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कवि का आत्मजगत्

kavi ki atmajgat

शांतिप्रिय द्विवेदी

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शांतिप्रिय द्विवेदी

कवि का आत्मजगत्

शांतिप्रिय द्विवेदी

और अधिकशांतिप्रिय द्विवेदी

    (एक)

    कविता—इस शब्द का नाम मैंने पहले-पहल कदाचित् सन् 18 में सुना था। तब, देहाती मदरसे के तीसरे या चौथे दर्जे में पढ़ता था। बालक था। ऐसा जान पड़ता है कि मनुष्य के मन के भीतर भी कोई एक स्प्रिंग होती है, वह उसे छुटपन से ही घड़ी की सुई की तरह उस अभीष्ट की ओर उन्मुख रखती है जिस संसार में वह जन्मजात संस्कारों से जाने को होता है। नहीं तो देहात के उस ठेठ वातावरण में जहाँ कोई साहित्य समाज था, कोई कला रसिक था, कोई पथ-प्रदर्शक था, एकाएक कविता की ओर मेरा झुकाव हो जाना और किस तरह संभव था।

    हाँ तो, कविता-शब्द का नाम मैंने पहले-पहल अपने उसी देहाती मदरसे में ही पढ़ा-सुना। वह देहाती मदरसे अब भी उसी तरह चल रहा है, उसके पार्श्व में शोभित वह पुराना वृक्ष आज भी विद्यमान हैं, जिसकी शाखाओं को पकड़कर अवकाश के समय हम इस तरह झूला करते थे, मानो हमने पिता की ही बाँह गह ली हो। शिशुगण अव भी उसके साथ खेलते होंगे, लेकिन उसे शायद यह याद होगा कि एक दिन इन्हीं-जैसा एक और बालक भी उनके अपार्थिव आकाश में कविता हिंडोले में अज्ञात से झूल गया है।

    तो मेरे उस शैशव में हिंदी कविता कहाँ थी? तब छायावाद तो बहुत दूर की कल्पना था, मैंने ब्रजभाषा और खड़ीबोली का नाम भी सुना था मेरे लिए तो बस पद्य, पद्य थे; चाहे ब्रजभाषा में रहे हों, छाहे खड़ीबोली में। गद्य और पद्य का कलात्मक अंतर क्या है, तब मैं यह नहीं जानता था। कोई बतलाने वाला भी तो था। बातचीत की तरह सपाटे के साथ, जिस मैटर को हम शिशुवृंद सीधे पढ़ जाते, उसे समझते थे गद्य और जिसे पढ़ने में जवान को इंटरवल देना पड़ता, उसे समझते थे पद्य। अपनी स्कूल-बुक में एक ओर मैं पं० प्रतापनारायण मिश्र की पंक्तियाँ गुनगुनाता था, दूसरी ओर बाबू मैथिलीशरण गुप्त की। प० प्रतापनारायण मिश्र भारतेंदु-युग के एक प्रतीक थे तो बाबू मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी-युग के अन्यतम प्रतीक। इन दोनों युगों के बीच पं० श्रीधर पाठक अपनी ब्रजभाषा-मिश्रित खड़ीबोली-द्वारा एक कड़ी बन गए थे।

    बचपन में पड़ी हुई कविताओं द्वारा मैं जो अतीत का यह चित्र देख रहा हूँ उसमें एक और निर्देश मिलता है, अर्थात् सन् 18 तक आज की खड़ीबोली की रूप-रेखा बन कली थी, साथ ही उन कलाकारों का भी उदय हो रहा था जो खड़ीबोली की रूप-रेखा को अपने कला-स्पर्श से बंकिम छटा देने की साधना कर रहे थे। मैंने अपने उसी स्कूल-बुक में परिहास-रसिक स्व० पं० बद्रीनाथ भट्ट की ये पंक्तियाँ भी पढ़ी थीं—

    अंत्यानुप्रास-हीन अथवा अतुकांत कविता—

    बाज़ीगर ने लिए कोयले आठ-दस

    उन्हें पीसकर घोला एक गिलास में;

    सुजनसिंह थे वहाँ तमाशा देखते।

    आज ये पंक्तियाँ मुझे पूरी नही याद रही हैं, किंतु इनमें एक पंक्ति आज भी ध्यान खींचती है—‘ अंत्यानुप्रास-हीना अथवा अतुकांत कविता’। जान पड़ता है कि जिस समय यह कविता(!) पढ़ी थी, उस समय के पूर्व, खड़ीबोली में अतुकांत कविता का भी श्रीगणेश हो गया था। अर्थात्, खड़ीबोली खड़ी हो गई थी और वह अपना अग-संचालन करने जा रही थी, कला की मुरकियों में उसने अपनी पहली अंगभंगी अतुकांत कविता से की। कहा जाता है कि अतुकांत के उद्भावक ‘प्रसाद’ जी थे। किंतु ‘प्रसाद’ के पहले भी अतुकांत-कविता संस्कृत छंदों-द्वारा की गई है। प्रसाद की नवीनता यह कि उन्होंने अतुकांत में मात्रिक छंदों का उपयोग किया। पंत ने भी ‘ग्रंथि’ में मात्रिक छंद को ही अपनाया। इसके बाद गुप्त जी और निराला जी ने अतुकांत को विशेष उत्कर्ष दिया। गुप्त जी ने घनाक्षरी छंद का एक टुकड़ा लेकर घनाक्षरी नाम में ‘मेघनाद-वध’ में प्रयोग किया। निरालाजी ने भी घनाक्षरी के ही प्रवाह पर अपने अतुकांत मुक्तछंद की रचना की, जिसमें छंद का नियम होते भी वाक्य-प्रवाह से ही छंद का निर्देश मिलता है। आगे चलकर सियारामशरणजी और प्रसादजी ने इसी वाक्य-प्रवाह पूर्ण अतुकांत को अपनाया। प्रसादजी ने अपने ‘लहर’ में ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’ और ‘रूप की छाया’ शीर्षक कविताओं में पूर्णत: ‘निराला’-शैली का अनुसरण किया, किंतु सियारामजी ने उससे कुछ भिन्न होकर।

    अतुकांत के बाद खड़ीबोली की कविता ने अपने विकासक्रम से, पद-संगीत, शब्द-सौंदर्य और भाव-व्यंजना में उन्नति की। इस उन्नति तक पहुँचने में खड़ीबोली की कविता को जाने कितना उपहास सहना पड़ा होगा।

    एक दिन जैसे ब्रजभाषी खड़ीबोली को हँसते थे, उसी प्रकार आगे चलकर खड़ीबोली के पुराने हिमायती ही खड़ीबोली की नवीन मुद्राओं, कविता की नवीन कलाभिव्यक्तियों पर हँसने लगे। किंतु खड़ीबोली अपनी काव्य-दिशा में सुदृढ़ आत्मनिष्ठा से आगे ही बढ़ती चली गई, निदान हमारी तरुण-पीढ़ी ने उसे छायावाद के रूप में पाकर उसका स्वागत किया।

    (दो)

    इस समय छायावाद विवाद की उस मंज़िल पर है जहाँ पर हमारी राष्ट्रीय महासभा कांग्रेस से लिबरलों का भी असंतोष है, समाजवादियों का भी। एक दल अति-प्रतिगामी है, दूसरा अति-प्रगतिशील। आज साहित्य में भी ये प्रतिगामी और प्रगतिशील शक्तियाँ छायावाद का मूल्य नहीं आँक पातीं।

    कांग्रेस को लिबरलों ने ही जन्म दिया, ठीक उसी प्रकार जैसे खड़ीबोली को द्विवेदी-युग ने। कांग्रेस के भीतर स्वतंत्रता की आकांक्षा उसी प्रकार जगी, जैसे हमारे काव्य में भावों और कला की। गांधी-युग की कांग्रेस ने देश को आत्मनिरीक्षण दिया, छायावाद ने खड़ीबोली की कविता को। हिंदी कविता ने कांग्रेस के उद्येश्यों को भी अपनाया। उसने उसके राष्ट्रीय नारों का साथ दिया, चर्खे की गूँज में अपना भी कंठ मिलाया, कघ के ताने-बाने में अपने लिए भी एक राष्ट्रीय परिधान बुन लिया। इस तरह कांग्रेस के साथ हिंदी-कविता जन-समाज के संपर्क में भी गई, उसमें हाड़-मांस का एक पीड़ित देश भी बोल उठा। कविता के भीतर जो स्वाभाविक सहृदयता हो सकती है, उसने इस प्रकार बाह्यजगत् के सुख-दुख को भी स्पर्श करने में कृपणता नहीं की। इस प्रकार छायावाद वस्तुजगत् में लिबरलों से आगे होकर भी समाजवादियों की अतिवास्तविकता के समीप भी नहीं। किसी भी पीड़न में संवेदना के लिए संबद्ध रहकर छायावाद गृहस्थों की भाँति मुख्यतः अपने आंतरिक जगत् में ही मग्न है। हाँ, वस्तुजगत् के लिए वह सहयोगी हो सकता है, अधिनायक नहीं—

    बसावे एक नया संसार

    जहाँ सपने हो पहरेदार

    तब उस संसार को कर्घों और मिलों में बाँध रखना संभव नहीं। उसे आपको कुछ कंसेशन देना होगा।

    कवि ने आपके समाज में जन्म लिया है, उसने आपसे भाषा पाई है, वह आपका आभारी होकर इतना कर सकता है कि आपकी भाषा में अपने जी की बात कुछ-कुछ बुझा सके। फिर भी यदि आप नहीं बूझ पाते हैं तो यह कवि का दोष नहीं, बल्कि आपके ही भीतर कविता का अभाव है। कवि तो इतिवृत्त नहीं देता, जिसे कि आप साद्यंत सुन-समझकर अपने जीवन के रूटीन वर्क को चालू कर सकें। वह तो केवल संकेत देता है। आपने उसे जो भाषा दी है वह उसके लिए अपर्याप्त है। आप दृश्यजगत् के लिए अपनी भाषा को भले ही पूर्ण बना लें किंतु अदृश्य जगत् के लिए वह सदैव अपूर्ण रहेगी। अपनी भाषा से आप विज्ञान को पूर्णता दे सकते हैं, किंतु जिसकी पूर्णता की सीमा नहीं है, जो असीम और अनुभव-जन्य है, उस अव्यक्त को व्यक्त होने के लिए कभी भी पूर्ण भाषा नहीं प्राप्त हो सकती। उसे संकेतों से ही समझना होगा, उसके लिए स्वयं भी कवि होना पड़ेगा।

    एक शिशु पृथ्वी पर आता है, वह सर्वथा नूतन अतिथि यहाँ आने से पहले अपना भी एक संसार लेकर आता है, वह कुछ कहना चाहता है—कह नहीं पाता, वह किलक कर, कलप कर रह जाता है। आप इतने सयाने होने पर भी उसके अभिप्राय को ग्रहण नहीं कर पाते, फिर भी उस पर न्योछावर हो-हो जाते हैं। आपका मुग्ध-मूक हृदय भीतर ही भीतर उसके अभिप्राय को ग्रहण करता है। वह अभिप्राय क्या है, आपकी भाषा उसे कह नहीं पाती, फिर भी आपकी निर्वाक् मूकता में एक रस बरस जाता है, आप बलि-बलि जाते हैं। वही शिशु धीरे-धीरे बड़ा होता है। आप कहते हैं—मेरा लल्ला अब सयाना हो गया! क्योंकि, वह आपकी भाषा में बोलने लगा है, आप उसकी बातें समझने लगे हैं। किंतु आपका लल्ला अपना जो अज्ञात संसार छोड़ आया है, उपवन के फूलों की तरह जाने कितने भावों का बलिदान चढ़ा आया है, उसके उस संसार से, उसके उस भाव-जगत् से आप तो अपरिचित ही रह गए, साथ ही वह भी रिक्त हो गया है। छायावाद का कवि उसी शिशु-सी मूकता और रिक्तता को आपकी भाषा में वाणी और रस देने का प्रयत्न करता है। वह आपकी दुनिया में आकर भी अपनी दुनिया को भूल सका। कभी-कभी वह सोलहों आना आपकी भाषा में ही आपके देशप्रेम, आपके अछूतोद्धार, आपके खादी-प्रचार तथा आपके नाना राजनीतिक और सामाजिक असंतोष के स्वर में स्वर भी मिला देता है, तब आप उसकी इन मैटर-ऑफ़-फ़ैक्ट बातों को समझ लेते हैं। किंतु जब वह आपकी दुनिया से ज़रा विश्राम लेकर अपने एकांत में, अपने तन्मय क्षणों में, कुछ गाता है तब आप उसे समझने में अनुदार क्यों हो जाते हैं? भूल क्यों जाते हैं कि उसकी अपनी भी व्यथा-कथा है; वह कोरा यंत्र नहीं, बल्कि यंत्रण-विदग्ध एक प्राणी भी है। आह, उसके सबजेक्टिव संसार के सुख-दुख को कौन ग्रहण करेगा? उसके घायल हृदय को कौन सहलाएगा? मीरा ने तो आकुल-व्याकुल होकर कह दिया था—

    दरद की मारी बन-बन डोलूँ

    वैद मिला नहिं कोय;

    मीरा की तब पीर मिटैगी

    वैद सँबलिया होय।

    स्रोत :
    • पुस्तक : संचारिणी (पृष्ठ 241)
    • रचनाकार : शांतिप्रिय द्विवेदी
    • प्रकाशन : द इंडियन प्रेस लिमिटेड
    • संस्करण : 1939

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