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मोनक वैशालीमे

monak vaishalime

मार्कण्डेय प्रवासी

मार्कण्डेय प्रवासी

मोनक वैशालीमे

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    कवि-सन कवि, आलोचक-सन आलोचक चाही!

    अपन लोक-सन अपन लोक, पाही-सन पाही!!

    जतय मलारक काज—

    ओतय दीपकक काज की?

    सुर-लय-तालक मध्य—

    समन्वयरहित साज की?

    मनुख मनुक्ख-समान प्रमाण-प्रमाणित चाही!

    मित्रताक ब्याजेँ शत्रुता मारय ढाही!!

    पशुमे पशुता अछि, मानवमे—

    मानवता हो

    दानवमे दृष्टिगत—

    कुचर्चित दानवता हो

    आह, सांस्कृतिक संयम-पथ अवरुद्ध लगैए,

    पसरल अछि सगरो सांस्कृतिक विरोधक धाही!

    मोनक वैशालीमे—

    जेँ नहि बुद्ध रहैए

    आजुक आम्रपालियो—

    सदिखन क्रुद्ध रहैए

    अपने घरमे अपने लोक आगि लगबैए,

    अपनापनकेँ जरा रहल अछि अपन पसाही!

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 22)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

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