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बहकर आई लकड़ी

bahkar aai lakDi

अनुवाद : देवेश पथ सारिया

म्याओ-यी तू

म्याओ-यी तू

बहकर आई लकड़ी

म्याओ-यी तू

और अधिकम्याओ-यी तू

    टीले के किनारे पर वह पुराना पेड़

    दृढ़ता से थामे रहता मिट्टी को

    वह डरता नहीं था बाढ़ से

    जो तहस-नहस कर देने वाली थी

    उसके अस्तित्व को

    बल्कि वह सिर उठाकर

    सूरज की तलाश करता

    उस सुंदर द्वीप के निवासी

    अपने कानों पर हाथ रखे रहते

    और नहीं सीखते आत्म-नियंत्रण

    उनके मन समृद्धि और सुंदरता में मग्न

    पेड़ जो लगातार कमज़ोर होता जा रहा था

    आख़िरकार बाढ़ द्वारा नदी में धकेल दिया गया

    वह बन गया एक बहती हुई लकड़ी

    अब भी अपनी धरती के गीत गाता हुआ

    शानदार द्वीप जो लगातार भ्रष्ट होता जा रहा था

    ज्वारभाटों द्वारा नष्ट कर दिया गया

    आत्म-अभिव्यक्ति में असमर्थ वह

    रह गया एक अस्थिहीन देह

    लकड़ी का वह बहता हुआ टुकड़ा

    किसी ने उठा लिया

    और अब वह पूजा जाता है

    किसी देवात्मा के अंश की तरह।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : म्याओ-यी तू

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