Font by Mehr Nastaliq Web

आग नफरत के

aag naphrat ke

कृष्णानन्द कृष्ण

कृष्णानन्द कृष्ण

आग नफरत के

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    आग नफरत के दिन-दिन बढ़ल जात बा

    आदमी खुद से अपने कटल जात बा

    राह में जाके कहवाँ भइल लापता

    नेह इहवाँ से देखी भरल जात बा

    पाठ इन्सानियत के चलल बा नया

    मोल जिनगी के देखीं घटल जात बा

    नींद पलकन के सपना भइल आज बा

    साँस के अब ना सहकल सहल जात बा

    बात से ना केहू के भरल पेट हऽ

    रंग महफिल से उनकर उड़ल जात बा

    स्रोत :
    • पुस्तक : नया सूरज चढ़ल जाता (पृष्ठ 56)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2000

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY