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आम महफिल में बनिके खास रहीं

aam mahphil mein banike khaas rahin

सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

आम महफिल में बनिके खास रहीं

सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

और अधिकसतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’

    आम महफिल में बनिके खास रहीं।

    दूर रहलो पर तनिका पास रहीं॥

    सभ के चाहत पर अमल ना होला,

    जहाँ रहीं, जिअत पिआस रही॥

    गमक के फूल के पंखुरी बिखरल,

    खिलल सुगंध के निवास रहीं॥

    आज कुहरा से घिरल बाटे किरिन,

    ओस मोती के बरत हास रहीं॥

    घटते-घटते ना रही कौरव-दल,

    पहिन योधा के बस लिबास रहीं॥

    पुआल तापि के जिआइब आग।

    जरा के आंखि में लहास रहीं॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : जल के धारा में दीयना (भोजपुरी गजल-संग्रह) (संकलन : अम्बदत्त गुंजन) (पृष्ठ 44)
    • रचनाकार : सतीश्वर सहाय वर्मा ‘सतीश’
    • प्रकाशन : भारतीय भोजपुरी साहित्य परिषद, मुजफ्फरपुर
    • संस्करण : 1996

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