कविता—इस शब्द का नाम मैंने पहले-पहल कदाचित् सन् 18 में सुना था। तब, देहाती मदरसे के तीसरे या चौथे दर्जे में पढ़ता था। बालक था। ऐसा जान पड़ता है कि मनुष्य के मन के भीतर भी कोई एक स्प्रिंग होती है, वह उसे छुटपन से ही घड़ी की सुई की तरह उस अभीष्ट की ओर उन्मुख रखती है जिस संसार में वह जन्मजात संस्कारों से जाने को होता है। नहीं तो देहात के उस ठेठ वातावरण में जहाँ कोई साहित्य समाज न था, कोई कला रसिक न था, कोई पथ-प्रदर्शक न था, एकाएक कविता की ओर मेरा झुकाव हो जाना और किस तरह संभव था।
हाँ तो, कविता-शब्द का नाम मैंने पहले-पहल अपने उसी देहाती मदरसे में ही पढ़ा-सुना। वह देहाती मदरसे अब भी उसी तरह चल रहा है, उसके पार्श्व में शोभित वह पुराना वृक्ष आज भी विद्यमान हैं, जिसकी शाखाओं को पकड़कर अवकाश के समय हम इस तरह झूला करते थे, मानो हमने पिता की ही बाँह गह ली हो। शिशुगण अव भी उसके साथ खेलते होंगे, लेकिन उसे शायद यह याद न होगा कि एक दिन इन्हीं-जैसा एक और बालक भी उनके अपार्थिव आकाश में कविता हिंडोले में अज्ञात से झूल गया है।
तो मेरे उस शैशव में हिंदी कविता कहाँ थी? तब छायावाद तो बहुत दूर की कल्पना था, मैंने ब्रजभाषा और खड़ीबोली का नाम भी न सुना था मेरे लिए तो बस पद्य, पद्य थे; चाहे ब्रजभाषा में रहे हों, छाहे खड़ीबोली में। गद्य और पद्य का कलात्मक अंतर क्या है, तब मैं यह नहीं जानता था। कोई बतलाने वाला भी तो न था। बातचीत की तरह सपाटे के साथ, जिस मैटर को हम शिशुवृंद सीधे पढ़ जाते, उसे समझते थे गद्य और जिसे पढ़ने में जवान को इंटरवल देना पड़ता, उसे समझते थे पद्य। अपनी स्कूल-बुक में एक ओर मैं पं० प्रतापनारायण मिश्र की पंक्तियाँ गुनगुनाता था, दूसरी ओर बाबू मैथिलीशरण गुप्त की। प० प्रतापनारायण मिश्र भारतेंदु-युग के एक प्रतीक थे तो बाबू मैथिलीशरण गुप्त द्विवेदी-युग के अन्यतम प्रतीक। इन दोनों युगों के बीच पं० श्रीधर पाठक अपनी ब्रजभाषा-मिश्रित खड़ीबोली-द्वारा एक कड़ी बन गए थे।
बचपन में पड़ी हुई कविताओं द्वारा मैं जो अतीत का यह चित्र देख रहा हूँ उसमें एक और निर्देश मिलता है, अर्थात् सन् 18 तक आज की खड़ीबोली की रूप-रेखा बन कली थी, साथ ही उन कलाकारों का भी उदय हो रहा था जो खड़ीबोली की रूप-रेखा को अपने कला-स्पर्श से बंकिम छटा देने की साधना कर रहे थे। मैंने अपने उसी स्कूल-बुक में परिहास-रसिक स्व० पं० बद्रीनाथ भट्ट की ये पंक्तियाँ भी पढ़ी थीं—
अंत्यानुप्रास-हीन अथवा अतुकांत कविता—
बाज़ीगर ने लिए कोयले आठ-दस
उन्हें पीसकर घोला एक गिलास में;
सुजनसिंह थे वहाँ तमाशा देखते।
आज ये पंक्तियाँ मुझे पूरी नही याद रही हैं, किंतु इनमें एक पंक्ति आज भी ध्यान खींचती है—‘ अंत्यानुप्रास-हीना अथवा अतुकांत कविता’। जान पड़ता है कि जिस समय यह कविता(!) पढ़ी थी, उस समय के पूर्व, खड़ीबोली में अतुकांत कविता का भी श्रीगणेश हो गया था। अर्थात्, खड़ीबोली खड़ी हो गई थी और वह अपना अग-संचालन करने जा रही थी, कला की मुरकियों में उसने अपनी पहली अंगभंगी अतुकांत कविता से की। कहा जाता है कि अतुकांत के उद्भावक ‘प्रसाद’ जी थे। किंतु ‘प्रसाद’ के पहले भी अतुकांत-कविता संस्कृत छंदों-द्वारा की गई है। प्रसाद की नवीनता यह कि उन्होंने अतुकांत में मात्रिक छंदों का उपयोग किया। पंत ने भी ‘ग्रंथि’ में मात्रिक छंद को ही अपनाया। इसके बाद गुप्त जी और निराला जी ने अतुकांत को विशेष उत्कर्ष दिया। गुप्त जी ने घनाक्षरी छंद का एक टुकड़ा लेकर घनाक्षरी नाम में ‘मेघनाद-वध’ में प्रयोग किया। निरालाजी ने भी घनाक्षरी के ही प्रवाह पर अपने अतुकांत मुक्तछंद की रचना की, जिसमें छंद का नियम न होते भी वाक्य-प्रवाह से ही छंद का निर्देश मिलता है। आगे चलकर सियारामशरणजी और प्रसादजी ने इसी वाक्य-प्रवाह पूर्ण अतुकांत को अपनाया। प्रसादजी ने अपने ‘लहर’ में ‘पेशोला की प्रतिध्वनि’ और ‘रूप की छाया’ शीर्षक कविताओं में पूर्णत: ‘निराला’-शैली का अनुसरण किया, किंतु सियारामजी ने उससे कुछ भिन्न होकर।
अतुकांत के बाद खड़ीबोली की कविता ने अपने विकासक्रम से, पद-संगीत, शब्द-सौंदर्य और भाव-व्यंजना में उन्नति की। इस उन्नति तक पहुँचने में खड़ीबोली की कविता को न जाने कितना उपहास सहना पड़ा होगा।
एक दिन जैसे ब्रजभाषी खड़ीबोली को हँसते थे, उसी प्रकार आगे चलकर खड़ीबोली के पुराने हिमायती ही खड़ीबोली की नवीन मुद्राओं, कविता की नवीन कलाभिव्यक्तियों पर हँसने लगे। किंतु खड़ीबोली अपनी काव्य-दिशा में सुदृढ़ आत्मनिष्ठा से आगे ही बढ़ती चली गई, निदान हमारी तरुण-पीढ़ी ने उसे छायावाद के रूप में पाकर उसका स्वागत किया।
(दो)
इस समय छायावाद विवाद की उस मंज़िल पर है जहाँ पर हमारी राष्ट्रीय महासभा कांग्रेस से लिबरलों का भी असंतोष है, समाजवादियों का भी। एक दल अति-प्रतिगामी है, दूसरा अति-प्रगतिशील। आज साहित्य में भी ये प्रतिगामी और प्रगतिशील शक्तियाँ छायावाद का मूल्य नहीं आँक पातीं।
कांग्रेस को लिबरलों ने ही जन्म दिया, ठीक उसी प्रकार जैसे खड़ीबोली को द्विवेदी-युग ने। कांग्रेस के भीतर स्वतंत्रता की आकांक्षा उसी प्रकार जगी, जैसे हमारे काव्य में भावों और कला की। गांधी-युग की कांग्रेस ने देश को आत्मनिरीक्षण दिया, छायावाद ने खड़ीबोली की कविता को। हिंदी कविता ने कांग्रेस के उद्येश्यों को भी अपनाया। उसने उसके राष्ट्रीय नारों का साथ दिया, चर्खे की गूँज में अपना भी कंठ मिलाया, कघ के ताने-बाने में अपने लिए भी एक राष्ट्रीय परिधान बुन लिया। इस तरह कांग्रेस के साथ हिंदी-कविता जन-समाज के संपर्क में भी आ गई, उसमें हाड़-मांस का एक पीड़ित देश भी बोल उठा। कविता के भीतर जो स्वाभाविक सहृदयता हो सकती है, उसने इस प्रकार बाह्यजगत् के सुख-दुख को भी स्पर्श करने में कृपणता नहीं की। इस प्रकार छायावाद वस्तुजगत् में लिबरलों से आगे होकर भी समाजवादियों की अतिवास्तविकता के समीप भी नहीं। किसी भी पीड़न में संवेदना के लिए संबद्ध रहकर छायावाद गृहस्थों की भाँति मुख्यतः अपने आंतरिक जगत् में ही मग्न है। हाँ, वस्तुजगत् के लिए वह सहयोगी हो सकता है, अधिनायक नहीं—
बसावे एक नया संसार
जहाँ सपने हो पहरेदार
तब उस संसार को कर्घों और मिलों में बाँध रखना संभव नहीं। उसे आपको कुछ कंसेशन देना होगा।
कवि ने आपके समाज में जन्म लिया है, उसने आपसे भाषा पाई है, वह आपका आभारी होकर इतना कर सकता है कि आपकी भाषा में अपने जी की बात कुछ-कुछ बुझा सके। फिर भी यदि आप नहीं बूझ पाते हैं तो यह कवि का दोष नहीं, बल्कि आपके ही भीतर कविता का अभाव है। कवि तो इतिवृत्त नहीं देता, जिसे कि आप साद्यंत सुन-समझकर अपने जीवन के रूटीन वर्क को चालू कर सकें। वह तो केवल संकेत देता है। आपने उसे जो भाषा दी है वह उसके लिए अपर्याप्त है। आप दृश्यजगत् के लिए अपनी भाषा को भले ही पूर्ण बना लें किंतु अदृश्य जगत् के लिए वह सदैव अपूर्ण रहेगी। अपनी भाषा से आप विज्ञान को पूर्णता दे सकते हैं, किंतु जिसकी पूर्णता की सीमा नहीं है, जो असीम और अनुभव-जन्य है, उस अव्यक्त को व्यक्त होने के लिए कभी भी पूर्ण भाषा नहीं प्राप्त हो सकती। उसे संकेतों से ही समझना होगा, उसके लिए स्वयं भी कवि होना पड़ेगा।
एक शिशु पृथ्वी पर आता है, वह सर्वथा नूतन अतिथि यहाँ आने से पहले अपना भी एक संसार लेकर आता है, वह कुछ कहना चाहता है—कह नहीं पाता, वह किलक कर, कलप कर रह जाता है। आप इतने सयाने होने पर भी उसके अभिप्राय को ग्रहण नहीं कर पाते, फिर भी उस पर न्योछावर हो-हो जाते हैं। आपका मुग्ध-मूक हृदय भीतर ही भीतर उसके अभिप्राय को ग्रहण करता है। वह अभिप्राय क्या है, आपकी भाषा उसे कह नहीं पाती, फिर भी आपकी निर्वाक् मूकता में एक रस बरस जाता है, आप बलि-बलि जाते हैं। वही शिशु धीरे-धीरे बड़ा होता है। आप कहते हैं—मेरा लल्ला अब सयाना हो गया! क्योंकि, वह आपकी भाषा में बोलने लगा है, आप उसकी बातें समझने लगे हैं। किंतु आपका लल्ला अपना जो अज्ञात संसार छोड़ आया है, उपवन के फूलों की तरह न जाने कितने भावों का बलिदान चढ़ा आया है, उसके उस संसार से, उसके उस भाव-जगत् से आप तो अपरिचित ही रह गए, साथ ही वह भी रिक्त हो गया है। छायावाद का कवि उसी शिशु-सी मूकता और रिक्तता को आपकी भाषा में वाणी और रस देने का प्रयत्न करता है। वह आपकी दुनिया में आकर भी अपनी दुनिया को भूल न सका। कभी-कभी वह सोलहों आना आपकी भाषा में ही आपके देशप्रेम, आपके अछूतोद्धार, आपके खादी-प्रचार तथा आपके नाना राजनीतिक और सामाजिक असंतोष के स्वर में स्वर भी मिला देता है, तब आप उसकी इन मैटर-ऑफ़-फ़ैक्ट बातों को समझ लेते हैं। किंतु जब वह आपकी दुनिया से ज़रा विश्राम लेकर अपने एकांत में, अपने तन्मय क्षणों में, कुछ गाता है तब आप उसे समझने में अनुदार क्यों हो जाते हैं? भूल क्यों जाते हैं कि उसकी अपनी भी व्यथा-कथा है; वह कोरा यंत्र नहीं, बल्कि यंत्रण-विदग्ध एक प्राणी भी है। आह, उसके सबजेक्टिव संसार के सुख-दुख को कौन ग्रहण करेगा? उसके घायल हृदय को कौन सहलाएगा? मीरा ने तो आकुल-व्याकुल होकर कह दिया था—
दरद की मारी बन-बन डोलूँ
वैद मिला नहिं कोय;
मीरा की तब पीर मिटैगी
वैद सँबलिया होय।
(ek)
kavita —is shabd ka naam mainne pahle pahal kadachit san 18 mein suna tha. tab, dehati madrase ke tisre ya chauthe darje mein paDhta tha. balak tha. aisa jaan paDta hai ki manushya ke man ke bhitar bhi koi ek spring hoti hai, wo use chhutpan se hi ghaDi ki sui ki tarah us abhisht ki or unmukh rakhti hai jis sasar mein wo janmajat sanskaron se jane ko hota hai. nahi to dehat ke us theth vatavran mein jahan koi sahitya samaj na tha, koi kala rasik na tha, koi path pradarshak na tha, ekayek kavita ki or menra jhukav ho jana aur kis tarah sambhav tha.
haan to, kavita shabd ka naam mainne pahle pahal apne usi dehati madrase mein hi paDha suna. wo dehati madrase ab bhi usi tarah chal raha hai, uske paarshv mein shobhit wo purana vriksh aaj bhi vidyaman hain, jiski shakhaon ko pakaDkar avkash ke samay hum is tarah jhula karte the, mano hamne pita ki hi baanh gah li ho. shishugan av bhi uske saath khelte honge, lekin use shayad ye yaad na hoga ki ek din inhin jaisa ek aur balak bhi unke aparthiv akash mein kavita hinDole mein agyat se jhool gaya hai.
to menre us shaishav mein hindi kavita kahan thee? tab chhayavad to bahut door ki kalpana tha, mainne brajbhasha aur khaDiboli ka naam bhi na suna tha menre liye to bas padya, padya the; chahe brajbhasha mein rahe hon, chhahe khaDiboli mein. gadya aur padya ka kalatmak antar kya hai, tab main ye nahin janta tha. koi batlanevala bhi to na tha. batachit ki tarah sapate ke saath, jis maitar ko hum shishuvrind sidhe paDh jate, use samajhte the gadya aur jise paDhne mein javan ko intarval dena paDta, use samajhte the padya. apni skool buq mein ek or main pan० pratap narayan mishr ki panktiyan gungunata tha, dusri or babu maithilishran gupt ki. pa० prtapnarayan mishr bhartendu yug ke ek pratik the to babu maithilishran gupt dvivedi yug ke pyanytam pratik in donon yugon ke beech pan० shridhar pathak apni brajbhasha mishrit khaDiboli dvara ek kaDi ban ge the.
bachpan mein paDi hui kavitaon dvara main jo atit ka ye chitr dekh raha hoon usmen ek aur nirdesh milta hai, arthat san 18 tak aaj ki khaDiboli ki roop rekha ban kali thi, saath hi un kalakaron ka bhi uday ho raha tha jo khaDiboli ki roop rekha ko apne kala sparsh se bankim chhata dene ki sadhana kar rahe the. mainne apne usi skool buq mein parihasarsik sva० pan० badrinath bhatt ki ye panktiyan bhi paDhi theen —
antyanu’pras heen athva atukant kavita —
bazigar ne liye koyle aath das
unhen piskar ghola ek gilas men;
sujansinh the vahan tamasha dekhte.
aaj ye panktiyan mujhe puri nahi yaad rahi hain, kintu inmen ek pankti aaj bhi dhyaan khinchti hai—‘antyanupras hona athva atukant kavita’. jaan paDta hai ki jis samay ye kavita(!) paDhi thi, us samay ke poorv, khaDiboli mein atukant kavita ka bhi shrignesh ho gaya tha. arthat, khaDiboli khaDi ho gai thi aur wo apna ag sanchalan karne ja rahi thi, kala ki murakiyon mein usne apni pahli angbhangi atukant kavita se ki. kaha jata hai ki atukant ke udbhavak ‘parsad’ ji the. kintu ‘parsad’ ke pahle bhi atukant kavita sanskrit chhandon dvara ki gai hai. parsad ki navinata ye ki unhonne atukant mein matrik chhandon ka upyog kiya. pant ne bhi ‘granthi’ mein matrik chhand ko hi apnaya. iske baad gupt ji aur nirala ji ne atukant ko vishesh utkarshan diya. gupt ji ne ghanakshari chhand ka ek tukDa lekar ghanakshari naam mein ‘menghnad vadh’ mein prayog prayog kiya. niralaji ne bhi ghanakshari ke hi pravah par apne atukant muktchhand ki rachna ki, jismen chhand ka niyam na hote bhi vakya pravah se hi chhand ka nirdesh milta hai. aage chalkar siyaramasharanji aur prsadji ne isi vakya pravah poorn atukant ko apnaya. prsadji ne apne ‘lahr’ mein ‘peshola ki pratidhvani’ aur ‘roop ki chhaya’ shirshak kavitaon mein purntah ‘nirala’ shaili ka anusran kiya, kintu siyaramji ne usse kuch bhinn hokar.
atukant ke baad khaDiboli ki kavita ne apne vikasakram se, pad sangit, shabd saundarya aur bhaav vyanjna mein unnati ki. is unnati tak pahunchne mein khaDiboli ki kavita ko na jane kitna uphaas sahna paDa hoga.
ek din jaise brajbhashi khaDiboli ko hanste the, usi prakar aage chalkar khaDiboli ke purane himayati hi khaDiboli ki navin mudraon, kavita ki navin kalabhivyaktiyon par hansne lage. kintu khaDiboli apni kavya disha mein sudriDh atmanishtha se aage hi baDhti chali gai, nidan hamari tarun piDhi ne use chhayavad ke roop mein pakar uska svagat kiya.
(do)
is samay chhayavad vivad ki us manzil par hai jahan par hamari rashtriy mahasabha kangres se libarlon ka bhi asantosh hai, samajvadiyon ka bhi. ek dal ati pratigami hai, dusra ati pragtishil. aaj sahitya mein bhi ye pratigami aur pragtishil shaktiyan chhayavad ka mulya nahin aank patin.
kangres ko libarlon ne hi janm diya, theek usi prakar jaise khaDiboli ko dvivedi yug ne. kangres ke bhitar svtantrta ki akanksha usi prakar jagi, jaise hamare kavya mein bhavon aur kala ki. gandhi yug ki kangres ne desh ko atmanirikshan diya, chhayavad ne khaDiboli ki kavita ko. hindi kavita ne kangres ke udyeshyon ko bhi apnaya. usne uske rashtriy naron ka saath diya, charkhe ki goonj mein apna bhi kanth milaya, kagh ke tane bane mein apne liye bhi ek rashtriy paridhan bun liya. is tarah kangres ke saath hindi kavita jan samaj ke sampark mein bhi aa gai, usmen haaD maans ka ek piDit desh bhi bol utha. kavita ke bhitar jo svabhavik sahyadayta ho sakti hai, usne is prakar bahyajgat ke sukh dukh ko bhi sparsh karne mein kripanta nahin ki. is prakar chhayavad vastujgat mein libarlon se aage hokar bhi samajvadiyon ki ativastavikta ke samip bhi nahin. kisi bhi piDan mein sanvedna ke liye sannaddh rahkar chhayavad grihasthon ki bhanti mukhyatः apne antrik jagat mein hi magn hai. haan, vastujgat ke liye wo sahyogi ho sakta hai, adhinayak nahin—
manushya ka ek antarjgat bhi hai, jise aap antarlok ya sabjektiv sansar kah sakte hain. shahid ho janevale haaD maas ke sharir ke bhitar bhi ek hrday rota hansta rahta hai jo keval jan samaj se hi nahin, balki sampurn srishti se na jane apne man ka kya kya upadan grhan karta hai, na jane kin kin bhavbhangiyon mein srishti ko apne mein aur apne ko srishti mein kya kya abhivyaktiyan dene ko anchhadit ho sakta hai, kintu ant sharir (hrday) na to deshi kargheka vastra grhan kar pata hai na vilayati milon ka, donon hi uske liye bhari hai. aagre ka tajamhal suraksha ke liye kisi baDe ghilaf se Dhanka ja sakta hai, kintu uske us sookshm vayumanDal ko jismen hrday ki saans umaD ghumaD rahi hai, hum kis achchhadan se veshtit kar sakte hai? wo to ek aur hi sansar hai jahan ki chetna ka kalavran grhan karne mein manushya ko apne simit samaj se aage jakar vidhata ki asim srishti ka abhari hona paDta hai. kavi jab kahta hai—
rajni oDhe jati thi
jhilmil taron ki jali
athva—
basave ek naya sansar
jahan sapne ho pahredar
tab us sansar ko karghon aur milon mein baandh rakhna sambhav nahin. use aapko kuch kanseshan dena hoga.
kavi ne aapke samaj mein janm liya hai, usne aapse bhasha pai hai, wo aapka abhari hokar itna kar sakta hai ki apaki bhasha mein apne ji ki baat kuch kuch bujha sake. phir bhi yadi aap nahin boojh pate hain to ye kavi ka dosh nahin, balki aapke hi bhitar kavita ka abhav hai. kavi to itivritt nahin deta, jise ki aap sadyant sun samajhkar apne jivan ke rutin vark ko chalu kar saken. wo to keval sanket deta hai. aapne use jo bhasha di hai wo uske liye aparyapt hai. aap drishyajgat ke liye apni bhasha ko bhale hi poorn bana len kintu adrishya jagat ke liye wo sadaiv apurn rahegi. apni bhasha se aap vigyan ko purnta se sakte hain, kintu jiski purnta ki sima nahin hai, jo asim aur anubhav janya hai, us avyakt ko vyakt hone ke liye kabhi bhi poorn bhasha nahin praapt ho sakti. use sanketon se hi samajhna hoga, uske liye svayan bhi kavi hona paDega.
ek shishu prithvi par aata hai, wo sarvatha nutan atithi yahan aane se pahile apna bhi ek sansar lekar aata hai, wo kuch kahna chahta hai—kah nahin pata, wo klik kar, kalap kar rah jata hai. aap itne sayane hone par bhi uske abhipray ko grhan nahin kar pate, phir bhi us par nyochhavar ho ho jate hain. aapka mugdh mook hriday bhitar hi bhitar uske abhipray ko grhan karta hai. wo abhipray kya hai, apaki bhasha use kah nahin pati, phir bhi apaki nirvak mukata mein ek ras baras jata hai, aap bali bali jate hain. vahi shishu dhire dhire baDa hota hai. aap kahte hain—menra lalla ab sayana ho gaya! kyonki, wo apaki bhasha mein bolne laga hai, aap uski baten samajhne lage hain. kintu aapka lalla apna jo agyat sansar chhoD aaya hai, upvan ke phulon ki tarah na jane kitne bhavon ka balidan chaDha aaya hai, uske us sansar se, uske us bhaav jagat se aap to aprichit hi rah ge, saath hi wo bhi rikt ho gaya hai. chhayavad ka kavi usi shishu si mukata aur riktata ko apaki bhasha mein vani aur ras dene ka prayatn karta hai. wo apaki duniya mein aakar bhi apni duniya ko bhool na saka. kabhi kabhi wo solhon aana apaki bhasha main hi aapke deshaprem, aapke achhutoddhar, aapke khadi parchar tatha aapke nana rajnitik aur samajik asantosh ke svar mein svar bhi mila deta hai, tab aap uski in maitar auph faikt baton ko samajh lete hai. kintu jab wo apaki duniya se zara vishram lekar apne ekaant mein, apne tanmay kshnon mein, kuch gata hai tab aap use samajhne mein anudar kyon ho jate hain? bhool kyon jate hain ki uski apni bhi vyatha katha hai; wo kora yantr nahin, balki yantran vidagdh ek prani bhi hai. aah, uske sabjektiv sansar ke sukh dukh ko kaun grhan karega? uske ghayal hrday ko kaun sahlayega? mera ne to aakul vyakul hokar kah diya tha—
dard ki mari ban ban Dolun
vaid mila nahin koy;
mera ki tab peer mitaigi
vaid sanbliya hoy.
(ek)
kavita —is shabd ka naam mainne pahle pahal kadachit san 18 mein suna tha. tab, dehati madrase ke tisre ya chauthe darje mein paDhta tha. balak tha. aisa jaan paDta hai ki manushya ke man ke bhitar bhi koi ek spring hoti hai, wo use chhutpan se hi ghaDi ki sui ki tarah us abhisht ki or unmukh rakhti hai jis sasar mein wo janmajat sanskaron se jane ko hota hai. nahi to dehat ke us theth vatavran mein jahan koi sahitya samaj na tha, koi kala rasik na tha, koi path pradarshak na tha, ekayek kavita ki or menra jhukav ho jana aur kis tarah sambhav tha.
haan to, kavita shabd ka naam mainne pahle pahal apne usi dehati madrase mein hi paDha suna. wo dehati madrase ab bhi usi tarah chal raha hai, uske paarshv mein shobhit wo purana vriksh aaj bhi vidyaman hain, jiski shakhaon ko pakaDkar avkash ke samay hum is tarah jhula karte the, mano hamne pita ki hi baanh gah li ho. shishugan av bhi uske saath khelte honge, lekin use shayad ye yaad na hoga ki ek din inhin jaisa ek aur balak bhi unke aparthiv akash mein kavita hinDole mein agyat se jhool gaya hai.
to menre us shaishav mein hindi kavita kahan thee? tab chhayavad to bahut door ki kalpana tha, mainne brajbhasha aur khaDiboli ka naam bhi na suna tha menre liye to bas padya, padya the; chahe brajbhasha mein rahe hon, chhahe khaDiboli mein. gadya aur padya ka kalatmak antar kya hai, tab main ye nahin janta tha. koi batlanevala bhi to na tha. batachit ki tarah sapate ke saath, jis maitar ko hum shishuvrind sidhe paDh jate, use samajhte the gadya aur jise paDhne mein javan ko intarval dena paDta, use samajhte the padya. apni skool buq mein ek or main pan० pratap narayan mishr ki panktiyan gungunata tha, dusri or babu maithilishran gupt ki. pa० prtapnarayan mishr bhartendu yug ke ek pratik the to babu maithilishran gupt dvivedi yug ke pyanytam pratik in donon yugon ke beech pan० shridhar pathak apni brajbhasha mishrit khaDiboli dvara ek kaDi ban ge the.
bachpan mein paDi hui kavitaon dvara main jo atit ka ye chitr dekh raha hoon usmen ek aur nirdesh milta hai, arthat san 18 tak aaj ki khaDiboli ki roop rekha ban kali thi, saath hi un kalakaron ka bhi uday ho raha tha jo khaDiboli ki roop rekha ko apne kala sparsh se bankim chhata dene ki sadhana kar rahe the. mainne apne usi skool buq mein parihasarsik sva० pan० badrinath bhatt ki ye panktiyan bhi paDhi theen —
antyanu’pras heen athva atukant kavita —
bazigar ne liye koyle aath das
unhen piskar ghola ek gilas men;
sujansinh the vahan tamasha dekhte.
aaj ye panktiyan mujhe puri nahi yaad rahi hain, kintu inmen ek pankti aaj bhi dhyaan khinchti hai—‘antyanupras hona athva atukant kavita’. jaan paDta hai ki jis samay ye kavita(!) paDhi thi, us samay ke poorv, khaDiboli mein atukant kavita ka bhi shrignesh ho gaya tha. arthat, khaDiboli khaDi ho gai thi aur wo apna ag sanchalan karne ja rahi thi, kala ki murakiyon mein usne apni pahli angbhangi atukant kavita se ki. kaha jata hai ki atukant ke udbhavak ‘parsad’ ji the. kintu ‘parsad’ ke pahle bhi atukant kavita sanskrit chhandon dvara ki gai hai. parsad ki navinata ye ki unhonne atukant mein matrik chhandon ka upyog kiya. pant ne bhi ‘granthi’ mein matrik chhand ko hi apnaya. iske baad gupt ji aur nirala ji ne atukant ko vishesh utkarshan diya. gupt ji ne ghanakshari chhand ka ek tukDa lekar ghanakshari naam mein ‘menghnad vadh’ mein prayog prayog kiya. niralaji ne bhi ghanakshari ke hi pravah par apne atukant muktchhand ki rachna ki, jismen chhand ka niyam na hote bhi vakya pravah se hi chhand ka nirdesh milta hai. aage chalkar siyaramasharanji aur prsadji ne isi vakya pravah poorn atukant ko apnaya. prsadji ne apne ‘lahr’ mein ‘peshola ki pratidhvani’ aur ‘roop ki chhaya’ shirshak kavitaon mein purntah ‘nirala’ shaili ka anusran kiya, kintu siyaramji ne usse kuch bhinn hokar.
atukant ke baad khaDiboli ki kavita ne apne vikasakram se, pad sangit, shabd saundarya aur bhaav vyanjna mein unnati ki. is unnati tak pahunchne mein khaDiboli ki kavita ko na jane kitna uphaas sahna paDa hoga.
ek din jaise brajbhashi khaDiboli ko hanste the, usi prakar aage chalkar khaDiboli ke purane himayati hi khaDiboli ki navin mudraon, kavita ki navin kalabhivyaktiyon par hansne lage. kintu khaDiboli apni kavya disha mein sudriDh atmanishtha se aage hi baDhti chali gai, nidan hamari tarun piDhi ne use chhayavad ke roop mein pakar uska svagat kiya.
(do)
is samay chhayavad vivad ki us manzil par hai jahan par hamari rashtriy mahasabha kangres se libarlon ka bhi asantosh hai, samajvadiyon ka bhi. ek dal ati pratigami hai, dusra ati pragtishil. aaj sahitya mein bhi ye pratigami aur pragtishil shaktiyan chhayavad ka mulya nahin aank patin.
kangres ko libarlon ne hi janm diya, theek usi prakar jaise khaDiboli ko dvivedi yug ne. kangres ke bhitar svtantrta ki akanksha usi prakar jagi, jaise hamare kavya mein bhavon aur kala ki. gandhi yug ki kangres ne desh ko atmanirikshan diya, chhayavad ne khaDiboli ki kavita ko. hindi kavita ne kangres ke udyeshyon ko bhi apnaya. usne uske rashtriy naron ka saath diya, charkhe ki goonj mein apna bhi kanth milaya, kagh ke tane bane mein apne liye bhi ek rashtriy paridhan bun liya. is tarah kangres ke saath hindi kavita jan samaj ke sampark mein bhi aa gai, usmen haaD maans ka ek piDit desh bhi bol utha. kavita ke bhitar jo svabhavik sahyadayta ho sakti hai, usne is prakar bahyajgat ke sukh dukh ko bhi sparsh karne mein kripanta nahin ki. is prakar chhayavad vastujgat mein libarlon se aage hokar bhi samajvadiyon ki ativastavikta ke samip bhi nahin. kisi bhi piDan mein sanvedna ke liye sannaddh rahkar chhayavad grihasthon ki bhanti mukhyatः apne antrik jagat mein hi magn hai. haan, vastujgat ke liye wo sahyogi ho sakta hai, adhinayak nahin—
manushya ka ek antarjgat bhi hai, jise aap antarlok ya sabjektiv sansar kah sakte hain. shahid ho janevale haaD maas ke sharir ke bhitar bhi ek hrday rota hansta rahta hai jo keval jan samaj se hi nahin, balki sampurn srishti se na jane apne man ka kya kya upadan grhan karta hai, na jane kin kin bhavbhangiyon mein srishti ko apne mein aur apne ko srishti mein kya kya abhivyaktiyan dene ko anchhadit ho sakta hai, kintu ant sharir (hrday) na to deshi kargheka vastra grhan kar pata hai na vilayati milon ka, donon hi uske liye bhari hai. aagre ka tajamhal suraksha ke liye kisi baDe ghilaf se Dhanka ja sakta hai, kintu uske us sookshm vayumanDal ko jismen hrday ki saans umaD ghumaD rahi hai, hum kis achchhadan se veshtit kar sakte hai? wo to ek aur hi sansar hai jahan ki chetna ka kalavran grhan karne mein manushya ko apne simit samaj se aage jakar vidhata ki asim srishti ka abhari hona paDta hai. kavi jab kahta hai—
rajni oDhe jati thi
jhilmil taron ki jali
athva—
basave ek naya sansar
jahan sapne ho pahredar
tab us sansar ko karghon aur milon mein baandh rakhna sambhav nahin. use aapko kuch kanseshan dena hoga.
kavi ne aapke samaj mein janm liya hai, usne aapse bhasha pai hai, wo aapka abhari hokar itna kar sakta hai ki apaki bhasha mein apne ji ki baat kuch kuch bujha sake. phir bhi yadi aap nahin boojh pate hain to ye kavi ka dosh nahin, balki aapke hi bhitar kavita ka abhav hai. kavi to itivritt nahin deta, jise ki aap sadyant sun samajhkar apne jivan ke rutin vark ko chalu kar saken. wo to keval sanket deta hai. aapne use jo bhasha di hai wo uske liye aparyapt hai. aap drishyajgat ke liye apni bhasha ko bhale hi poorn bana len kintu adrishya jagat ke liye wo sadaiv apurn rahegi. apni bhasha se aap vigyan ko purnta se sakte hain, kintu jiski purnta ki sima nahin hai, jo asim aur anubhav janya hai, us avyakt ko vyakt hone ke liye kabhi bhi poorn bhasha nahin praapt ho sakti. use sanketon se hi samajhna hoga, uske liye svayan bhi kavi hona paDega.
ek shishu prithvi par aata hai, wo sarvatha nutan atithi yahan aane se pahile apna bhi ek sansar lekar aata hai, wo kuch kahna chahta hai—kah nahin pata, wo klik kar, kalap kar rah jata hai. aap itne sayane hone par bhi uske abhipray ko grhan nahin kar pate, phir bhi us par nyochhavar ho ho jate hain. aapka mugdh mook hriday bhitar hi bhitar uske abhipray ko grhan karta hai. wo abhipray kya hai, apaki bhasha use kah nahin pati, phir bhi apaki nirvak mukata mein ek ras baras jata hai, aap bali bali jate hain. vahi shishu dhire dhire baDa hota hai. aap kahte hain—menra lalla ab sayana ho gaya! kyonki, wo apaki bhasha mein bolne laga hai, aap uski baten samajhne lage hain. kintu aapka lalla apna jo agyat sansar chhoD aaya hai, upvan ke phulon ki tarah na jane kitne bhavon ka balidan chaDha aaya hai, uske us sansar se, uske us bhaav jagat se aap to aprichit hi rah ge, saath hi wo bhi rikt ho gaya hai. chhayavad ka kavi usi shishu si mukata aur riktata ko apaki bhasha mein vani aur ras dene ka prayatn karta hai. wo apaki duniya mein aakar bhi apni duniya ko bhool na saka. kabhi kabhi wo solhon aana apaki bhasha main hi aapke deshaprem, aapke achhutoddhar, aapke khadi parchar tatha aapke nana rajnitik aur samajik asantosh ke svar mein svar bhi mila deta hai, tab aap uski in maitar auph faikt baton ko samajh lete hai. kintu jab wo apaki duniya se zara vishram lekar apne ekaant mein, apne tanmay kshnon mein, kuch gata hai tab aap use samajhne mein anudar kyon ho jate hain? bhool kyon jate hain ki uski apni bhi vyatha katha hai; wo kora yantr nahin, balki yantran vidagdh ek prani bhi hai. aah, uske sabjektiv sansar ke sukh dukh ko kaun grhan karega? uske ghayal hrday ko kaun sahlayega? mera ne to aakul vyakul hokar kah diya tha—
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