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बिहार चुनाव में जातीय गानों की भूमिका

बीते नवंबर बिहार विधानसभा का चुनावी समर अपने शबाब पर रहा। बिहार की राजनीति हमेशा से पूरे देश में चर्चा का विषय रही है। जिसका प्रमुख कारण बिहार का एक बड़ा सूबा होना है क्योंकि केंद्र का रास्ता बहुत कुछ यही से तय होता है। यहाँ का चुनाव जहाँ एक तरफ़ ‘जंगलराज बनाम सुशासन’ के नैरेटिव पर लड़ा जाता है तो दूसरी तरफ़ विचारधाराओं, जातीय वोट बैंक और राजनीतिक विरासत के नाम पर। साथ ही इन्हीं विचारधाराओं, राजनीतिक विरासत, जंगलराज, सुशासन, जातीय वोट बैंक को गानों के माध्यम से चुनावी माहौल में नया रंग दिया जाता है। 

बिहार चुनाव में कलाकार भी समर्थित पार्टियों के लिए अपने गानों के माध्यम से चुनाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह भी देखा-माना गया है कि चुनावी सभाओं-रैलियों में प्रत्याशियों के वादे और कार्यों का ब्योरा, इन गानों से कमतर हो गया है। जातीय और पार्टी समर्थित गाने—गाँव-गाँव, चौक-चौराहों और सोशल मीडिया पर चुनावी माहौल को अलग रूप में बदल दे रहे हैं। ये गाने राजनीतिक और सामाजिक संदेश के सशक्त माध्यम बन चुके हैं। चुनाव दर चुनाव इनकी तासीर, दायरा और असर बढ़ता ही जा रहा है। सवाल उठता है कि ये गाने सिर्फ़ राजनीतिक जातीय अभिव्यक्ति को बल देंगे या सामाजिक विभाजन और जातीय ध्रुवीकरण का भविष्य में एक बड़ा कारण बनेंगे?

बिहार में ही नहीं बल्कि हिंदी पट्टी राज्यों में समाज अपनी जातीय पहचान से गहराई से जुड़ा है। ऐसे में जब कोई गाना किसी जाति या समुदाय को लक्ष्य करके गौरवपूर्ण शब्दों में पेश किया जाता है, तो वह समुदाय उससे भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है। यही जुड़ाव वोट बैंक में भी बदलता है। ये गाने पहले जहाँ लाउड-स्पीकर या प्रत्याशी की जीप पर बजते थे, वहीं बदलते समय में चुनावी प्रचार के तरीक़े और डिजिटल युग में इनका दायरा विस्तृत हुआ है। ऐसे गानों की यूट्यूब, फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, रील, मीम्स और व्हाट्सएप ग्रुप में भरमार है। इन गानों की लोकप्रियता भी अधिक है, यही वजह है कि जातीय गानों ने राजनीति को एक नया आयाम दे दिया है। अब मंच पर भाषण देने से ज़्यादा यह असरदार हो गया है—अपनी जाति, पार्टी का गाना चलवाना। नेता जानते हैं कि चुनावी जनसभा में यदि ‘उनकी जाति का गाना’ बजे, तो भीड़ का उत्साह स्वतः दुगुना हो जाता है।

भोजपुरी गानों और छोटे क्लिप्स के ज़रिए अपने-अपने समाज विशेष के नेताओं को प्रचारित किया जा रहा है। भूमिहार, राजपूत, लाला, यादव, कुशवाहा आदि समुदाय अपने जाति के नेताओं के लिए सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म पर पुरज़ोर तरीक़े से मोर्चा सँभाले हुए हैं। सोशल मीडिया नया जंग का मैदान बनता जा रहा है। स्थानीय गायकों की डिमांड चुनावी मौसम मे अपने आप बढ़ जाती है और समर्थकों के बीच इनकी सप्लाई। कॉन्टेंट क्रिएटर और पार्टी समर्थक ऐसे गानों को बढ़ावा दे रहे हैं। पार्टियों के समर्थक गाने का उपयोग एकता और ताक़त दिखाने के लिए करते हैं। ऐसे गानों की एक बानगी देखिए—

‘फैन अहि हम लालू के , ठेकेदारी करे ला बालू के’

‘एकतरफा ब भोट लालटेन के,’ 

‘लालू बिना चालू ई बिहार न होई’ 

‘लालू जी के मैन फैन आरजेडी के हई’ 

‘रउआ सब के हाथ में बानी के जीती के हारी, सब पे भारी भैया खेसारी’...

ऐसे ही अनगिनत गाने हैं। इन गानों से ताक़त का प्रदर्शन और धुर्वीकरण दोनों होता है। ये गाने आरजेडी नेताओं—तेजस्वी यादव, खेसारी, ओसामा आदि के साथ रैलियों में माहौल बनाते हैं। दूसरी तरफ़ एनडीए समर्थित गाने—

‘जोड़ी मोदी आ नीतीश जी के हिट होई’ 

‘फैन हई हम बीजेपी के’ 

‘नदी नाला सरकार के बाकी सब भूमिहार के’

‘केतना जोर लगाई बाकी साफ न होई भूरा बाल’

जैसे गाने बाहुबली भूमिहार नेताओं के रैलियों में शक्ति प्रदर्शन के लिए हैं।

यह चलन अब सिर्फ़ पार्टी तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि समुदायों में भी पैर पसार रहा है। कुर्मी समुदाय नीतीश कुमार के सुशासन का बखान गाने, मीम्स के ज़रिए कर रहा है। वहीं निषाद समुदाय को वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी के साथ—‘दुश्मन के रूह कापे हमरे नाम से, कर ले मिलन हम निषाद खानदान से’ जैसे गाने के माध्यम से एकजुट करने की कोशिश है। ग़ौर से देखा जाए तो इन गानों के बोल में अब सूक्ष्म राजनीतिक संदेश डाले जाते हैं। कहीं विपक्षी नेता पर तंज, तो कहीं अपनी जाति के नेता का कसीदा। ये गाने अब सुनियोजित प्रचार रणनीति का महत्वपूर्ण  हिस्सा बन चुके हैं। राजनीतिक सलाहकारों की टीमें अब प्रचार योजनाओं में ‘संगीत और जातीय टारगेटिंग’ को भी प्रमुखता से शामिल कर रही हैं।

बिहार का पारंपरिक लोक-संगीत जैसे भोजपुरी लोकगीत, सोहर, कजरी, और जट-जटिन पहले सामाजिक एकता और संस्कृति का प्रतीक हुआ करते थे, लेकिन अब इनकी जगह ‘कास्ट बेस्ड सॉन्ग्स’ और भोजपुरी अश्लील सॉन्ग्स ने ले ली है। यह बदलाव सिर्फ़ संगीत का नहीं, बल्कि समाज के सोचने के तरीक़े का भी प्रतीक है। दरअस्ल जातीय गानों की माँग सबसे ज़्यादा चुनावी मौसम में होती है। जो गाना जातीय अस्मिता से जुड़ा होता है, उसकी रिकॉर्डिंग, व्यू और शेयरिंग कई गुना बढ़ जाती है। अब यह एक अनौपचारिक उद्योग बन चुका है, जिसमें स्थानीय छुट भैया गायक, कॉन्टेंट क्रियेटर, पार्टी समर्थक सब सक्रियता के साथ शामिल रहते हैं। अब तो सभी पार्टियाँ भी टिकट देने में कलाकारों को ज़्यादा तवज्जो दे रही हैं। जिसका सर्वप्रमुख उदाहरण मैथिली ठाकुर और खेसारी हैं। समझ नहीं आता ज़मीनी कार्यकर्ता जो ख़ून, पसीने से पार्टी के लिए काम करते हैं—उनको टिकट देने में दल दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाते? या अब कलाकारों को राजनेता बनाने की होड़ लगी है!

सवाल ये भी है कि क्या ऐसे भड़काऊ गाने पर चुनाव आयोग और प्रशासन पूरी तरह रोक क्यों नहीं लगाता है? चूँकि सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के नाम पर ऐसे गानों को छूट मिल जाती है। कलाकारों को भी सोचना होगा कि लोकप्रियता के लिए जातीय भावनाओं को भड़काने के बजाय, ऐसे गाने बनाने चाहिए जो बिहार की एकता, गौरव, विकास और आकांक्षाओं को उजागर करें।

बारीकी से नज़र डाले तो दिखता है कि बिहार के चुनाव में जातीय गानों की परंपरा अब पूरी तरह स्थापित हो चुकी है। यह गाने जहाँ वोटर्स की जातीय भावनाओं को गहरे छूते हैं, वहीं सामाजिक विभाजन और धु्वीकरण का माध्यम भी बनते हैं। गानों में जातीय रंग, रंगदारी, दूसरी जाति को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति समाज के जातीय ध्रुवीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। कहीं ऐसा न हो ही इन गानों के ओट में बिहार के असली मुद्दे शिक्षा, रोजगार, पलायन रोकना, बाढ़, विकास की एक स्वस्थ राजनीति क्षेपक बन जाएं। अतः समय आ गया है कि बिहार के राजनीतिक दल,युवा और कलाकार इस पर आत्ममंथन करें, क्योंकि अगर गानों में सिर्फ़ जातीय समीकरण और रंगदारी गूँजेगी, तो असली मुद्दे कहीं पीछे छूट जाएँगे। साथ ही बेरोज़गारी, रंगदारी, माफ़िया बनाम मसीहा, जातीय उच्चता इत्यादि का ‘जंगलराज’ स्थापित होने में देर नहीं लगेगी।

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