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आज बहुत व्‍याकुल यह मन है

aaj bahut a‍yakul ye man hai

ओम निश्चल

ओम निश्चल

आज बहुत व्‍याकुल यह मन है

ओम निश्चल

और अधिकओम निश्चल

    आज घटाएँ घोर घिरी हैं

    बरसों की सुधियाँ उमड़ी हैं

    आज बहुत व्याकुल यह मन है

    और इसे तुम विह्वल कर दो।

    आज मुझे तुम पागल कर दो।

    साँय-साँय करता सन्नाटा

    दस्तक देती हुई हवाएँ

    रह-रहकर पुकारता कोई

    टूट रही मन की सीमाएँ

    तुमको मेरा ख़्याल नहीं है

    मौसम का अनुमान नहीं है

    रीत जाए स्नेह सरोवर

    तुम इसको गंगाजल कर दो।

    अरसा हुआ शहद में भीगे

    किए हुए सुख की यात्राएँ

    मन की बात कह पाए हम

    सुन सके तुमसे गाथाएँ

    धीरज के परबत टूटे हैं

    फिर भी ज्यों नक्षत्र रूठे हैं

    सपने आँज सकूँ मनचीते

    इन नयनों को काजल कर दो।

    कभी मिलेंगे तो पूछेंगे

    कैसा वक़्त गुज़ारा तुमने

    कैसे दर्द जिया सीने में

    कैसे सफ़र बुहारा तुमने

    सूख जाएँ कहीं प्रीति

    की, संबंधों की ये मालाएँ।

    मन में भर दो अभिलाषाएँ

    तन को बादल-बादल कर दो।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ओम निश्चल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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