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आज़ाद ख़याल पुरुष

azad khayal purush

मधु चतुर्वेदी

मधु चतुर्वेदी

आज़ाद ख़याल पुरुष

मधु चतुर्वेदी

और अधिकमधु चतुर्वेदी

    वो पुरुष आज़ाद ख़याल है—

    मगर एक शर्त है।

    वो है तरफ़दार

    महिलाओं के उड़ान भरने का,

    आकाश तलक़ परवाज़ का—

    मगर एक शर्त है।

    वो नुमाइंदा है

    औरत की तरक़्क़ी का।

    हाँ, वो पुरुष आज़ाद ख़याल है—

    मगर एक शर्त है।

    आसमान पर दायरों के निशान

    वो लगाएगा,

    पंखों पर क़ायदों के वज़न का

    फ़ैसला उसका होगा।

    आग़ाज़ का परचम

    उसके हाथ होगा,

    पैमाने के हाशिए

    वो खींचेगा।

    ख़्वाहिशों की लगाम

    उसकी उँगली में होगी।

    वो पुरुष आज़ाद ख़याल है—

    मगर एक शर्त है।

    बुलंदी पर ठहरने का

    वक़्त वही तय करेगा।

    उसकी मर्ज़ियों का हो

    तौर-ए-सफ़र,

    और उसके मुताबिक़

    हद-ए-मंज़िल।

    हिदायतों से

    वो तआरुफ़ कराएगा,

    उसकी दिखाई रहगुज़र पर

    मंज़ूरी की मुहर के बाद

    बराबरी की

    वो वकालत करेगा।

    औरत को सोचना कितना है—

    वो सोचेगा।

    उसकी इजाज़त से

    रंग भरे जाएँगे सपनों में।

    वो चुनेगा

    जनाने क़दमों के फ़ासले।

    क़ाबिलियत की गठरी लिए

    वो आज़ाद महिला

    हलक में घुटन का धुआँ भरकर

    दहलीज़ पर खड़ी है—

    आज़ादी की अर्ज़ी लिए।

    वो आदमी तो

    आज़ाद ख़याल है—

    मगर

    एक शर्त है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मधु चतुर्वेदी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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