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हम : एकटा पंछी

hum ha ekta panchhi

छत्रानन्द सिंह झा

छत्रानन्द सिंह झा

हम : एकटा पंछी

छत्रानन्द सिंह झा

और अधिकछत्रानन्द सिंह झा

    सजल-सजायल चितापर

    लाल-लाल धधरा बीच

    आशा-आकांक्षाक कफन ओढ़ा

    हमर प्रेमकेँ डाहि देल गेल।

    प्रेम : एकटा उड़ैत पंछी

    नहि चाहैत अछि पिजरा,

    कारण उड़ब ओकर प्रकृति छैक

    निर्बंध, निर्विकार।

    पिजरा सोनाक हो आकि लोहाक

    पिजरा, पिजरा थिक,

    नीक-नीक भोजन—

    सरस-सुस्वादु, मनोनुकूल

    कहाँ जगा सकलै मोह!

    अपन निर्बल लोल

    आकि चाङुरसँ

    पिजराक फाटककेँ तोड़ि

    उड़ि जयबाक असफल प्रयासमे

    पंछी अपन नियतिकेँ भोगैत अछि।

    हम नियतिके पिजरामे

    बंद छी—ई सत्य अछि।

    धीया-पूताक कौतुक, सीतारामक रट

    हमर शरीरक घेरायल मोन

    पोस कहाँ मानैत अछि!

    सुरम्य प्रकृति, नील हरित आकाश

    उन्मुक्त सिहकी, पुष्पित गाछ-वृक्षक डारि-पात

    कखनो कऽ आकर्षित करैत अछि

    तेँ,

    हमर पाँखि काटि देल जाइत अछि।

    एकर अर्थ नहि जे हम

    उड़ऽ नहि चाहैत छी।

    हमर मोन एहि पिंजराकेँ

    तोड़ि-ताड़ि उड़ि जाय चाहैत अछि

    हम उड़बाक चेष्टो करैत छी,

    मुदा अपन कटल पाँखि

    अपन छेकल पौरुष देखि

    हमर उत्साह

    छटपटा उठैत अछि;

    हारल-थाकल मोनसँ

    मात्र एकटा शब्द—

    अस्फुट शब्द निकलैत अछि—

    आह!

    स्रोत :
    • पुस्तक : एक गुलाबक लेल (पृष्ठ 37)
    • रचनाकार : छत्रानन्द सिंह झा
    • प्रकाशन : नीलकण्ठ प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 1988

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