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अम्मा का रेडियो

amma ka reDiyo

संतोष चौबे

संतोष चौबे

अम्मा का रेडियो

संतोष चौबे

और अधिकसंतोष चौबे

    सिरहाने रहता था वह

    उनके किसी दोस्त की तरह

    कि जब भी चाहें

    कर सकें उससे बात।

    सुबह सवेरे

    बिस्मिल्लाह खान करते

    मंगल ध्वनि से

    उनके दिन की शुरुआत

    और फिर हरिओमशरण के भजनों के साथ

    वे लेतीं अपनी पहली चाय

    हम सोकर उठते उसके पहले

    वे कर लेतीं अपने पौधों की देखभाल

    संगीत सरिता के शास्त्रीय गीतों का

    रस लेते हुए।

    मैं जब भी लौटता घर

    सुबह की किसी ट्रेन से

    वे मिलतीं मुझे

    दरवाज़े पर जोहती बाट

    कि उनका दोस्त रेडियो

    पहले ही सुना चुका होता उन्हें

    गाड़ी के भोपाल पहुँचने का सही समय।

    लंबी दोपहरी में

    जब हम रहते काम पर

    वे चौपाल पर सुनतीं लोक गीत

    और अक्सर शाम को लौटने पर

    सुनातीं कोई नीति कथा

    जिसने गहरे छुआ होता उनका मन।

    हालाँकि पहचानती थीं वे

    समाचार वाचक की आवाज़

    पर ख़बरों से चिढ़ थी उन्हें

    कि इस मरी दुनिया में

    मची थी अजीब मारकाट

    बाढ़, भूकंप और दुर्घटनाएँ

    और आसमान छूती महँगाई

    चैन नहीं लेने दे रहे थे आदमी को

    किसी भी तरह।

    पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी

    अब भी विशेष दिन थे उनके लिए

    देशभक्ति के गीत

    अब भी उन्हें जोश से भरते

    और याद दिलाते

    उन पुराने दिनों की

    जब दादा के साथ

    वे भी जातीं शाला में झँडावंदन करने।

    सुबह-सुबह नहाने

    और साफ़-सुथरी साड़ी पहनने के बाद

    वे बैठतीं रेडियो के सामने

    और ध्यान से सुनतीं

    प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के भाषण

    कि सबने मिलकर लड़ी थी आज़ादी की लड़ाई

    और आज़ादी है तो सब कुछ है।

    तब जब नहीं था समय

    हमारे पास

    उनसे बात करने के लिए

    रेडियो से बाँटा उन्होंने

    अपना अकेलापन।

    उनके जाने के बाद

    आज भी रखा है वह उनके सिरहाने

    और यकीन मानिए

    आज भी आती है उसमें से

    कभी-कभी अम्मा की आवाज़।

    स्रोत :
    • पुस्तक : इस अ-कवि समय में (पृष्ठ 110)
    • रचनाकार : संतोष चौबे
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2010

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