सांस के बाटे गहना: हमार जिनगी
saans ke bate gahnah hamar jingi
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सांस के बाटे गहना: हमार जिनगी
saans ke bate gahnah hamar jingi
Satishwar Sahay Verma 'Satish'
सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
सांस के बाटे गहना: हमार जिनगी।
जल के धारा में दिअना हमार जिनगी॥
कबले धूरा तरे में मिसाते रही—
माटी में बोअल बिअना, हमार जिनगी।
छूंछ जहरों के खाके अघा जाइले—
भात के साथ तिअना, हमार जिनगी।
ओढ़ के छाँह सूते ना बदरी के घाम
खाढ़े बा गोर-चिमना, हमार जिनगी।
केतना घाती संघाती बनल फीरेला
अबले जिअत बा मुअना हमार जिनगी।
मिट गइल बा 'सतीशो' के मन के भरम
कहियो मानी ना कहना, हमार जिनगी।
- पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 11)
- रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
- प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
- संस्करण : 1996
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