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चलो भाग चलते हैं

चलो भाग चलते हैं

अतुल तिवारी 17 अगस्त 2023

तो क्या हुआ अगर मैंने ये सोचा था कि तुम चाक पर जब कोई कविता गढ़ोगी, मैं तुम्हारे नाख़ूनों से मिट्टी निकालूँगा।

तो क्या हुआ अगर सघन मुलाक़ातों की उम्मीद में हमने कई मुलाक़ातों को मुल्तवी किया। उन योजनाओं और उन बातों को भी जिस पर हम दोनों सहमत थे―पहाड़ों को नुकीला नहीं गोल होना चाहिए।

तो क्या हुआ अगर मैं तुम्हें जम्हाई लेते हुए नहीं देख पाऊँगा।

ये सच है कि हम हमारे गढ़े हुए तमाम संबोधनों को, दो वर्ण वाले तुकांत शब्दों को; जी नहीं पाएँगे। घर से भाग नहीं पाएँगे। भागने की तमाम वजहें हैं, हम दोनों के पास।

हालाँकि भाग जाने के लिए एक वजह ही काफ़ी है। मैं तुम्हें ये नहीं समझाऊँगा कि बंदिशों और विवशताओं में कितना अंतर होता है।

बंधनों से मुक्ति दिलाने वाले कई मुहावरे हमने एक साथ पढ़े हैं। लेकिन अफ़सोस कि हादसों के लिए मुहावरे नहीं गढ़े गए! उनकी तो चेतावनियाँ होती हैं, जो किसी भगदड़ से उपजी पुकार की तरह शरीर के हर कोने में बजती हैं। बावजूद इसके मैं इस तथ्य (सत्य नहीं) को बार-बार समझा चुका हूँ। मजबूरियों को उँगलियों पर गिना चुका हूँ। और समझ जाने का वास्तविक अभिनय तुम्हारी ओर से बार-बार हो चुका है।

बावजूद इन सब बातों के मुझे मालूम है कि भारी साँसों के सहारे स्वीकारे गए इस यथार्थ की परिकल्पना क्या होगी!

मुझे मालूम है कि अभिनय कितना भी वास्तविक क्यों न हो, थोड़ी-सी त्रुटि ज़रूर छोड़ जाता है।

मुझे मालूम है कि कैलेंडर का पन्ना पलटते हुए हमारे रिश्ते की बची हुई मोहलत तुम्हारे सीने में भी धड़कती होगी।

चलो भाग चलते हैं―ये बात कभी भी बग़ैर शराब के नहीं कही गई।

चलो भाग चलते हैं―कई बार ये बात उदास मौसम में गुलाबी रंग घोलने के लिए कही गई।

चलो भाग चलते हैं―कई-कई बार इस वाक्य ने मरहम का काम किया।

चलो भाग चलते हैं―हर बार ये कहते और सुनते हुए मैंने अपने जूते खोजे―खिलाड़ियों वाले।

चलो भाग चलते हैं―कह देना अच्छा है, क्योंकि ऐसा कहने के बाद एक उम्मीद रिसती है। बुर्जियों में भरम बना रहता है। भरम बना रहता है कि हम अभागे नहीं है। ऐसा कह देने से सपनों को धूप मिलती है। भविष्य के यथार्थ अनिश्चित हो जाते हैं―ऐसा कह देने से।

भाग जाने के बाद की दुनिया ख़ूबसूरत होगी। अर्थ के पास होंगे हम दोनों। मैं रोज़ तुम्हें जम्हाई लेते हुए देख पाऊँगा। रतजगी आँखों से तुम भी तो देखोगी मुझे। लेकिन सारी दुनिया से भाग कर घर जाने वाले, घर से कैसे भाग सकते हैं! कैसे लाँघ सकते हैं अपनी भाग्य-रेखा। किस तरह अलग हो सकते हैं उस मकान से जो उनके कंधों पर खड़ा है।

नहीं मैं जोख़िमों से नहीं डरता, दुर्घटनाओं से डरता हूँ।

मुझे मालूम है कि तुम भी दुर्ग की दीवारों से नहीं डरती। उन पर उकेरी गई कलाकृतियों से डरती हो।

इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि इस सुंदर अनर्थ की पूर्वपीठिका को मैं लिखना नहीं चाहता।

अनेक बार ऐसे दुर्ग भेदे गए हैं। अनेक बार दुर्घटनाओं ने अपना मन बदला है। हादसों वाले पुलों पर प्रेम-कहानियाँ लिखी गई हैं। अनेक बार आलोकधन्वा की कविता सच साबित हुई है।

मैं जानता हूँ, सत्य एक दिन अपनी सार्वभौमिकता को त्याग कर मुझे झुठलाएगा। मैं जानता हूँ किसी रात मेरे पैरों को ईंधन मिलेगा और तब मैं ये कहूँगा : ‛सिर्फ़ आज की रात रुक जाओ...’

तुम यक़ीन करना और भाग आना मेरे पास―खिलाड़ियों वाले जूते पहने बिना ही।

आलोकधन्वा की कविता ‘भागी हुई लड़कियाँ’ पढ़ने के बाद।

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