शांतिनिकेतन डायरी : ‘संगमन’ के दौरान
निहाल पराशर
02 अप्रैल 2026
22 नवंबर 2025, मुंबई
एयरपोर्ट पर हूँ। सुबह का समय है। सूर्योदय देख रहा हूँ। सुबह का शीतल सूर्य।
जीवन की आपाधापी में रोज़ एक दृश्य ऐसा दिखता है जो सुंदर है। हर किसी को अपने हिस्से का सौंदर्य मिल जाता है। कई बार सोचता हूँ कि कुछ भी ठीक नहीं है—इतना दुख है... फिर शांत मन से घर की बालकनी से सूर्यास्त देखता हूँ। ठहराव मिलता है।
ऐसा ही ठहराव अभी मिल रहा है—जब मैं इंतज़ार में बैठा हूँ। पहली बार शांतिनिकेतन जा रहा हूँ। पहली बार बंगाल में कलकत्ता के अलावा कुछ और देखूँगा। शांतिनिकेतन के बारे थोड़ा पढ़ा, थोड़ा जानता हूँ।
लेकिन मेरे मन में शांतिनिकेतन का एक चित्र बना हुआ है। इतने सालों में इतना कुछ सुनने के बाद किसी भी जगह का एक चित्र तो बन ही जाता है। जब अपनी आँखों से शांतिनिकेतन देखूँगा, तब देखूँगा। फ़िलहाल उसे देखने से पहले यहाँ लिख लेता हूँ।
मैं अपने चित्र में शांतिनिकेतन को बेहद शांत देखता हूँ। मेरे चित्र में टेक्नोलॉजी ने इस जगह को अपनी गिरफ़्त में नहीं लिया है। दूर तक फैला जंगल दिखता है। सुंदर दृश्य दिखते हैं। मेरे इस चित्र में कच्ची सड़क है, इस सड़क पर मोर चल रहे हैं। भीड़ नहीं है। यह जगह मुझे ‘warm colour pallet’ में दिखती है। विद्यार्थी दिखते हैं—बाक़ी देश से अलग कपड़ों में। संगीत सुनाई देता है—रवींद्र संगीत...
दरअस्ल, मैं शांतिनिकेतन को उस समय में देखता हूँ; जब रवींद्रनाथ वहाँ रहे होंगे। मैं जितना भी जानता हूँ, रवींद्रनाथ ठाकुर के बहाने ही जानता हूँ। जानता हूँ कि यह चित्र बचकाना है। जब भी किसी नए जगह जाता हूँ तो किसी न किसी तरह का आश्चर्य लेकर ही वापस आता हूँ। कई बार जगह वैसी नहीं होती, जैसा मैंने सोचा होता है। कई बार जैसा सोचा होता है, उसके बिल्कुल ही उलट होती है!
दुर्गापुर की हवाई-यात्रा है। फिर दो घंटे की सड़क-यात्रा। ऐसा पढ़ा है कि इस सत्तर किलोमीटर में जंगल भी दिखेंगे। सुंदर दृश्य होगा, ऐसा सोचता हूँ।
सौंदर्य जीवन में प्रवेश पा ही जाता है। इंसान जीवन में सौंदर्य खोज ही लेता है।
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22 नवंबर 2025, मुंबई और दुर्गापुर के रास्ते में
फ़िलहाल हवाई जहाज़ में हूँ। शांतिनिकेतन की ओर जा रहा हूँ। इस बार ‘संगमन’ का आयोजन शांतिनिकेतन में हो रहा है। मैं वहीं जा रहा हूँ।
तीन दशक पहले कथाकार प्रियंवद ने बहुत छोटे स्तर पर ‘संगमन’ की शुरुआत की थी—जहाँ बिना किसी औपचारिकता के लेखक मिलते हैं। अपनी बात रखते हैं। यह एक को-ऑपरेटिव मॉडल है। मैंने सबसे पहले ‘संगमन’ के बारे में अपने दोस्त मिथिलेश प्रियदर्शी से सुना था। वह शायद दो बार संगमन का हिस्सा बन चुके हैं। हिंदी साहित्यिक दुनिया से मैं बहुत दूर ही था। इस विषय में जो जानता हूँ, मिथिलेश के कारण ही जानता हूँ।
कुछ महीने पहले रायपुर में अविनाश मिश्र भाई से मिला। हम ‘हिन्द युग्म उत्सव’ में टकराए थे। मैं उन्हें जानता था, उनका लिखा पढ़ा था। लेकिन कभी मिला नहीं था। रायपुर में बहुत अच्छी पहली मुलाक़ात रही। मैं और अचल हमारी फ़िल्म ‘चार फूल हैं और दुनिया है’ लेकर रायपुर पहुँचे थे। विनोद कुमार शुक्ल से मिलना का बहाना था। लेकिन इसी बहाने कुछ और अच्छे लोगों से मिलना हुआ। बातचीत में ही अविनाश भाई ने ‘संगमन’ का ज़िक्र किया। मिथिलेश से इस आयोजन के बारे में इतना सुन चुका था। मैं तो इसका हिस्सा बनना ही चाहता था।
कुछ दिनों बाद हमारी फिर से बात हुई। फिर चंदन पांडेय जी से बात हुई जो शांतिनिकेतन में ही रहते हैं और इस बार के ‘संगमन’ के स्थानीय संयोजक हैं।
मिथिलेश भाई को भी इस बार ‘संगमन’ में होना था। लेकिन काम के कारण वह नहीं आ पाए हैं। मैं मिथिलेश भाई के साथ ही यहाँ जाना चाह रहा था। हमारा साथ घूमने का प्लान फिर से रह गया...
अब नए लेखकों से मिलूँगा। कुछ नया अनुभव लेकर वापस लौटूँगा। इस तरह के आयोजन में जब भी गया हूँ (तीन-चार बार ही किसी भी तरह के साहित्यिक आयोजनों का हिस्सा रहा हूँ—वनमाली कथा का एक इवेंट, भोपाल में; कथादेश का कथा सामख्या, छत्तीसगढ़ में; हिन्द युग्म के दो उत्सवों में—भोपाल और रायपुर में)—अच्छे अनुभव के साथ ही लौटा हूँ।
हर बार ‘संगमन’ में लेखक किसी एक तय विषय पर अपनी बात रखते हैं। इस बार का विषय है—‘मेरी रचनात्मकता : मेरे द्वंद्व’! कुछ लोग इस विषय पर अपना पेपर लिख कर लाएँगे। अपनी बात रखेंगे। मैंने पहले सोचा मैं सिर्फ़ सुनूँगा—जो मैं हमेशा करता भी हूँ, ऐसे आयोजनों में। लेकिन अभी विचार आ रहा है कि कुछ लिख लेता हूँ। भले ही बोलूँ न।
इस पूरे आयोजन को अपनी डायरी में दर्ज करने की इच्छा है। हर बार जब भी बाहर जाता हूँ—इंस्टाग्राम के लिए रील बनाता हूँ, तस्वीर लेता हूँ। इस बार तस्वीर शब्दों से भी ले सकूँ, ऐसा सोचता हूँ। सिर्फ़ चार दिनों के लिए यहाँ रहूँगा। कितना ही लिख लूँगा इन चार दिनों में, कह नहीं सकता। शायद कोई कहानी मिल जाए इन दिनों में...
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22 नवंबर 2025, हवाई जहाज़ में
‘संगमन’ के इस बार के विषय पर मेरे विचार :
किसी के भी क्या अंतर्द्वंद्व हो सकते हैं? इस बात पर सोचा है, पर लिखा कुछ नहीं।
मैं सिर्फ़ लेखक नहीं हूँ—मुंबई में रहने वाला लेखक हूँ। कुछ और भी हूँ। लेकिन जिस पहचान के साथ सबसे कम दिक़्क़त है—वह लेखक होना है।
लिखना मेरे लिए, अब, हॉबी भर नहीं है। व्यवसाय है। जब एकांत में कोई कहानी का आइडिया लिखता हूँ; जब ऐसा लगता है ठीक कुछ बन पाया है, तो अगले दिन बाज़ार में उस आइडिया को बेचने निकल जाता हूँ। लोगों को मेल भेजता हूँ, फ़ोन करता हूँ। कई बार के बाद एक मौक़ा ऐसा आता है, जब किसी को मेरा काम पसंद आता है। मीटिंग होती है। सब कुछ ठीक रहा तो पैसों की बात करने से लेकर काम करने तक का सफ़र तय होता है।
मैं इस काम से ख़ुश हूँ। यहाँ किसी तरह का दुख नहीं है। मैं अपने शब्दों से, अपनी कला से पैसे कमा कर, शब्द बेच कर एक बेहतर जीवन जी रहा हूँ।
मैं कुछ और भी हो सकता था, लेकिन लेखक होना ही चुना। इसके कई कारण रहे। पर धीरे-धीरे उन कारणों को भूलने लगा हूँ।
जब सोचता हूँ तो पाता हूँ, मेरे लिए लेखक होने के अंतर्द्वंद्व भी हैं। कई तरह के हैं।
मैं इन द्वंद्वों को अलग-अलग हिस्सों में देखता हूँ :
एक
लेखक की बोरियत
मेरे लिए बोरियत कभी भी निगेटिव शब्द नहीं रहा। जिस जनरेशन का हूँ, वहाँ सबसे बड़ा डर बोर होने का है। मेरे लिए द्वंद्व बोरियत और आलस के फ़र्क़ को न समझ पाने का है। लिखने का बड़ा कारण बोरियत है। बहुत उत्साह से भरी, जीवंत कहानी की शुरुआत अथाह बोरियत से हुई है। पर कई बार ऐसा होता है कि लिख भी नहीं पाता। सोचता हूँ बोरियत के कारण नहीं लिख पा रहा। पर असल कारण आलस है। मैं आलस से डरता हूँ। सुबह उठकर लिखने की कोशिश करता हूँ। जिम जाता हूँ—सिर्फ़ इस आलस से बचने के लिए।
दो
क्या लिखूँ का सवाल
यह द्वंद्व हमेशा रहता है। गूगल ड्राइव पर लिखता हूँ। कितने ही फ़ोल्डर बने हुए हैं—कहानी का ढाँचा, नॉवेल का स्ट्रक्चर, सीरीज आइडिया, फ़िल्म बाइबिल! कुछ दिनों के अंतराल पर इन फ़ोल्डर को देखता हूँ। बेचैनी होती है। मेरे बड़े डरों में एक डर यह भी है कि अपना सोचा कभी न लिख पाऊँ।
मेरे लिखने की ज़रूरत किसी और से ज़्यादा मुझे ही है। दुनिया में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन मेरे लेखक को उस बाहरी दुनिया से बहुत मतलब नहीं है। मैं अपना काम पूरा करना चाहता हूँ। पर कई बार ऐसा होता है कि लिखने बैठा हूँ कुछ, और किसी और अधपकी कहानी में फँसा हुआ हूँ। मैं इस बात से बहुत दुखी तो नहीं हूँ, लेकिन एक तरह का द्वंद्व रहता है। फिर अनुशासन ही है जो किसी एक काम को ख़त्म करने में मददगार साबित होता है।
तीन
सामाजिकता-बोध
मैं जो भी लिखता हूँ, उसमें मेरे समाज की सच्चाई का आना बहुत ज़रूरी है। जब मैं यह कहता हूँ तो मैं अपने सभी प्रिविलेज, अपने विशेषाधिकार को भूल नहीं रहा हूँ। मेरी एक आइडेंटिटी उत्तर भारतीय सवर्ण हिंदू मर्द की है। मुझे अपने जिए हुए समाज की बहुत-सी बातें पसंद नहीं हैं। लेकिन जो प्रिविलेज मुझे सिर्फ़ मेरे पैसा होने से मिले हैं, वे चाहते न चाहते हुए भी मेरे लिखे में हमेशा रहेंगे। यह मेरे लेखक का बड़ा द्वंद्व है। इस पहचान के साथ लिखना, तब जब मैं जानता हूँ कि मुझसे ज़्यादा ज़रूरी आवाज़ें हैं, जिन्हें सुना जाना चाहिए, पढ़ा जाना चाहिए... फिर भी मैं लिख रहा हूँ। ख़ुद से भी कई सवाल हैं। उनका जवाब फ़िलहाल मेरे पास नहीं है।
चार
स्वीकार्यता का सवाल
जब लिखना शुरू किया, तो एक बात हमेशा मन में रही कि जो लिख रहा हूँ वो बाक़ी सबके लिए स्वीकार करने लायक है भी या नहीं? मैं जानता हूँ जो मुझे पढ़ रहे हैं, उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लेखकों को भी पढ़ा है। जब नाटक लिखता हूँ, जब नाटक का मंचन होता है तो देखने वालों ने शेक्सपियर भी देखा है, मोहन राकेश भी देखा है, मेरे मोहल्ले के राजीव का नाटक भी देखा है। उनके दिमाग़ के लिए हम सब बराबर हैं।
धीरे-धीरे इस द्वंद्व से दूर होने लगा हूँ। यह न तो मेरे हाथ में है, न ही यह किसी भी तरह मुझे बेहतर लेखक बनाता है। लोग आपको पसंद करें, यह अच्छे लेखक होने की निशानी नहीं है, ऐसा समझता हूँ। लोग आपको कई कारण से पसंद करते हैं, और जिन्हें नहीं पसंद करते वे भी बेहतरीन रचना कर रहे होते हैं।
पाँच
लेखक होने का सवाल
लगातार लिखने के बाद भी ख़ुद से कई बार एक सवाल करता हूँ कि क्या मैं सच में लेखक हूँ? या फिर मुझे लेखक पसंद थे और मैं बस उनके जैसा दिखने की कोशिश में लिख रहा हूँ? शायद यह बात बचकानी लगे। लेकिन इस सवाल का जवाब भी खोज रहा हूँ। मैं बहुत कुछ बन सकता था, लेकिन अंत में लेखक होना ही चुना। रोज़ सुबह उठकर लिखता हूँ। लेकिन कुछ दिन ऐसे भी जाते हैं, जब मैं अपने अस्तित्व पर ही सवाल उठा रहा होता हूँ। जब एक लाइन भी नहीं लिख पाता, तब सोचता हूँ कि क्या मैं लेखक हूँ भी? और अगर हूँ तो क्यों ही हूँ? मैं जितना ख़ुद को समझता हूँ, इस सवाल के साथ शायद जीवन भर रहूँगा। ख़ुद को एक आउटसाइडर की तरह ही देखता हूँ, हर जगह। इससे मुझे कुछ और होने की हिम्मत मिलती है।
छह
कुछ और होने का सवाल
अगर मैं मान भी लूँ कि मैं लेखक हूँ (जो मैं हूँ), तो भी मैं सिर्फ़ लेखक तो नहीं हूँ। मैं बहुत कुछ हूँ। क्या मेरा लेखक होना मेरे कुछ और होने के रास्ते में भी आता है? मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई की। फ़िलहाल इंटरनेट पर कंटेंट बनाता हूँ। कभी एक्टिंग भी कर लेता हूँ। नाटक डायरेक्ट करता हूँ। कई और चीज़ें भी कर रहा होता हूँ।
मैं एक ही जीवन में कई जीवन जीना चाहता हूँ। एक समय पर इस द्वंद्व में भी रहा। लेकिन धीरे-धीरे यह भी सामान्य हो गया। द्वंद्व एक काम से दूसरे काम में स्विच होने का है। एक काम का बोझ कहीं और न लेकर जाऊँ, इस द्वंद्व में तो रहता हूँ।
अभी ये विचार आए हैं। शायद ये बिखरे भी हों। मैं ये बोल पाऊँगा, नहीं बोल पाऊँगा... नहीं जानता। पर इस यात्रा में यह लिख लेना भी अच्छा है।
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22 नवंबर 2025, शांतिनिकेतन
पूरा दिन शांतिनिकेतन में बीता। यहाँ पहुँचते ही अचल (मिश्र) मिल गया। अचल और ताजदार जुनैद सप्ताह भर से शांतिनिकेतन में ही थे।
अचल भी पहली बार ही शांतिनिकेतन आया था। सप्ताह भर में उसने इस जगह को बहुत आराम से समझ लिया है। उसके साथ एक कैफ़े गया, बढ़िया बंगाली मिठाई खाई, एक बेहद ख़ूबसूरत बरगद का पेड़ देखा। सोनाझुरी हाट को भी दूर से देखा।
असल में आते ही अचल से मिलने का फ़ायदा यह हुआ कि मैं शांतिनिकेतन को क्रैश-कोर्स की तरह समझने लगा। मेरे मन में शांतिनिकेतन के जो चित्र थे; यह जगह उससे अलग है, लेकिन बहुत अलग नहीं है। एक छोटा शहर है—बोलपुर। विश्वभारती यूनिवर्सिटी इस छोटे शहर में फैली हुई है। भीड़ है। हाट के किनारे ट्रैफ़िक जाम भी मिला। धूल-धक्कड़ भी हैं।
बावजूद इसके इस जगह में एक शांति है, जिसके लिए थोड़ा समय यहाँ रहना पड़ेगा। इस बात को अचल ने भी महसूस किया और भविष्य में वह यहाँ आता रहेगा, ऐसा उसने कहा।
अचल के साथ समय बिताना पसंद है। वह कम बोलता है। फ़ोटो खींचता है। मैंने भी उसकी तस्वीर उतारी। क़रीब सात सालों से अचल को जानता हूँ। कई शहर में हम घूम पाए हैं। ताजदार से भी मिला। ताजदार और अचल एक जैसे लगते हैं। दोनों मृदुभाषी। ताजदार एक म्यूज़िशियन दोस्त के साथ जैमिंग कर रहा था। शांतिनिकेतन पहुँचते ही ताजदार का संगीत सुनने को मिल जाए, इससे सुंदर क्या होगा!
अचल शाम में ही दरभंगा के लिए निकल गया। उसे और ताजदार को अलविदा कहा।
अचल के साथ रहने के कारण ‘संगमन’ का पहला सत्र पूरा नहीं सुन पाया। शाम से ‘संगमन’ में सम्मलित हो गया। कई लेखकों से मिला। कुछ बेहद पसंदीदा लेखक आए हैं—मनोज रूपड़ा, जितेंद्र भाटिया। प्रियंवद जी और चंदन पांडेय भाई तो हैं ही।
ज़्यादा समय अविनाश मिश्र, राही डूमरचीर और विमल चंद्र पांडे के साथ बीता। विमल भाई और मैं कमरा शेयर कर रहे हैं, इसलिए भी उनसे ज़्यादा बात हो पाई।
सोचा था जल्दी सो जाऊँगा और सुबह उठ कर कोपाई नदी के किनारे कुछ फ़ोटो निकालूँगा, सुबह के समय का शांतिनिकेतन देखूँगा। लेकिन अब ऐसा नहीं हो पाएगा। अविनाश भाई के कुछ दोस्त आए थे तो पहले उनके साथ समय बिताया। क़रीब बारह बज गए। फिर विमल भाई, अविनाश भाई और राही भाई के साथ छत पर चला गया। हम जिस होटल में रुके हैं, शांतिनिकेतन रेजीडेंसी, इसकी छत अद्भुत सुंदर है। पुराने समय के घरों की छत की तरह। बातों का सिलसिला चलता रहा। और दो बज गए। बेहद थक गया हूँ।
बाक़ी बचे समय में शांतिनिकेतन को थोड़ा बेहतर देख लूँ, ऐसी उम्मीद है।
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23 नवंबर 2025, शांतिनिकेतन
सुबह-सुबह चंदन पांडेय भाई का फ़ोन आया। उन्होंने दूसरे कमरे में बुलाया।
दरअस्ल, कल उनसे मिलते ही उन्होंने बताया दूसरे दिन के पहले सत्र में मुझे बोलना है। मैं इस जगह बिल्कुल ही अनजान हूँ। लगभग सबसे पहली बार मिल रहा हूँ। एक तरह की झिझक है। मैंने उनसे कहा था कि मैं मंच से बोल नहीं पाऊँगा। मैं मंच पर बहुत सहज नहीं हूँ। यह बात उन्होंने प्रियंवद जी को बताई। प्रियंवद जी इस बारे में मुझसे बात करना चाहते थे।
जो भी मुझे जानते हैं, यह भी जानते हैं कि मैं बोलता ठीक हूँ, लेकिन किसी मंच से नहीं बोल पाता। बोलना एक तरह का काम है। सच कहूँ तो मैं नर्वस होता हूँ। किसी को भी कहता हूँ तो उन्हें विश्वास नहीं होता। सबको लगता है मॉडेस्टी में ऐसा कह रहा हूँ। थिएटर करता हूँ, तो लोगों को एक भ्रम है कि बोल तो लेगा ही।
प्रियंवद जी ने पूछा, ‘‘बात क्या है? आप बोलना क्यों नहीं चाहते?’’ मैंने अपनी बात रखी, ‘‘मैं बहुत सहज नहीं हूँ।’’ उन्होंने कहा, “एक समय के बाद तो बोलना ही पड़ेगा, निहाल। लोग आपको पढ़ेंगे तो सुनना भी चाहेंगे। पहले मैं भी नहीं बोल पाता था। लेकिन सेमिनार में जाना, वहाँ लोगों से मिलना, लोगों के सामने अपनी बात रखना... ये सब भी लेखक के लिए ज़रूरी है। आप बोलिए। और मुझे मालूम है आप बहुत अच्छा बोलेंगे।”
प्रियंवद जी ने एक अभिभावक की तरह मुझे आदेश दिया। मैंने हाँ में सिर हिलाया। प्रियंवद जी ने बताया कि जब उन्हें भी पहली बार एक सेमिनार में बोलना था तो उनके सामने इस्मत चुग़ताई और अमृतलाल नागर बैठे थे। इस्मत जी ने उन्हें बोलने के लिए प्रोत्साहित किया था। यह सुनकर मेरे अंदर भी हिम्मत आई। चंदन भाई ने कहा कि उन्होंने मेरे वीडियो इंटरनेट पर देखे हैं और मैं बहुत सहज तरीक़े से बोलता हूँ। वीडियो तो मैं अथाह एकांत में शूट करता हूँ। इसलिए उनकी सच्चाई मैं ही जानता हूँ! पर दोनों ने मिलकर बहुत प्यार से मुझे समझाया।
अभी जब यह लिख रहा हूँ, तब मैं तैयारी कर रहा हूँ अपनी बात कहने की। जो हवाई-यात्रा में लिखा था, वो नहीं बोलूँगा। पर्चा देखकर बोलना बहुत ठीक नहीं लगता। एक नोट ज़रूर लिख लेता हूँ—रेफ़रेंस की तरह। बाक़ी जो होगा, वो डायरी में दर्ज करूँगा ही।
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23 नवंबर 25, शांतिनिकेतन
मंच के लिए नोट्स...
• मुझे लगा था लिखता रहूँगा तो बोलने से बच जाऊँगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
• मंच पर बहुत सहज नहीं रहता। कॉलेज के समय नाटक करता था। एक्टिंग से शुरुआत की। धीरे-धीरे नाटक लिखने लगा।
• मुंबई एक्टर बनने ही गया था। शुरुआत में कुछ काम भी मिला। कैमरा के सामने एक्टिंग करने में कभी समस्या नहीं आई। लेकिन जिस भी तरह का काम मिला, वह उबाऊ बहुत था। पता नहीं कैसे, लेकिन यहाँ भी छोटे-मोटे ही सही राइटिंग के काम मिल गए। एक्टिंग से एक तरह की दूरी आ गई।
• जब मुंबई में नाटक करने का समय आया, तो मैंने अपनी लिखी कहानी पर एक नाटक बनाया। यह पृथ्वी थिएटर में ओपन हुआ। कई दोस्तों ने पूछा कि तुमने एक्टिंग क्यों नहीं की? लेकिन अब तक मैं अपने लेखक होने की आइडेंटिटी के साथ कम्फ़र्टेबल हो चुका था।
• मैं ख़ुद को किसी एक तरह से नहीं देख पाता। सबसे पहले एक क्रिकेटर की तरह देखा, फिर एक टेबल-टेनिस प्लेयर की तरह, फिर एक एक्टर की तरह, और फिर एक लेखक की तरह।
• सब कहते हैं हम ख़ुद के लिए लिखते हैं। मैं इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ। लेकिन ख़ुद के लिए क्यों लिखते हैं का सवाल बार-बार मेरे पास आता है।
• मैं बचपन से चीज़ों को सहेजकर रखता हूँ। रोग की स्थिति तक सहेजता हूँ।
• शायद चार-पाँच साल की उम्र में एक टीचर ने क्लास में कह दिया था कि जो चॉकलेट खाओ, उसका एल्युमीनियम फॉयल जमा कर सकते हो। न जाने क्यों ही उस टीचर ने ऐसा कहा था। पर ज़्यादा अजीब बात यह है कि मैं आज तक इस तरह के एल्युमिनियम फॉयल जमा कर रहा हूँ। मेरे कमरे में एक बक्सा है, जिसमें वे एक के ऊपर के इकट्ठा होकर कई सारी गेंद बन चुके हैं।
• कोई भी मेरे घर आएगा तो पाएगा मेरा घर मेरे जिये जीवन का एक छोटा-सा म्यूजियम है।
• घर के पुराने फ़ोटोग्राफ से लेकर, पहली लिखी चिट्ठी, किसी जगह गया—उस जगह की टिकट और न जाने क्या-क्या... सब मेरे पास है।
• लिखना मेरे लिए अपने जिए जीवन को सहेजकर रखना ही है। लिखने के सबके अपने-अपने कारण हो सकते हैं। मैंने यह कारण पाया है।
• जब कॉलेज में था तब मैं कविताएँ बहुत लिखता था।
• दिल्ली यूनिवर्सिटी के फ़ेस्टिवल सीजन में लगातार कम्पटीशन में पार्टिसिपेट करता... और जीतता भी।
• हम कुछ लोग थे जो सबसे ज़्यादा अवार्ड पाते—शुभम श्री, अंजुम शर्मा, रंगनाथ रवि... और भी कुछ साथी। एक तरह से हम एक समय के हैं।
• इन कम्पटीशन के नियम थे कि पुरस्कृत कविता को पढ़ना वर्जित है।
• हम सभी की दो-तीन कविताएँ ऐसी थीं जो बहुत चर्चित थीं और हमें मालूम था कि अगर यह कविता पढ़ी तो कोई न कोई अवार्ड ज़रूर मिल जाएगा।
• शुभम को छोड़ दें, तो ह में से शायद ही कोई इस नियम का पालन करता था। एक तरह की साझा अंडरस्टैंडिंग थी हमारी। अवार्ड में मिले रुपयों से महीने का ख़र्च निकल जाता था।
• लेकिन हर बार एक द्वंद्व आता कि नई कविता पढ़ता हूँ। कई बार पढ़ता भी। नई कविता पर अवार्ड मिलता तो ख़ुद को अच्छा कवि मानता। नहीं मिलता, तो फिर पुरानी कविता की तरफ़ भागता।
• अच्छा हुआ कॉलेज ख़त्म हुआ और इस तरह के नियम भी। फिर भी रचनात्मकता को लेकर द्वंद लगातार सामने आते हैं।
• अब जब मैं बंबई में लिखता हूँ—फ़िल्म या सीरीज के लिए—तो एक बड़ा द्वंद्व रहता है—क्या लिख रहा हूँ का द्वंद्व। किसी ऐसे प्रोजेक्ट का हिस्सा तो न बन जाऊँ जिससे पॉलिटिकली इत्तेफ़ाक नहीं रखता।
• अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। लेकिन दोस्तों को ऐसा काम करते देखा है, जिसे करने के बाद वे दुखी हुए हैं, रिग्रेट किया है।
• ऐसे काम से बचा रह जाऊँ, ऐसी कोशिश है। ख़ुद को बचाना भी तो एक रचनात्मक प्रक्रिया है।
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23 नवंबर 2025, शांतिनिकेतन
पहले सत्र में ही मुझे अपने लिखे पर बोलना था। थोड़ी तैयारी के साथ गया भी। लेकिन वही हुआ जो हर बार होता है—मंच-नर्वसनेस। मैंने पर्चा वैसे नहीं लिखा था कि उसे देखकर पढ़ दूँ। प्वाइंट्स थे, जिन्हें देखकर अपनी बात रख रहा था।
अपनी बात मुश्किल से चार-पाँच मिनट में मैंने कही। क्या कहा, कैसे कहा... मुझे पता नहीं।
बहरहाल, जैसे ही अपनी बात ख़त्म करके मंच से नीचे आया, प्रियंवद जी ने कहा, “देखा कितना आसान है। हो गया ना!” मैंने कहा, “बहुत कुछ तो बोल ही नहीं पाया। लिखा ही रह गया।”
“कोई बात नहीं। जो बोला, दिल से बोला। वह ज़रूरी है।”
प्रियंवद जी अभिभावक हैं। उनके अंदर प्रेम से भरपूर एक इंसान रहता है। ‘संगमन’ का आयोजन करना, अपने मूल्यों के साथ, बड़ी बात है।
मैंने कई लोगों को सुना। कैफ़ी हाशमी, रवींद्र आरोही, मनोज रूपड़ा, राहुल सिंह, राही डूमरचीर! मैं इस दुनिया—हिंदी साहित्य की मुख्यधारा—से इतना दूर रहता हूँ कि इन्हें बोलता सुनकर लगा जैसे मैं कई तरह से समृद्ध हो रहा हूँ। इन्हें बचाकर अपने साथ ले जाने का मन हुआ। पर कोई कहाँ किसी के साथ जाता है। बचाने के लिए अपने मोबाइल और कैमरा से फ़ोटो-वीडियो लेता रहा।
घूमने के लिए पास के ही सोनाझुरी हाट गया। यह जगह बहुत पसंद आई। सच कहूँ तो पहली बार घूमने के दौरान कुछ ख़रीदकर ले जाने का मन करता रहा। अर्घ्य (मेरा आठ महीने का बेटा) के लिए बहुत कुछ दिख रहा था। मैंने ख़रीदा भी।
देर शाम के समय फिर से छत पर बैठे। यह छत अविनाश भाई के कमरे के बाहर ही थी, जहाँ बैठकर हम बातें करते गए। अविनाश और राही भाई को बहुत बढ़िया कमरा मिला था! इसका पूरा फ़ायदा हमने भी उठाया।
पूरे आयोजन के दौरान मैं मनोज रूपड़ा जी से बात नहीं कर पाया। मन हुआ इनसे बात की जाए। अविनाश भाई को बोला। उन्होंने फ़ोन करके मनोज जी से पूछा कि क्या वह हमारे पास आना चाहेंगे? मनोज भाई कुछ समय बाद हमारे साथ थे, हल्के सर्द माहौल में खुले आसमान के नीचे।
मुझे मनोज रूपड़ा एक रॉकस्टार लगे—अलहदा अंदाज़ के व्यक्ति। ग़ज़ब तरीक़े से बात करते हैं। आते ही उन्होंने मुझसे पूछा, “आपने जो बात कही, ऐसा लगा आप एक जगह रूक नहीं पाते। ऐसा क्यों है?” उन्होंने मेरी बात से मेरे बारे में कुछ समझ बना ली थी... पर इस सवाल का जवाब तो मैं भी खोज रहा हूँ।
हम लोग इधर-उधर की बहुत बातें करते रहें। मनोज भाई के पास कहानियाँ ही कहानियाँ हैं, और एक अंदाज़-ए-बयाँ भी! वर्ल्ड सिनेमा की उनकी बहुत अच्छी समझ है। अविनाश भाई की भी वर्ल्ड सिनेमा की समझ मज़ेदार है। दोनों बातें कर रहे थे। मैं बीच-बीच में ही कुछ बोल पा रहा था।। जब अच्छी बात हो रही हो तो ज़बरदस्ती घुसकर अपनी बात रखने वाला इंसान, इंसानी सभ्यता के लिए बड़ा खतरा होता है। मैं ऐसा इंसान नहीं बनना चाहता।
बातों ही बातों में मनोज भाई ने एक बहुत अच्छी बात कहीं; जिसका कंटेक्स्ट तो मैं भूल गया, लेकिन बात याद रह गई। उन्होंने कहा, “जो इंसान अपने से बड़े ओहदे वाले किसी की चापलूसी करता है, वही इंसान अपने से छोटे ओहदे पर बैठे इंसान के साथ सबसे ज़्यादा बदतमीज़ी करता है।” यह एक बहुत गूढ़ समझ के साथ कही गई बात थी। यह मेरे साथ रह गई।
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24 नवंबर 2025, शांतिनिकेतन
‘संगमन’-26 का अंत हुआ। अंतिम सत्र को मैंने बहुत ध्यान से सुना। जया जदवानी जी, चंदन पांडेय भाई और प्रियंवद जी को सुनना बहुत कुछ सिखाता गया।
‘संगमन’ में सभी लेखक एक साझा विषय पर अपने विचार रखते हैं। एक ही विषय पर इतने लोगों के अलग-अलग विचार सुनना, बहुत अलग अनुभव था। अलग क्या था, यह मैं नहीं बता सकता। लेकिन यह ज़रूर कहूँगा कि सिर्फ़ यह सुनना कि लेखकों के द्वंद्व आख़िर क्या हैं, मेरे लिए कई तरह से ज़रूरी था।
जो अच्छा लेखक होता है, जिसकी पढ़त अच्छी है, जिसकी तैयारी अच्छी है; उसके पास बोलने के लिए भी बहुत कुछ होता है। हाँ, कुछ लोग बस बोलने के लिए बोल रहे थे। लेकिन जब चंदन पांडेय, राहुल सिंह या अविनाश मिश्र ने अपनी बात रखी तो दिखता है कि पढ़ा-लिखा इंसान कितनी मज़बूती से अपनी बात कहता है। भाषा का सौंदर्य नैसर्गिक ही नहीं होता। इसके लिए बहुत मेहनत लगती है।
इस प्रसंग में प्रियंवद जी ने आख़िरी वक्तव्य दिया। उन्होंने एक बहुत ज़रूरी बात कही—युवा लेखकों के लिए—‘‘अगर कोई भी व्यक्ति कहानी या उपन्यास लिखना चाहता है तो उसके लिए अनुशासन एक पूँजी है। बिना डिसिप्लिन के आप सीरियस राइटिंग नहीं कर पाएँगे। कवि के लिए यह लागू नहीं होता। कविता एक अलग विधा है और उसके लिए मैं डिसिप्लिन की डिमांड नहीं करता।’’
‘संगमन’ की समाप्ति के साथ ज़्यादातर लोग चले गए। कुछ लोग रह गए। विनय सौरभ भी एक और दिन रुके। वह मेरे कमरे में ही आ गए। उनके साथ बहुत बातचीत हुई। उनकी कविताएँ बहुत सुंदर हैं। पता चला कि वह मेरे एक और दोस्त अविनाश दास भाई (जो मुंबई में मेरे पड़ोसी हैं) के बहुत पुराने और प्रिय मित्र हैं। विनय भाई ने अविनाश भाई के लिए सोनाझुरी एक कुर्ता भी ख़रीदा। इस कूरियर को अपने गंतव्य तक पहुँचाने का काम मेरे हिस्से आया।
हिंदी साहित्य की दुनिया में वे लोग सक्रिय हैं जो किसी नौकरी में रहे। प्रियंवद जी का कानपुर में व्यवसाय था। चंदन भाई पहले तो बैंगलोर में नौकरी करते थे। अब नौकरी छोड़कर शांतिनिकेतन में रहने लगे हैं, क्योंकि श्रुति कुमुद (लेखिका और चंदन भाई की जीवन-संगिनी) विश्व भारती यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं। राहुल सिंह भी यहाँ पढ़ाते हैं। क्योंकि अब चंदन भाई और राहुल सिंह दोनों ही शांतिनिकेतन में हैं—संभव है कि हिंदी साहित्य का एक नया गढ़ शांतिनिकेतन बने। दोनों बेहद गंभीर और अपने काम में ईमानदार हैं। यह हिंदी साहित्य के लिए अच्छा होगा। जो कुछ लोग बचे थे, हम लोग यूनिवर्सिटी कैंपस घूमने चले गए... और मुझे सच में इस जगह से प्रेम हो चुका है।
जैसा चित्र मैंने शांतिनिकेतन का सोचा था—अंततः यह वैसी ही जगह निकली। बस आपको सही जगह पर वह चित्र दिखेगा। फ़ाइन आर्ट डिपार्टमेंट में चलना ऐसा था, जैसे एक म्यूजियम में चल रहे हों। मैं इस यूनिवर्सिटी का हिस्सा नहीं हूँ, इस बात का दुःख तो होता रहा। पर इस बात की ख़ुशी अधिक थी कि ऐसी एक जगह इस दुनिया में है, जहाँ हम कभी भी आ सकते हैं, महसूस कर सकते हैं।
मैं फ़ोटोग्राफी करता रहा। कई दिनों बाद फ़ोटोग्राफी में भी मन लगा। दृश्य ही इतने सुंदर थे। काश! मैं इस जगह की ख़ूबसूरती, इसकी शांति अपने लिखे में या अपनी फ़ोटोग्राफी में उतार पाऊँ। मेरी भी सीमाएँ हैं।
कैंपस में ही श्रुति मिलीं। दिन भर के काम के बाद वह घर जा रही थीं। उन्होंने हमें—विनय सौरभ, अमन, राही और मुझे—घर पर कॉफ़ी के लिए बुलाया।
बहुत ही सुंदर घर बनाया है श्रुति ने। किताबों से भरा घर। एक लेखक का घर जैसा होना चाहिए, वैसा ही घर। मैं घर की छत पर गया और मैंने देखा कि समय से तीस साल पीछे जा चुका हूँ। मैंने श्रुति को कहा भी कि अगर किसी को भी फ़िल्म में 1995 का नार्थ इंडिया दिखलाना हो, तो बस उनके छत पर कैमरा लगा देना होगा! आस-पास के सभी घर दो मंज़िला या बहुत हुआ तो तीन मंज़िला। घरों में पेड़ का होना। सुंदर।
आज चंदन और श्रुति की मैरिज एनिवर्सरी थी। शादी के ग्यारह साल। प्रियंवद जी ने हम सभी को दावत दी। हम एक होमस्टे गए—मिताली होमस्टे। साथ में खाना खाया। हम सात-आठ लोग थे। प्रियंवद जी, चंदन, श्रुति, राहुल, राही, विनय, अमन, वैदिक-वैभव (चंदन और श्रुति के बेटे वैभव नौ साल का है और वैदिक चार साल का)। ‘संगमन’ की अनऑफ़िशियल समाप्ति हुई।
मैंने पच्चीस का दिन ख़ुद के लिए रखा है। कुछ घूमूँगा। कुछ फ़ोटोग्राफी करूँगा।
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25 नवंबर 2025, शांतिनिकेतन
अंततः अंतिम दिन आ गया—इस छोटी-सी ट्रिप का। यह एक बेहद डेंस ट्रिप रही। मैं बिना किसी उम्मीद के शांतिनिकेतन आया था। मन में कुछ ख़याल आया... और यह डायरी लिखने लगा। कितना कुछ बीता... कितना कुछ है साथ ले जाने के लिए!
दिन की शुरुआत सुबह कोपाई नदी पर जाने से हुई। सुबह साढ़े छह बजे मैं नदी के लिए निकल पड़ा—होटल से दो किलोमीटर की दूरी पर नदी थी। किसी ने बताया था रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताओं और कहानियों में इस नदी का बहुत ज़िक्र है। इसलिए इसे देखना, महसूस करना अनिवार्य है।
टोटो वाले को नदी पर ले चलने के लिए कहा—वह हिंदी नहीं बोलता था, सिर्फ़ बांग्ला में बात करता था। लेकिन मेरी बात समझ गया और मुझे नदी किनारे ले गया।
खेत के किनारे एक पतली-सी नदी। सुबह के समय के कारण एक शीत की चादर ओढ़े हुए। बस कुछ किसान खेती कर रहे थे। कोई और नहीं था वहाँ। मैं फ़ोटो लेने लगा। नदी के किनारे कुछ सफ़ेद पौधे थे—बेहद सुंदर। कई दिनों बाद फ़ोटोग्राफी में मन लगा।
क़रीब घंटा भर मैं वहीं था। शांतिनिकेतन में इतिहास साथ चलता है। रुककर सोचो, तो दृश्य शायद बिल्कुल वैसे ही थे जैसे सौ साल पहले रहे हों। यह जगह उन कुछ जगहों में से है, जहाँ समय रुका हुआ है। बस उसे महसूस करने की ज़रूरत है।
वापसी में चंदन भाई का फ़ोन आ गया। उन्होंने सुबह के नाश्ते के लिए घर पर बुलाया। प्रियंवद जी और राहुल भी आ रहे थे। मैं सीधा वहीं के लिए निकल गया। प्रियंवद जी अपना नाश्ता ख़ुद ही लेकर आए थे—ख़ूब सारे फल! “भाई, संगमन ख़त्म होने के बाद जितनी जल्दी हो सके अपनी दिनचर्या में लौट जाऊँ, यह बहुत ज़रूरी है।” श्रुति हम सभी को आलू के पराठे खिलाना चाहती थीं, लेकिन प्रियंवद जी ने सेहत को लेकर ऐसा राग छेड़ा कि सभी पराठे छोड़कर फल पर आ गए। बस मैं और चंदन भाई ही थे, जिन्होंने सुबह-सुबह पराठे खाए।
प्रियंवद जी की दिनचर्या सच में अद्भुत है। सत्तर से ऊपर की उम्र के बावजूद ग़ज़ब के घने बाल हैं उनके। मैंने उनसे इसका राज़ पूछा तो उन्होंने कहा, “भाई, राज़ तो कुछ नहीं है। न कभी तेल लगाया, न कभी बाल रँगे। जो हैं, ऐसे ही हैं।” प्रियंवद जी अपनी दिनचर्या में शाम सात बजे सो जाते हैं। अंतिम खाना शाम चार बजे खाते हैं। उनका वज़न बिल्कुल कंट्रोल में है और शरीर में फ़ुर्ती तो ऐसी कि तीस साल के लड़के भी पीछे रह जाएँ। उन्होंने जाने-अनजाने अपने शरीर का बहुत ध्यान रखा है... यह उनकी बातों से झलकता भी है।
नाश्ते के बाद प्लान बना कि मैं प्रियंवद जी और अमन (युवा कवि, शांतिनिकेतन में हिंदी के पीएचडी स्कॉलर) के साथ रवींद्रनाथ का घर, जो अब म्यूजियम बन चुका है, देखने जाऊँगा।
म्यूजियम में तो प्रियंवद जी को बड़ी कोफ़्त हुई! म्यूजियम अपने आपमें अच्छा है। लेकिन वहाँ जगह-जगह लिखा है, “परिसर की पवित्रता बनाए रखें”, “जूते उतारकर ही अंदर जाएँ”। प्रियंवद जी लगभग ग़ुस्से में थे। “दुनिया के किसी देश में कोई भी अपने लेखकों के साथ ऐसा करता है क्या? हर जगह को पवित्रता से क्यों जोड़ा जाता है? अरे, लेखक का घर है—उसको म्यूजियम बना दिया। लोगों को जाने दो। यह पवित्रता लिखने की क्या ज़रूरत है?” प्रियंवद जी ने कहा कि ‘अकार’ के अगले अंक के संपादकीय में इस मुद्दे को ज़रूर लिखेंगे। एक लेखक और किस तरह से अपना प्रतिरोध दर्ज कर सकता है? लिखकर करना ही सबसे बेहतर है।
लेकिन रवींद्रनाथ का घर बेहद सुंदर है। हम बाहर-बाहर से ही देख पाए, क्योंकि किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं थी। शायद बेहतर तरीक़े से प्लान किए जाने पर यह सब संभव हो सके।
यहाँ ड्रामा डिपार्टमेंट के एक पीएचडी स्कॉलर पुनेश से मुलाक़ात हुई। पुनेश बिहार से हैं, और एक बहुत ही अद्भुत टॉपिक पर रिसर्च कर रहे हैं—लौंडा नाच और सेक्सुअलिटी के संदर्भ में। पुनेश ‘संगमन’ में मिले थे और बताया कि उन्होंने मेरा नाटक ‘पटना का सुपरहीरो’ देख रखा है। जब भी कोई ऐसा इंसान मिलता है, जिसने आपका काम देख रखा है तो एक तरह की आत्मीयता तो आ ही जाती है।
दुपहर के समय पुनेश ने मुझे फ़ोन करके पूछा कि क्या मैं ड्रामा और आर्ट्स डिपार्टमेंट के छात्रों के साथ एक घंटे की क्लास ले सकता हूँ—थिएटर के बारे में। मुझे ग्रेजुएशन के बच्चों के साथ बात करना हमेशा ही अच्छा लगता है। उनमें मुझे अपनी ‘टारगेट ऑडियंस’ दिखती है... वे बच्चे जो दुनिया समझते भी हैं और उनमें थोड़ी झिझक भी है, लेकिन वे सपनों से भरे हुए हैं। ऐसे स्टूडेंट्स से बात करने पर आप ख़ुद भी बहुत कुछ सीखते हैं। मैंने हाँ किया और क्लास लेने समय पर पहुँच गया। मुझे बातचीत में काफ़ी आनंद आया। कई तरह के प्रयोगों के बारे में जानकारी मिली।
शाम के समय अमन मुझे पैदल ही कैंपस के अलग-अलग कोनों में ले जाता रहा। मुझे कई साल बाद कोई जगह इतनी पसंद आई है! इस जगह का नाम बिल्कुल सही है—शांतिनिकेतन। कितनी शांति है यहाँ पर। प्रेम करने के लिए बेहद सुंदर जगह। काश! मैं ऐसी किसी सुंदर जगह पर पढ़ा होता। मैं तब मैं कितना अलग होता? शायद बहुत अलग होता।
पैदल चलते-चलते राहुल सिंह से मुलाक़ात हुई। हमने भी कुछ समय साथ बिताया। राहुल भाई ने एक बात कहीं, “तुम कुछ दिनों के लिए आए हो। इसलिए तुम्हें यहाँ की सुंदरता दिख रही है। ऐसी सुंदर जगह पर अगर नौकरी करो तो फिर सुंदरता और चुभती है, क्योंकि तब आप अपने मन से सुंदरता भी देख नहीं पाते।”
यह सही बात है। मैं जो कुछ भी महसूस कर रहा हूँ—एक शहरी आदमी का एक शांत जगह आने पर ख़ुद के लिए खुश होने जैसा है। जो यहाँ रह रहा है, उसकी दिक़्क़तें अलग होंगी। एक आउटसाइडर की नज़र की सीमाएँ तो हैं ही।
ख़ैर, रात का डिनर चंदन भाई और श्रुति जी के साथ रहा। घर का सादा और उम्दा खाना। मैं चंदन भाई और श्रुति के हॉस्पिटैलिटी का मुरीद हो चुका हूँ। इन दोनों ने इतने कम समय में शांतिनिकेतन में कोई मेरा अपना है का सुख दे दिया। जाते वक़्त श्रुति ने मुझे शांतिनिकेतन का एक शर्ट गिफ़्ट की। कई यादों के साथ यह अंतिम डिनर भी यादगार रहा।
इस ट्रिप पर बहुत कुछ लिख सकता हूँ। बहुत कुछ लिखना बाक़ी है। पर जो भी जिया, जो भी देखा... वह सब कभी नहीं भूलूँगा।
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‘अकार’ के 73वें अंक से साभार प्रस्तुत।
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