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भूल ना पाओगे

bhool na paoge

महिमा श्रीवास्तव

महिमा श्रीवास्तव

भूल ना पाओगे

महिमा श्रीवास्तव

और अधिकमहिमा श्रीवास्तव

    जब थकी यामिनी

    चाँद को पुकार

    झुरमुटों के साए में

    गहरी हरी दूब

    के नर्म बिछौने पर

    करवटें बदले

    या फिर जब

    पौ फटने में

    तनिक समय हो

    भोर का तारा

    दिपदिप नभ में

    चमक रहा हो

    कमल पर स्वाति

    अलसाई-सी पड़ी हो

    पर्वतों कि चोटियाँ

    तमस में लिपटीं हों।

    झील के ऊपर

    एकाकी नौका भी

    हिचकोले ले रही हो

    ठीक उसी समय

    तुम्हारे स्वप्न में

    हौले से बिना आहट

    बिना पूछे ही

    मैं झिझकती-सी

    चली आऊंगी।

    कुछ अनकही रह गई

    बात सुना जाऊँगी

    बिना पलट कर देखे

    छोड़ जाने का

    मधुर उलाहना

    भी दे पाऊँगी

    अश्रु मोती छुपा

    खनकती हँसी का

    जलतरंग बजाऊँगी

    तुम नींद में ही सही

    हौले से मुस्कुरा दोगे

    इतना तो विश्वास है

    तुम मुझे अधमुँदी पलकों

    के द्वार से इस बार

    लौटा ना पाओगे

    तुम मुझे स्वप्न

    में भी अब कभी

    भूल ना पाओगे।

    स्रोत :
    • रचनाकार : महिमा श्रीवास्तव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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