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युद्ध और उसके बाद...

yuddh aur uske baad. . .

योगेंद्र पांडेय

योगेंद्र पांडेय

युद्ध और उसके बाद...

योगेंद्र पांडेय

और अधिकयोगेंद्र पांडेय

    एक सिरफिरे सनकी नेता की ज़िद

    और दाँव पर लग जाती हैं

    हज़ारों मासूम ज़िंदगियाँ,

    ओह! राजनीति और सत्ता के बाज़ार में

    ज़िंदगी की क़ीमत

    कितनी मामूली-सी हो गई है।

    युद्ध में कभी नहीं मारा गया

    सत्ता में बैठा कोई नेता या फिर

    किसी नेता का जवान ख़ून।

    मारी जाती है तो

    किसी बूढ़े बाप के बुढ़ापे की

    आख़िरी उम्मीद,

    मारा जाता है

    किसी माँ की आँखों का तारा।

    युद्ध के बाद खंडहर में तब्दील हो गया

    एक पूरा का पूरा हँसता-खेलता शहर।

    स्कूल के झूले पर झूलती हुई मासूम बच्ची,

    जिसका चिथड़ा बिखरा है

    खंडहरों के लाल रंग में।

    एक छोटे बच्चे की आँखों से

    भूख टपक रही है,

    जिसकी मायूसी बयाँ करती है

    युद्ध में मारे गए अपनों का दर्द।

    युद्ध के बाद का असर पूछा जाए

    गाज़ा की हर एक गली में पसरे

    भयानक सन्नाटे से,

    पूछा जाए—

    कभी सूखने वाली

    उन पथरीली आँखों से,

    जिनके आँसुओं में

    एक भयानक हादसा अट्टहास करता है।

    युद्ध के बाद दुनिया कितनी नीरस हो गई है,

    कि अब हँसने का बहाना नहीं,

    रोने का कारण नहीं।

    मौत अब आम बात हो गई,

    मिसाइलों का धमाका

    कोई नई बात नहीं है॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : योगेंद्र पांडेय
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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