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घर घरेक आगिसँ अछि जरल जा रहल

ghar gharek agisan achhi jaral ja rahal

कलानन्द भट्ट

कलानन्द भट्ट

घर घरेक आगिसँ अछि जरल जा रहल

कलानन्द भट्ट

और अधिककलानन्द भट्ट

    घर घरेक आगिसँ अछि जरल जा रहल

    भाइसँ भाइ द्वेषे भरल जा रहल।

    कोन आयल जमाना जुआरी एतय

    भावना अविवेकी बनल जा रहल।

    क्षुब्ध धरती गगन नयन मूनल अपन

    अछि बसातो बलाती बनल जा रहल।

    फूल-काँटमे अन्तर कयनिहार जे

    चमन छोड़िकऽ अछि चलल जा रहल।

    के कहत चोरकेँ चोर सभ चोर अछि

    आइ रामोसँ चोरी कयल जा रहल।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कान्ह पर लहास हमर [मैथिली गजल संग्रह] (पृष्ठ 1)
    • रचनाकार : कलानन्द भट्ट
    • प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
    • संस्करण : 1983

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