उसके संरक्षण के लिए उसे संकोचपूर्वक प्रकाशित करिए! उसके प्रसारण और स्वयं के अतिशय प्रकाशन के लिए कविता-इतर हरकतें न कीजिए! दद्दा या दीदीवाद में बिल्कुल न पड़िए! कविता-संग्रहों पर सस्ती लेख-शृंखला आहूत न कीजिए! मंच या पुरस्कार... कविता नहीं दे सकते। ये सब दोष दे सकते हैं। कवि स्वयं सांसारिक दोषों के प्रक्षालन से पंक्ति पाता है। उसे कविता को साधन बनाकर दोष नहीं अर्जित करना चाहिए। उसे गिरा हुआ, घिघियाता हुआ, लिथड़ा हुआ पाकर कविता लौट जाती है।
• चुग़लख़ोरी, मस्काबाज़ी और दूसरों को लक्षित करके की गई गुटबाज़ी जैसे बातें कविता के लिए सुपात्र हृदय नहीं बचा पाती हैं। फिर आप फ़ॉर्मूलेबाज़ी, फ़ैशनपरस्ती और अपच मिटाने के लिए इनो पीने जैसी क्षणिक हरकतें करते पाए जाते हैं या अक्सर अवसाद में....
• कुरु कर्म त्यजेति च...
— महाभारत | वनपर्व | २/७४
कर्म करिए और फिर उसका त्याग भी करिए! कविता के लिए उपरोक्त कुछ सबक़ ही उसके अर्जन के त्याग हैं। यह अध्ययन से आता है, साधना और सत्य के अनुसरण से आता है। लोभी जनों के लिए कविता जैसी महान् युक्ति नहीं बनी है। अन्य अनेक काम हैं, उन्हें करना चाहिए।
• रेमंड विलियम्स ने अपने एक निबंध में कहा है : “अच्छी गुणवत्ता का निजी जीवन जी रहे लोग, प्रकाशित होने वाली हल्की-छिछली ‘भावनाओं और विचारों’ से एकदम संतुष्ट पाए जाते हैं।”
• हल्के या ख़राब व्यंजन की गंध ही उसका परिचय है। सारी इंद्रियाँ सही हों तो ख़राबियों से बचा जा सकता है। ख़राबियों के लगातार सेवन से और ख़राबियाँ पैदा होती हैं, जैसे एक बीमारी से दूसरी बीमारी जन्म लेती है।
ख़याल रखिए!
फिर मिलेंगे...
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बिंदुघाटी का प्रथम सत्र यहाँ पढ़ सकते हैं : बिंदुघाटी
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