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एकालाप

ekalap

अपन-अपन मोनकेँ

एक-दोसराकेँ सुनझा

परस्पर कर्तव्य-बोध करबैत

जीवन-पथपर एक संग चलबाक

हम-अहाँ संकल्प कयने रही।

जहिया-कहियो,

जतऽ कतौ भेटी

संकल्पक परीक्षा दैत-लैत रही।

बहुत दिन धरि अपन अमानति बुझि

दायित्वक परीक्षा

हम-अहाँ पास करैत रहलहुँ।

मुदा एक दिन—

बीच बाटपर

एकटा मोन,

धूरा-गर्दामे सानल-छटपटाइत

हमरा देखा पड़ल।

हम चौंकि उठल रही

लग जाकऽ देखबाक हिम्मति

कोनहुना जुटा सकल रही।

ठीके एकटा मोन छल,

नवजात मोन—भावुकता, संवेदना, निष्ठा

नहि जानि की-की लागल,

ठीके, एन-मेन हमरे मोन-सन।

हमरा विश्वास नहि भेल

हम बेर-बेर ओहि मोनकेँ

उनटा-पुनटा,

अन्दर-बाहर देखैत रहलहुँ।

ठीके,ओ हमस मोन छल!

हम मर्माहत भऽ उठल छलहुँ

कखनो कऽ आश्चर्यितो।

आ, लगले अहाँसँ जाकऽ पुछने रही

अपन मोनक मादे

अपन धरोहरिक मादे

तँ अहाँ निर्विकार भऽ उत्तर देने रही—

मोन?...ककर मोन?

लऽ दऽ कऽ एकटा मोन छल—

निष्कलुष, निश्छल, निर्लिप्त

कहियो अहाँक छल।

आ, अपमानक बोझसँ लदल हम

अहुछिया कटैत

घुरि आयल छलहुँ।

मोन राखब—

अहाँक मोन हमर 'लॉकर'मे अखनो बंद अछि

डेरायब नहि,

हम बैमान नहि छी।

अहाँ जहिये कहब, घुरा देब।

मुदा एकटा शर्त अछि—

अहाँ अपन मोनकेँ

हमरासँ आपस लऽ अनका राखऽ नहि देबैक

हमर निष्प्राण शरीरमे आगिक लहास उठत

भिन्न बात जे अहाँ रत्नगर्भा छी

सहस्रो मोनक रानी छी।

अहाँक विशालताक आगाँ

हमर कोनो मोल नहि,

तथापि अहाँक मोनकेँ आजीवन

अपना लग सुरक्षित रखबाक लेल

हम अखनो पैघ छी।

स्रोत :
  • पुस्तक : एक गुलाबक लेल (पृष्ठ 41)
  • रचनाकार : छत्रानन्द सिंह झा
  • प्रकाशन : नीलकण्ठ प्रकाशन, पटना
  • संस्करण : 1988

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