Font by Mehr Nastaliq Web

गाँव और ज़िम्मेदारियों का दुख

gaanv aur zimmedariyon ka dukh

अंकित कुमार

अंकित कुमार

गाँव और ज़िम्मेदारियों का दुख

अंकित कुमार

और अधिकअंकित कुमार

    गाँव छोड़ते समय कोई केवल गाँव नहीं छोड़ता,

    वह पीछे छोड़ आता है आँगन में खड़ी बूढ़ी माँ,

    खपरैल पर उतरती धूप, और खेतों की मेड़ों पर

    अपने नाम की आख़िरी परछाइयाँ

    शहर आने वाले लड़कों के पास सूटकेस कम होते हैं

    ज़िम्मेदारियाँ ज़्यादा

    उनकी जेबों में सपनों से पहले घर का राशन होता है, बहन की पढ़ाई,

    पिता की दवा, और हर महीने भेजे जाने वाले कुछ रुपए

    वे जब हँसते हैं, तब भी भीतर कहीं कोई हिसाब लग रहा होता है

    गाँव के लड़के अक्सर समय से पहले बड़े हो जाते हैं

    उनकी उम्र बीस-पच्चीस होती है,

    मगर आँखों में चालीस साल की थकान उतर आती है

    उन्हें प्रेम भी होता है, पर वे प्रेम से पहले रोज़गार चुनते हैं

    उन्हें कविताएँ भी अच्छी लगती हैं,

    पर कविताओं से पहले बिजली का बिल भरना पड़ता है

    शहर वालों को लगता है कि वे नौकरी कर रहे हैं,

    पर सच यह है कि वे अपने कंधों पर एक पूरा गाँव ढो रहे होते हैं

    उनकी कमीज़ की सिलवटों में खेतों की प्यास छिपी होती है,

    और उनकी नींद में अधूरी फसलों की चिंता

    सबसे बड़ा दुख यह नहीं कि वे गाँव से दूर हैं,

    दुख यह है कि वे कभी पूरी तरह शहर के भी नहीं हो पाते

    उनका मन दो जगहों में बँटा रहता है एक जगह जहाँ वे रहते हैं,

    और दूसरी जगह जहाँ उनके होने का कारण रहता है

    रात के किसी सन्नाटे में जब दुनिया सो रही होती है,

    वे मोबाइल की स्क्रीन पर घर की तस्वीर देखते हैं और सोचते हैं

    क्या ज़िम्मेदारियाँ पूरी होने तक बचा रहेगा वह गाँव,

    जिसे बचाने के लिए हमने अपना पूरा यौवन दे दिया?

    स्रोत :
    • रचनाकार : अंकित कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY