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वेदनाएँ

vednayen

प्रदीप बहराइची

और अधिकप्रदीप बहराइची

    वेदनाएँ कभी ख़त्म ग़र हो गईं

    सच कहूँ प्रेम दिल ना निभा पाएगा।

    एक तरफ़ा प्रतीक्षा हो यदि प्रेम में,

    अंततः एक दिन प्रेम कुम्हलाएगा॥

    दिव्यता भव्यता और संपन्नता

    खींचते हैं सभी को ये सच है मगर,

    हर चमकती हुई चीज़ हीरा नहीं

    जान पाओगे तुम जानना हो अगर,

    हो निरादर जहाँ मान सम्मान का

    उस जगह स्वाभिमानी नहीं जाएगा।

    हाथ पर हाथ रखकर थी खाई कसम

    छूटते हाथ बातें पुरानी हुई,

    साथ में जिनके लम्हें गुजारे सदा

    छोड़कर यूँ अचानक कहीं खो गई,

    सीख है दिल लगाना जरा ग़ौर से

    वरना मेरी तरह चोट ही खाएगा।

    लक्ष्य जीवन का हो भिन्न पर सोचना

    कर भला हो भला हर एक इंसान का,

    रक्त है एक ही इन रगों में भरा

    करना हिस्सा भला अब क्यूँ भगवान का,

    पीढ़ियों ने सहा दर्द अलगाव का

    लो क़सम दर्द अब ना कोई गाएगा।

    बात अपनी हो तो बड़े शौक़ से

    बात करते उसूलों की थकते नहीं,

    लाख कमियाँ हैं ख़ुद में भी तो बेशरम

    उंगलियाँ आगे करने से रुकते नहीं,

    ऐसे आडंबरी आगे बढ़ते रहे

    एक दिन झूठ सच को ही झुठलाएगा॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रदीप बहराइची
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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