शंखनाद : सोच-समझवाले को थोड़ी नादानी दे मौला...
शंखधर दुबे
30 जून 2026
मेरे पास एक ही धन है—निकम्मापन। मैं बाय चॉइस निकम्मा नहीं हूँ। यह आलस्य और काहिली के संयुक्त उद्यम से उपजा है। ऐसा नहीं है कि मैं डेड वुड हूँ जो किसी काम के लिए प्रेरित नहीं होता; प्रेरित होता हूँ—जब कोई थोड़ी-सी शाबाशी देता है, पीठ ठोंकता है, वाह-वाही करता है। ऐसा होने पर मैं पेड़ पर चढ़ तो जाऊँगा, लेकिन यह और बात है कि उतर भी लगभग भरभराते हुए और तुरत आऊँगा।
लेटे रहना छोड़कर, विधाता ने मेरी रुचि का कोई काम बनाया ही नहीं। मैं सालों तक पंखे पर लगी गंदगी को घूमते हुए, दीवार पर छिपकली को गश्त लगाते हुए या मकड़ी को जाला बुनते हुए—देख सकता हूँ। कभी-कभार निराशा होती है कि दुनिया में कितने काम थे, जो किए जाने चाहिए थे—जैसे, दुनिया बचानी थी, मानवता को राह दिखानी थी। प्रभु एकाध में मेरी भी रुचि दे देता, लेकिन कहते हैं भगवान वही देता है जो आप डिजर्व करते हैं। सो हरि इच्छा मानकर, मैं इसे स्वीकार करता हूँ और अपने सर माथे लगता हूँ। अगर भगवान ही यह चाहते हैं कि मैं काहिली का हाथ थामें करवट बदलता हुआ पृथ्वी का घूर्णन देखता रहूँ तो यही सही। मैं कौन होता हूँ जो विधाता की स्कीम में दख़ल दे सकूँ।
वैसे ऐसा भी नहीं है कि मैं सिर्फ़ लेटा रहता हूँ। लेटे हुए भी ख़ासा सक्रिय रहता हूँ। मैं लेटे-लेटे बिना लिखे ही बेस्टसेलर लेखक और ऑस्कर दिलाऊँ फ़िल्मकार होना चाहता हूँ। मैं उपलब्धियों की निस्सारता के दार्शनिक पक्ष में अपने ही भीतर माहौल बनाता हूँ। ये तख़्तों और ताजों की दुनिया, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है? बिस्तर तो छूट जाएगा—यह ख़याल ही मुझे विचलित करता है।
मैं बिना किसी अपराधबोध के, साल दर साल लेटे-लेटे काट सकता हूँ, बल्कि काट ही लेता हूँ। मुझे नए साल या किसी भी नई चीज़ को लेकर कोई उत्साह-संकल्प भीतर से ही नहीं उमगता। नया साल हो या पुराना हमें क्या करना! मेरे लिए सब दिन बराबर हैं, इस मामले में मैं समाजवादी हूँ। नया साल, त्यौहार, उत्सव यह सब चोंचलेबाज़ी है। यह पूरी दुनिया की मुझे बिस्तर से उतारने की साज़िश लगती है। मैं कहीं नहीं जाना चाहता।
दुनिया सुंदर है, होगी ही। बिस्तर सबसे सुंदर है। मै यहीं अपने मन ही स्क्रीन पर नई-नई दुनिया बनाता-मिटाता रहता हूँ और ये होता तो क्या होता के दार्शनिक प्रश्न में कभी-कभार लग जाता हूँ। मेरे पुरुषार्थ का एक ही पक्ष है कि कभी-कभी लिखने का सुख उठाता हूँ। वह भी सिर्फ़ अपने सुख के लिए ही। उसमें भी आलस्य का आलम यह है कि मैं अपना लिखा दुबारा नहीं पढ़ता। जो ग़लत है—है! हमें कौन-सा कुछ मिल रहा है। मैं अपने पाठकों की समझ और कल्पना पर भरोसा करता हूँ। हमारा रिश्ता परस्पर समझदारी के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम पर टिका हुआ है। मेरे पाठक आँख बंद करके मेरा भरोसा करते हैं कि मेरा लिखा आलेख है तो वह निःसंदेह, आधे-अधूरे मन से और तमाम वर्तनीगत अशुद्धियों और कारक-परसर्ग की ग़लतियों से भरा होगा। कमज़ोर गिज़ा का संपादक हुआ तो मेरा लिखा देखकर अधिकतम आत्महत्या और न्यूनतम त्यागपत्र देने पर विचार कर सकता है।
लेकिन जैसा ऊपर संकेत किया गया है—मैं साधारण मनुष्य हूँ और कई बार बहकावे में आ जाता हूँ। इस बार मैं फ़र्ज़ी दोस्तों की चाल में फँस गया। असली दोस्त आपको कभी सही रास्ता नहीं दिखाता, वह सत्कर्मों की जगह धत्कर्मों की तरफ़ प्रेरित करता है—“क्या करेगा यह सब करके, क्या ही होगा इससे…” आदि वचनों से हतोत्साहित करता है। अब क्योंकि यह फ़र्ज़ी मित्र थे और थोड़ा हम भी ग़ाफ़िल पड़ गए। सो दिसंबर के अंतिम सप्ताह की छुट्टियों में एक किताब पर काम करने की ग़रज़ से एक पुरुषार्थी मित्र के साथ दूसरे पुरुषार्थी मित्र के यहाँ देहरादून चला गया। सैद्धांतिक एक्टिविज़्म पर वैसे भी मुझे कोई आपत्ति नहीं होती। पहले मित्र की किताब आने वाली है, सो वह चक्रवर्ती सम्राट से महसूस कर रहे थे। जिस तरह जीवन के साथ मृत्यु अपरिहार्य है, वैसे ही लिखने के साथ किताब अपरिहार्य हो चली है। किताब लेखक का विजिटिंग कार्ड है। “अच्छा-अच्छा आपने फ़लाँ किताब लिखी है”, “वाह, बहुत सुंदर है!” किताबों की ख़ूब तारीफ़ होती है, चारों तरफ़ किताब-किताब-किताब... यह और बात है कि इतने कठिन दौर में भी कुछ लोग किताबों को अभी भी पढ़ लेते हैं।
अपने स्वभाव के सर्वथा अनुकूल ही मेरा जोश दिल्ली से देहरादून के आधे रास्ते में काफ़ी पहले दम तोड़ चुका था। मैं डेड बॉडी को दफ़नाने के लिए बिस्तर तलाश रहा था। वहाँ पहुँचने पर जब मुझे एक कमरे के एकांत में बंद करने की बात होने लगी तो मुझे समझ में आया कि वे लोग मुझसे मेरी ही किताब पर काम करवाना चाहते हैं। जो ख़ासा अरुचिकर और टाइम खाऊँ काम है। यह बात समझ में आते ही मेरे हाथ-पाँव काँपने लगे। मुझे घर के बिस्तर का आर्त पुकार सुनाई पड़ रहा था—‘मालिक उठे हो कि उठ ही गए’। अब जैसा कि लेखकों, ऊपर से हिंदी लेखकों के साथ होता है—मुझसे भी अपना ही दुख देखा नहीं जा रहा था। सो मैंने ख़ुद को मित्र की स्टडी के टेबल चेयर से बर्ख़ास्त किया और बिस्तर पर आसन जमाया और रजाई ओढ़कर ध्यान में चला गया।
इधर लेखन को लेकर गंभीर हुआ हूँ इसलिए लेखन से पहले मानसिक नोट्स लेने लगा हूँ। इसके दो फ़ायदे हुए हैं : पहला यह कि कुछ लिखना नहीं पड़ता और दूसरा यह कि बिना लिखे भी मज़ा पूरा आता है। इन सबसे बढ़कर समय काफ़ी रचनात्मक रूप से बर्बाद होता है। मानसिक नोट्स के क्रम में हर पल बदल और बढ़ रहे किरदारों, परिस्थितियों, आप्त वाक्यों और महाकाव्यात्मक अभिव्यक्तियों के समक्ष मैं ख़ुद को निरीह, हास्यास्पद और भौंडा पा रहा था। सोचता हूँ लिखने का प्रयास ही इस गहन अनुभूति को नष्ट कर देगा। ऐसे में मेरी काहिली आकर मेरा हाथ थमाती है—‘मालिक, बिल्कुल सही। अब लैपटॉप का शटर डाउन करो और लेट जाओ’। मैं लेट जाता हूँ। यह काम असंभव है और ख़ुद असंभव काम में लगना ही क्यों कर!
अब मैं एक्टिविस्ट होना चाहता हूँ। मित्र के घर में ऐसी भूमिका तलाशता हूँ जिससे लिखने जैसे उबाऊ काम से बचा जा सके। अगर आप कोई काम शिद्दत से नहीं करना चाहते तो भी क़ायनात आपकी मदद करती है। क़ायनात मित्र की नन्हीं नटखट बिटिया दूर्वा के रूप में हमारे साथ आई है। उसके स्कूल की छुटियाँ थीं, सो वह भी रात एक-एक बजे तक, “अंकल मेरे साथ खेलो” का जाप करती है। उसके साथ खेलकर मैं दोस्तों की साजिश से बच जाता हूँ। इस सब से जो थोड़ा-बहुत समय बचा, उसमें मैंने रुचिता भाभी से रचना प्रक्रिया पर बात की और बताया कि किस प्रकार रचना प्रक्रिया, रचना को ही लगातार बेदख़ल करती चल रही है।
इसी क्रम में एक शाम जब मैं और रुचिता भाभी, अलाव में आलू-भंटा और मटर भूनने का चक्कर चला रहे थे तो होस्ट मित्र ने मेरा मज़ाक़ बनाते हुए दूसरे मित्र से कहा, “देखो, तुम इसे लिखने के लिए लाए हो और यह आलू-भंटा भूनने में लगा है।”
उन्हें लगा मैं इस बात पर चिड़चिड़ाऊँगा, लेकिन मैं नहीं चिड़चिड़ाता। चिड़चिड़ाहट आलसी व्यक्ति की दुश्मन है। दूसरे, मुझे किसी को ग़लत साबित करने का कोई शौक़ नहीं। अब ऐसे मित्रों को कौन बताए और समझाए कि जिन्हें काम पूरा करने का जुनून सवार रहता है, वे ऑलवेज एट वर्क मोड में रहते हैं—चुस्त-दुरुस्त, चाक-चौबंद, रिजल्टोंन्मुखी।
इधर अपुन सोचता है कि हम यहाँ आलू-भंटा ही भूनने आए हैं। हमारा सुख आलू-भंटा भूनना ही है, सो भी आधा-अधूरा ही। दुनिया क्या जाने कि हम आधे-अधूरे मन से की गई, बीच में से काफ़ी पहले ही छोड़ दी गई और कुछ तो शुरू करने से पहले ही छोड़ दी गई—परियोजनाओं के खंडहर पर गमछा बिछाए सो रहा हैं। बग़ल में महानता के राजमार्ग पर ट्रैफ़िक जाम लगा हुआ है। इच्छा होती है कि देखूँ इतना शोर क्यों है? कौन बेसबरा हॉर्न बजा रहा है। फिर सोचता हूँ कि कौन ही आँख खोले... अपने सुख को दाँव पर लगाकर क्योंकर ही महानता अर्जित करना, जाओ बाबा आगे बढ़ो। हम मुँह पर रुमाल धरे सो रहे हैं।
यह सब आलस्य का भौतिक पक्ष हुआ। आलस्य का आध्यात्मिक पक्ष भी है। पहली बात तो यह है कि कुछ साबित करने पर पिले रहने के दौर में बिना कुछ किए रह पाना बड़ा पुरुषार्थ है, बड़ी आध्यात्मिक ऊर्जा लगती है इसमें। दूसरे आलसी आदमी दूसरों का नुक़सान नहीं करता। लेटे-लेटे अपना ही नुक़सान करता है। यह बिना किसी प्रत्याशा के आत्मध्वंस की साधना है। काहिल आदमी बम नहीं बनाता। बल्कि प्रमाद में भाग नहीं पाता और मारा जाता है। वह दंगा-फ़साद नहीं करता। वह बिना मतलब, यहाँ तक कि मतलब से भी इधर-उधर नहीं भटकता। बहस-मुसाहिबे से बचता है। कुल मिलाकर आलस्य धिक्कार का नहीं धन्यवाद का पात्र है। इसलिए, आप हमारा धन्यवाद कीजिए।
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