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हम दहात रह जात बानी

hum dahat rah jaat bani

ब्रजभूषण मिश्र

ब्रजभूषण मिश्र

हम दहात रह जात बानी

ब्रजभूषण मिश्र

और अधिकब्रजभूषण मिश्र

    तोहार आँखिन के

    भाव

    मन के व्यथा

    हम साफ-साफ

    देख रहल बानी।

    असमय

    तोहार झुरिआइल चेहरा

    जइसे नक्शा होखे

    टुकड़ा-टुकड़ा खेतन के

    सिंउठाइल चमड़ी

    मरूथल के रेत।

    जब कवनो आपन

    कवनो अपने से

    कटे लागेला,

    आपुस में

    बँटे के सवाल

    उठ के खाड़ हो जाला;

    तब,

    घाव पकला के बाद

    होखे वाली

    पीड़ा बेचैनी

    तोहरा आँखिन के कोर से

    झाँके लागेला।

    तोहार फाटल लूगा

    सीये के हर कोशिश

    बेकार भइल जा रहल बा;

    काहे से कि

    सूई बहुते पातर बा;

    लूगा—

    बहुते झाँझर हो गइल बा;

    डोरा के सूत—

    बहुते कच्चा बा-टूट जात बा;

    गते-गते सब केहू

    अलगे-अलगे छूट जात बा।

    सब के छुटला के दुख,

    कच्चा सनेह के

    टुटला के दरद,

    तोहार भावुक दिल में

    हम डूबल चाहत बानी;

    बाकिर,

    ऊपरे-ऊपर

    रह जात बानी दहात।

    स्रोत :
    • पुस्तक : खरकत जमीन बजरत आसमान (पृष्ठ 33)
    • रचनाकार : ब्रजभूषण मिश्र
    • प्रकाशन : वनांचल प्रकाशन, तेनुघाट (बोकारो)
    • संस्करण : 2015

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