मिलन टॉकीज : एक झलक का इंतज़ार
शंखधर दुबे
08 अप्रैल 2026
पूर्वी उत्तर प्रदेश में गौना उर्फ़ द्विरागमन प्रथा तब तक विद्यमान थी, जिसके तहत शादी के बाद वर अकेले कुछ स्मृतियों और तमाम ‘अनजाने’ स्पर्शों कंपकंपाहटों, कपड़ों की सरसराहटों, हाथों के मेहंदी की गहन गंध लिए वापस लौट आता था। वधू अपने घर रह जाती थी। अमित बेरोज़गारी और शोध के ऐसे मोड़ पर खड़ा था कि जहाँ उसे रोज़ ही सौ पचास वॉट के झटके लगने और सहने का अभ्यास हो चुका था। शादी के लिए उसकी राय नहीं ली गई थी, उसे सीधे ख़बर दी गई थी। ‘निर्मल वर्मा के उपन्यासों में अस्तित्ववाद और अलगाव’ विषय पर शोधरत अमित के लिए अपने आप में एक बड़ा झटका था, लेकिन भाभी की फ़ोटो देखकर विद्रोह ख़ुद-ब-ख़ुद शमित हो गया था और बात इस तिय पर टिक गई थी कि माँ-बाप औलाद के दुश्मन नहीं होते। यह भी कि जिन्होंने पाल-पोस कर इतना बड़ा किया है, वे हमारा हित-अनहित को हमसे बेहतर जानते हैं।
ग़लती अमित की न थी। उन दिनों स्त्री सानिध्य लगभग दुर्लभ था। कुछ भाग्यशालियों को छोड़ दिया जाए तो मध्यम श्रेणी के विद्यार्थियों के हाथ कुछ न आता था। वे दिन भर के महान् विचारों के दिव्य अनुभव के बीच रात होते ही दयनीय हो जाते थे और कबूतर-बिल्ली का खेल खेलते थे। कुल मिलाकर समय इतना ख़राब था कि स्त्री सानिध्य के लिए बियाह करना पड़ता था। यह वह समय था, जब लोग बियाह करने के लिए व्याकुल रहते थे। और प्रेम? इतना विरल था कि हाथ मिलाना तक चरम सुख का सबब हुआ करता था। प्रेम और वासना का द्वंद्व चलता था। अमित और हम जैसे लोगों के हिस्से सिर्फ़ प्रेम आता था और गले में अच्छे बच्चे का सर्टिफ़िकेट लटका था, जिससे दम घुटता था। हम वासना का गला घोंटने को ही कामयाबी और जीत मानते थे।
ऐसे ही मरु का मारा मिलन के तसव्वुर में खोया अमित जिसके लिए तैयार था, उसके बुज़ुर्ग तैयार नहीं थे। यानि शादी के बाद विदाई नहीं हुईं थी।
“गौना साल के भीतर या फिर तीसरी साल में होगा।”
अब अमित एक बार फिर विद्रोही हो रहा था। उसकी राय थी कि जब विदाई ही नहीं करनी थी तो शादी के लिए काहे जल्दी मचाए थे। साथ ही यह भी कि अपना बोझ हल्का कर लिए और हमारा बढ़ा दिए।
अमित नाराज़ था। अमित अपने पिता से नाराज़ था। अमित अपने पिता के पिता से नाराज़ था। अमित भाभी जी के पिता से भी नाराज़ था। अमित उन पुरोहितों से नाराज़ था, जिन्होंने किसी भी परिस्थिति में यह यौवनहंता परिपाटी शुरू की थी। संक्षेप में अमित सामान्य रूप से दुनिया भर से और विशेष रूप से पितृसत्तात्मक संस्थाओं से नाराज़ था। अमित के दुखों में सर्वथा एक नया आयाम यह जुड़ गया था कि उसके पास नोकिया का एक फ़ोन था, पर तब तक भाभी जी के पास फ़ोन नहीं था। कभी वह अगर अपने ससुर जी के फ़ोन पर फ़ोन करता तो वह ख़ुद इतनी देर बात करते थे कि अमित का बिल और दिल दोनों ही बैठ जाते थे। ऊपर से ससुर जी ख़ुद हिंदी साहित्य में एमए थे। अज्ञेय और श्रीनरेश मेहता जैसे चोटी के कवियों और लेखकों से मिल चुके थे। वह ख़ुद अपने नए-नवेले दामाद से साहित्य की नई प्रवृत्तियों पर सतत शास्त्रार्थ चाहते थे।
विडंबना यह थी कि जीवन से ऊबे ससुर जी साहित्य में घुसना चाह रहे थे और इधर साहित्य से ऊबा अमित जीवन में घुसना चाह रहा था। इन सबसे दूर, बहुत दूर फ़िलहाल संस्कारी अमित ‘छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है’ विषय पर चर्चा कर रहा था। इधर उसका ख़ुद का पापी मन उसके विरुद्ध विद्रोह पर अमादा था। परिवार के प्रति आग्रही अमित यह तक पूछने पर कि ‘बाबू जी सीमा कैसी है?’ सौ बार जीता-मरता था।
इन सब दुश्वारियों के बीच भाग्य को लेकर लगभग नास्तिक हो चले और एक्लठ्ठू घूमने वाले अमित का भाग्य फिर मुस्कुराया। इस बात की अभिव्यक्ति अमित के चेहरे पर देखी जा सकती थी। कुछ ऐसा था—जिसके बारे में अमित मुझसे बात करना चाह रहा था। साथ ही कुछ ऐसा भी था—जिसके बारे में अमित मुझसे बात नहीं करना चाहता था। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। वह अजीब-सी हरकतें कर रहा था। ऐसा नहीं था कि वह पहले हरकतें नहीं करता था, पर इस बार उसकी हरकतें ज़्यादा जेनुइन और असहज रूप से सहज थीं। वह खखार से नाराज़ नहीं था, वह रात को उठ-उठ कर उर्र-उर्र करता था, गाने लगता था, सिसकियाँ लेता था, घुटने मोड़कर टूटे तख़त पर इतने ज़ोर से पैर हिलाता था कि तख़त कराह उठता था। इस कराह के साथ वह भी ख़ुद कराह उठता था और इस उद्घोषणा के साथ कि मैं आ रहा हूँ, बाहें फैलाए फ़र्श पर लद्द से गिर जाता था।
बताने और छुपाने के बीच जो उसने बताया, वह यह था कि अमित के ससुर जी [जो उत्तराखंड पॉवर कारपोरेशन में बड़े अधिकारी थे] अपने पूरे कुनबे—जिसमें सीमा भाभी जी भी शामिल थीं—के साथ फिर वापस वाया लखनऊ, गुजरात जा रहे थे। हर मोर्चे पर नाउम्मीद अमित को भाभी जी की एक झलक देखने का सुअवसर मिल रहा था। यह सब हरकतें प्रत्यक्ष रूप से उसी का सुपरिणाम थीं।
ट्रेन एक ख़ास दिन एक ख़ास समय पर लखनऊ से होकर गुज़रनी थी। अमित उस दिन को और ख़ास बनाना चाहता था क्योंकि उसे यक़ीन था, ट्रेन लखनऊ से नहीं उसके दिल से होकर गुज़र रही थी— जिसकी थरथराहट उसके आस-पास के लोगों तक को महसूस हो रही थी। वह एक सप्ताह से ही तैयारी में लग गया था। उसने मुझे इस हिदायत के साथ अपने मिशन में जोड़ा कि मैं इस बारे में किसी से कोई बात नहीं करूँगा। मेरे ‘न’ बताने के बावजूद यह बात आम हो गई थी। इस बात से अमित मुझसे नाराज़ था, पर फ़िलहाल उसके पास असिस्टेंट के रूप में कोई नहीं था। लिहाज़ा मज़बूरी में ही सही वह मुझ जैसे ‘अविश्वनीय’ पार्टनर को अपने साथ ले जाने के लिए विवश था।
लखनऊ जैसे शहर में यूनिसेक्स जैसी संस्कृति—जिसे अमित इससे पहले तक अपसंस्कृति मानता था—पैर पसार रही थी। अमित ने कई किस्तों में, अच्छा-ख़ासा समय लगवाकर, कडकी के दौर में भी ठीक-ठाक पैसा ख़र्च किया और तैयार हुआ। शादी में जिस शेरवानी को वह समयाभाव के कारण पहन नहीं पाया था—इतनी विकट गर्मी में, मेरे मना करने के बावजूद—फ़िलहाल उसे ही पहनकर तैयार हुआ था। मेरी सलाह यह थी कि उसे हिंदी साहित्य में एमए अपने ससुर के पास ग्रेसफ़ुल अंदाज़ में जाना चाहिए न कि तड़क-भड़क वाले परिधान में। अमित ने फ़िलहाल बांगड़ूपने का नमूना ठहराकर मेरे सुझाव को खारिज कर दिया और उल्टे मुझे सूचना दी कि इतने भारी-भरकम मेकअप और इस तैयारी के साथ मै सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी सीमा से मिलने जा रहा हूँ। ससुर से मिलवाने के लिए तुम्हें ले जा रहा हूँ, तुम दोनों करते रहना—साहित्य समाज का दर्पण है।
अमित ने एक्स्क्लूसिवली भाभी जी के लिए सफ़र में खाने-पीने की कुछ चीज़ें—केक, पेस्ट्री, मेवे और खम्बे जैसी चॉकलेट ले रखी थी। ऊपर से प्रचुरता में डियो छिड़का था। उसने कहीं सुना था कि चॉकलेट प्यार बढ़ाता है, लेकिन किसका बढ़ाता है, पता नहीं! उसका प्यार तो पहले ही विस्फ़ोटक स्तर तक पहुँच चुका था। उक्त तोहफ़ों को बंदर के बच्चे की तरह अपने सीने से लगाए और कई-कई प्रकाशवर्ष इन चीज़ों के लिए कोई भौतिक ख़तरा न होने के बावजूद बीच-बीच में मुझे अलर्ट रहने की हिदयात के साथ-साथ न सिर्फ़ मुझे, बल्कि ऑटोवाले को भी डाँट रहा था। स्टेशन से बाहर स्वाभाविक रूप से कीचड़ और गंदगी थी। एक जगह कीचड़ जम्प करने के चक्कर में मैं रपट गया, लेकिन हाथ ऊपर किए रहा—कारण : गिफ्ट की पोटरिया मेरे हाथ में थी और अगर पोटरिया कीचड़ में सनती तो अमित मुझे ज़रूर धोता।
हम स्टेशन पहुँचे। उम्मीद के मुताबिक़ प्लेटफ़ॉर्म पर भारी-भरकम भीड़ थी। उम्मीद के सर्वथा विपरीत ट्रेन समय से थी। अमित को डर था कि इस भीड़ में इतनी घातक तैयारी के बावजूद उसकी पर्सनालिटी उभर कर सामने नहीं आ पाएगी और वह अलक्षित ही रह जाएगा। एस 5 के सामने ही एक और युवा फ़ॉर्मल परिधान में प्लेटफ़ॉर्म के शोर-शराबे के बीच बिजनेस स्टैण्डर्ड समाचार पढ़ रहा था। वह बहुत सहजता से बैठा अख़बार पढ़ रहा था। अमित को अपना दुश्मन और प्रतिद्वंदी मिल गया था। अमित को सुबहा था कि इसे कहीं आना-जाना नहीं था और यह फ़िलहाल हमें नीचा दिखाने के लिए यहाँ आया है। इंतज़ार की बेचैनी, मेकअप और गर्मी के चलते अमित के चेहरे पर गुच्छे में पसीने की बूँदें उपट रही थीं, लेकिन अमित उस पतली आवाज़ वाले फ़ॉर्मल युवक को इनफ़ॉर्मल तरीक़े से उखाड़ने में लगा हुआ था। किसी जमें को उखाड़ना अमित का शग़ल है। फ़िलहाल अमित अपने इस शग़ल में इतना खो गया था कि भूल ही गया था कि वह किसी के इंतज़ार में यहाँ आया है।
स्टेशन पर उस गाड़ी विशेष के प्लेटफ़ॉर्म विशेष पर आने की घोषणा के साथ ही उसका दिल पसलीतोड़ गति से धड़कने लगा। उसकी समूची देह आँख हो गई। अमित ट्रेन को और मैं अमित को देख रहा था। ट्रेन रुकते ही भागमभाग मच गई थी। उतरने वाले जो थे, वे धक्का खाकर ऊपर चढ़ गए; चढ़ने वाले धक्का खाकर नीचे आ गए। वे फिर अपने-अपने मिशन में लग गए थे। बीच में वेंडरों ने ट्रेन पर हमला बोल दिया था। जो अंदर नहीं घुस नहीं पाए थे, वे बाहर से मनोहर कहानियाँ बेच रहे थे। मनोहर कहानियों से टकरा रहे थे। अमित को उम्मीद नहीं थी कि दुनिया इतनी बेरहम हो जाएगी और फ़िलहाल उनकी रोमांटिक डेट इस तरह की त्रासद और हास्यास्पद हो चलेगी। बड़ी मुश्किल से धक्का देते हुए और धक्का खाते हुए अमित इस चक्रव्यूह में दाख़िल हो पाया।
अभी भाभी की अनुराग, झिझक और इंतज़ार के कच्चे दूध से भरी आँखें, वह देख भी नहीं पाया था कि आदरणीय ससुर जी ने उसे दस लीटर का एक मयूर जग पकड़ा दिया। उसे, जिसको उसी अवस्था से गुज़रकर भरना था। अमित उम्मीद से मेरी तरफ़ और मैं दुगुनी उम्मीद से किसी और की तरफ़ देख रहा था। लाचार अमित अपने पैर घसीटते हुए पनघट की तरफ़ जा रहा था। चिल्ल-पों के बीच जब तक वह पानी लेकर लौट पाता, ट्रेन रेंगना शुरू कर दी थी। बड़ी मुश्किल से अमित गेट पर हाथ बढ़ाए खड़े ससुर जी को पानी दे सका और उनका पैर छू सका—सम्प्रति जो उसका मुख्य प्रयोजन नहीं था। इस चक्कर में वह भीग और ज़रूर गया था।
खिड़की से अंदर देखने पर अमित ने पाया कि उसकी मासूम भेंटों अर्थात् केक, पेस्ट्री और मेवे को कुछ बच्चे कुतर रहे थे। एक बच्चा उसके खंबे जैसे चॉकलेट को संतोष भाव से इतना बड़ा-बड़ा मुँह खोलकर खा रहा था कि अमित को डर था—यह अगर इसी गति से खाता रहा तो जल्दी ही ब्रह्मांड भी खा जाएगा। ग़ुस्से में अमित ने पैर घसीट कर इतने ज़ोर से पटका कि उसकी पहली बार पहनी गई जूती रेंगती ट्रेन के नीचे घुस गई। उस दिन अगर कोई अमित ने कहता कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं तो अमित उसे कसकर चपाट ज़रूर मार देता। उधर मुख्य प्रयोजन ख़ुद खिड़की के बाहर गुमसुम-सी देख रही थी। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि चलती ट्रेन में स्टेशन से आख़िरी बार विदा लेने के क्रम में कोई ठेले से टकरा भी जाएगा, लेकिन फिर भी अमित टकरा गया। हम अपने प्रिय लोगों से सौ बार अंतिम विदा लेने के बावजूद उनकी जाने की दिशा में अपनी आँखें टाँक कर रखते हैं। ट्रेन टिमटिमाते शून्य में तब्दील हो गई। अमित को याद आया जूती निकालनी है जो बीच से दो भागों में बँट गई थी। अमित ने पंजे और एड़ी अलग-अलग पहनने की कोशिश की पर कोई फायदा न हुआ, लिहाज़ा उन्हें मेरी जेब के हवाले किया गया। आधी रात के बाद घर पहुँचने पर पता चला कि मकान मालिक मेन गेट पर भौंड़ा ताला जड़कर लापता है। बाहर खड़े एक ठेले पर सन्नाटे में रात काटी गई। सितम यहीं ख़त्म नहीं हुआ, भाभी जी से ‘मिलने’ की ख़ुशी में अमित को भूप सर से कर्ज़ लेकर संस्थान की दर्जन भर लड़कियों और लडकों को पार्टी भी देनी पड़ी थी।
लाइब्रेरी में बैठ-बैठ कर, कई-कई शाइरों का कॉपीराइट मार-मार कर, कई-कई रातें जाग-जाग कर उसने जो घातक प्रेमपत्र लिखा था—तीन दिन बाद उसके ख़ुद के पर्स में मिला...
ख़ुदा-ए-सुखन मीर पूछ रहे थे—
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
इसका क्या असर हुआ बरख़ुरदार???
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