Font by Mehr Nastaliq Web

आसा

aasa

दिनु भरि ज्वातति देंह पिरानी,

नस नस थकनि समाइ गई,

भूखे जानि बर्ध तब मन मा

घरै चलै की चाह भई।

दौस भरे के डहे-डमारे

रजनी ते गये छले,

सुर्ज चन्द्र का राजतिलकु दै

अपने घर की बार चले।

हरु काँधे पर धरयन बहे मा

उल्टी टाँगि कुदारि दिहेन,

बर्ध अगारी करि लै पैना,

अपने घर की राह लिहेन।

धीरे-धीरे ख्यात नाँघिके

जस गलियारे पर आयन,

धरेन उठाइ पीठि पर पैना

बरधन का टहँकारेन।

अपने घर की डगर नापि के

दुऔ बर्ध पुड़क्याइ भगे

रहेन अकेले हमरे मन तब

स्वतंत्रता के भाउ जगे।

सोच्यन—'सबिता रोजुइ बढ़िया

नित्त नवा जीवनु पावइँ,

रोजुइ होइँ जवान रोजु

बिरधापन पावैं छिपि जावइँ।

आवागमन काल-घुमना मा

परे जगत का भरमावइँ,

राति-दौस दुनहूँ क्रम-क्रम ते

घूमि-घूमि आवइँ जावइँ।

ऐस्यनि जीव समौ चक्कर मा

परा फिरै चारिउ घाईं,

चौरासी जोनिन मा बिचरै

दयाखै सुख दुख की झाईं।

बड़ी मुसकिलन बड़े पुन्नि ते

मिलै कहूँ मानुस की दयाँह

ऐठै-ग्वैठै लोग गरब मा

तबहूँ करैं कुछु परवाह।

देबी सिगरे दयौता गन

ज्यहिका पावै बदि ललचाइँ,

औरु ईसुरौ सरगु छाँड़ि के

ख्यालै ख्याल भुम्मि पर आई।

वहै पाइ मानुस की देही

नर ना दयाखैं अवघट-घाट,

मद मा अंधे बने फिरैं, सब

धरम करम करि बाराबाट।

वहि यहु तौ कबहूँ ना स्वचिहैं

हमैं बिधाता सुक्खु दिहिसि,

धनु-मकानु सबही कुछु दैके

हमका मालामालु किहिसि।

हमहूँ तौ वहि दीनबंधु बदि

कोऊ बढ़िया कामु करी,

कुछु तौ करि दीनन की सेवा

जग मा पैदा नाउँ करी।

करिहैं का यहिका बसि उल्टा

चुसिहैं खूनु गरीबन क्यार,

छल ते बल ते इज्जति छिनिहैं

करिहै हड्डिन का बैपार।

हाय बिधाता! का फिरि कबहूँ

हमरे नीके दिन ऐहैं,

लरिका नाजु पेटु भरि खैहैं,

दुख के दिन टरि जैहैं।

हमहे अन्नु करी पैदा

हमरेइ घर दाना नाहीं,

हमहे सिगरा देसु जियाई,

हमकै देसु रहा डाही।

बहुत सहेन सहि-सहि के ऊब्यन,

अब यहु जुलुमु सहा ना जाइ,

जीवनु मजा कैस है, चाखी

ईसुर संकट देहु नसाइ।

ऐस्यनि स्वाचति-स्वाचति अपनी

हम सिगरी गल्ली बितयन,

यहे तका ते दिया बरै लै

हम अपने घर आई गयन।

17 सितम्बर 1954

स्रोत :
  • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 29)
  • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
  • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
  • संस्करण : 2021

Additional information available

Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

OKAY

About this sher

Close

rare Unpublished content

This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

OKAY