कवि का आत्मजगत्
(एक)
कविता—इस शब्द का नाम मैंने पहले-पहल कदाचित् सन् 18 में सुना था। तब, देहाती मदरसे के तीसरे या चौथे दर्जे में पढ़ता था। बालक था। ऐसा जान पड़ता है कि मनुष्य के मन के भीतर भी कोई एक स्प्रिंग होती है, वह उसे छुटपन से ही घड़ी की सुई की तरह उस अभीष्ट की