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जब डोलै पुरवा पवन धीरे-धीरे

jab Dolai purva pavan dhire dhire

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

जब डोलै पुरवा पवन धीरे-धीरे

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    जब डोलै पुरवा पवन धीरे-धीरे,

    सुधि आवैं हमरे सजन धीरे-धीरे,

    केतना मनाई पर ना मानै मनवा,

    आफत मा परिगवा हमरा परनवा,

    अब करबै कउनो जतन धीरे-धीरे।

    जब डोलै पुरवा...

    जब रे बदरिया अँगनवा बरसै,

    रहि-रहि के जियरा पिरितिया के तरसै

    होइगा बेदर्दी गगन धीरे-धीरे।

    जब डोलै पुरवा...

    कब ताँई देखते रहब हम सपना,

    कबहूँ तो अइहैं बहार मोरे अँगना,

    बिपतिया कै होई पतन धीरे-धीरे।

    जब डोलै पुरवा...

    कइयो बरस भवा आई पतिया,

    जियरा से बिसरै पिया की सुरतिया,

    कब अइहैं अपने वतन धीरे-धीरे

    जब डोलै पुरवा...

    तोहरे बिना जग सारा बेगाना,

    सोहे दीपक ना ही परवाना,

    गल नाही जाय मोर बदन धीरे-धीरे।

    जब डोलै पुरवा...

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 21)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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