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भात...

bhaat. . .

भात पकाकर माँ ने ताँबें के बर्तन में रखकर केले के पेड़ के नीचे रख छोड़ा,

पिता की आयु स्वर्ग से खींचती रही

भात, उबले आलू और मधु से भिक्षुणी को विदा किया

भात पकाया जब जब पिता ने, बेचे हुए खेतों के क़िस्से बार बार सुनाए

भात परोसती माँ को पिता पौलमी, यमी, शचि, कामायनी, सुतम्भरा जाने क्या क्या कहते रहे

चार दानें जो छूट जाते थाली में भात के, दादी चिल्लाती भात का सम्मान इंद्र से भी बड़ा है,

एक दाना बचे थाली में

चावल की बोरियाँ ग्राम से जाती थीं वर्ष में

एकाध बार, परंतु उससे काम चलता

दो बेला भात की जुगत में पिता के देह का रंग भात से उतर कर कोयला होता रहा

भात से उठते धुएँ में ही पढ़ाई की

भात के पानी से त्वचा चमकाई

भात के माँड से ही सूती कुर्ते और साड़ियाँ कड़क होते रहे

शरीर में विटामिन ई, बी और सी बढ़ाया

भात ही पूजा में दुग्गा को चढ़ाया

बचा भात भिक्षुकों को खिलाया

सप्ताह में तीन दिन पाँता भात बनता

खाते-खाते सात योजनाएँ बन जातीं

छः विफल रहती

बासी भात खा खाकर ही पुरनेंदू चैटर्जी ने अपना अल्सर ठीक किया

कोई बहुत बड़ा नाम नहीं ये, हमारे पड़ोसी थे

पत्नी मर चुकी थी, कई दिनों तक नून भात खाया, माटी में पड़े रहे

कोई बीस एक दिन तक हम सब्ज़ी, मछली देते रहे

भात की चिंता में ही पुनः उठ खड़े हुए

कितने भातमयी हैं हम बंगाली

अपने अलावा कुत्तों, बिल्लियों, पक्षियों, चीटियों, मछलियों, तोतों को भी भात ही खिलाते रहे हैं

भात पके जब, वह दिन हमें डरा देता है

क्या ही माँगता है भात हमसें नम जलवायु और थोड़ा सूर्य

देश में भात खाने वालों को मिलता रहे और भात,

ऐसा कह कह के पंडित जी फेरा पाते थे गली में

भात ही त्रिदेव का कारक है, समयकाल भात का ही जना है

भात खाते खाते ही जानी अपनों के मन की बात

किसने किससे प्रेम किया, किसने किसे छला, किसने चूम लिया किसे,

किसने क्या लिखा, कौन कितना धनेश बना,

मूखे भात में किसने पहने सबसे सुंदर वस्त्र,

पोखर के समीप प्रेमपत्र किसने किसे दिया

इस सब की ख़बर भात खाते-खाते ही मिली

अन्न, धन, गहने में सबसे बड़ा चरित्र भात ही बना रहा

भात मात्र भात हुआ प्राण हुआ भात हमारा

कोई आता तो भात ही लेकर आता

कोई जाता तो भात ही खाकर जाता

भात पकाने के लिए डिब्बे से चावल निकालते समय

माँ तीन चुटकी चावल वापस डाल देती थी डिब्बे में

इससे बरकत होती है, ऐसा मानती थी

मछली का काँटा फँसा दाँत में कई बार, भात कभी फँसा

भात फँसता फाँसता

भात तो शीतलता ही देता रहा

भात से ही बने मेरे दाँत, मेरी हड्डी, मेरी देह

भात ने ही मुझे जिलाए रखा

भात पचने पर ही बना रस, रस से रक्त बना, रक्त से ही सब बना

माँ का गर्भ, पिता का वीर्य सब भात से ही बना

भात से ही बनी हूँ मैं

रोटी की तरह भात भी एक महापृथ्वी है

भात कभी ख़त्म होने वाला समय है।

स्रोत :
  • रचनाकार : जोशना बैनर्जी आडवानी
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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