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शनिवारेर चिट्ठी : इलाहाबाद मेरा दिल तोड़ देगा

दर्शन

क्या हम किसी ऐसे शहर के प्रेम में हो सकते हैं जहाँ कभी गए नहीं? 

शहर—जिसे देखा नहीं। जिसकी गलियों को तैरकर पार न हुए। धूल जूतों पर चढ़ी नहीं। जिसकी किसी दीवार से पीठ टिकाकर चुप बैठे नहीं या हँसे नहीं ठठाकर। बाँहों में भरा नहीं कभी जिस शहर को। उसकी उत्तप्त साँसें गर्दन के लोम पर महसूस नहीं कीं। उसकी रात को अपनी नींद में नहीं रखा। उसकी रोशनी को उतारा नहीं हथेली पर। फिर वह शहर अपना लगता है किस तरह? इस तरह कि शहर ईंट, पत्थर, नदी और रास्तों से ही नहीं बनता? उसके भीतर मनुष्यों की ऊष्मा भी रहती है। किसी जगह को छुए बिना भी उसकी देह तक पहुँचा जा सकता है। जैसे बंद खिड़की के बाहर खिले शिउली की गंध अंदर आ जाती है। फूल दिखाई नहीं देता, फिर भी उसकी उपस्थिति कमरे के मन को बदल देती है। 

उस शहर को सोचो तो भीतर एक धीमा आलोक उतरता है। वह स्मृति का आलोक तो नहीं है। स्मृति का अपना एक पूर्वलोक होता है। मेरे पास इस शहर का कोई चेहरा नहीं, कोई दृश्य भी नहीं। फिर यह कैसा सामीप्य है? स्पर्श नहीं, फिर भी कोई स्पंदन। आलिंगन नहीं, फिर भी देह में ठहरती कोई गरमाहट। 

क्या हम किसी ऐसे शहर के प्रेम में हो सकते हैं जहाँ कभी गए नहीं, फिर भी न जाने कितनी बार वहाँ से होकर लौटे? ऐसा शहर जो बाहर से अधिक हमारे भीतर बसता गया हो—धीरे-धीरे।

संलाप

इलाहाबाद ऐसा ही एक शहर है। 

इलाहाबाद ने मुझे प्रेम दिया और प्रशंसा दी। इलाहाबाद से मुझे भरोसा मिला। भरोसा हमारे भीतर बहुत कुछ बदल देता है। भरोसा बाहर से मिला हुआ साहस है, जो धीरे-धीरे भीतर का स्वभाव बन जाता है। भरोसा मिलने के बाद आदमी दुनिया से अधिक अपने अंतर को अलग तरह से सुनने लगता है। इलाहाबाद के उन विश्वविद्यालयी छात्र-छात्राओं-युवाओं ने मेरे कवि को वह सुख दिया कि यह शहर उसके लिए हमेशा ज़िंदाबाद बना रहा। आन्वी, आरव, अदिति, कबीर, अमायरा, अनन्या, विहान, अवनि, इरा, काव्या, रेयांश, लावण्या, मृणालिनी, अर्णव, नायरा, राघव, रागिनी, सिद्धार्थ, सान्वी, तारा, विवान, वाणी, नील, यामिनी, देव, समर, युवराज, नमन, ईशान, प्रणव, कुणाल—ऐसे रहे थे उनके नाम (कैसी विवशता में मैंने गढ़े हैं इतने नक़ली नाम!)। उनमें से कईयों से मैं मिला तो दिल्ली में, इलाहाबाद कभी नहीं गया। लेकिन अब इलाहाबाद कोई दूर की जगह नहीं था। वह उन आवाज़ों का सिलसिला था, जिनमें मैंने अपने कवि को दूसरी तरफ़ से लौटकर सुना। यह सुनना तब तक रहा जब तक मैंने अपने कानों पर हाथ नहीं रख लिए।

मैत्री

यह बात मैंने सार्वजनिक नहीं की कभी, लेकिन इलाहाबाद मेरी पहचान का हिस्सा भी रहा है। दिल्ली आने के शुरुआती दिनों में मैं अपने साथ बिहार लेकर आया था और जल्दी ही समझ गया था कि यहाँ ‘बिहारी’ होना केवल भौगोलिक परिचय नहीं है। उसके साथ एक तैयार धारणा भी चिपकी हुई थी। जिस जगह का मैं था, उस जगह का होना एक थोपी गई शर्मिंदगी का बाइस था। मेरे लहजे और पूरबी उच्चारण को दूसरी तरह ढक तो नहीं सकता था तो यह उपाय सूझा कि इलाहाबादी हो जाने में राह है। इस तरह इलाहाबाद मेरा निजी भाषाई ओट था। हम—मैं को हम बोलने वाले लोग, मैं बोलने वाले लोगों के बीच इस तरह पनाह पाते थे। उन दिनों मुझे इससे एक अजीब सुविधा मिली। बिहार पीछे छूट नहीं गया था। वह मेरे भीतर जस-का-तस था। लेकिन सामने रखने के लिए अब मेरे पास इलाहाबाद था। मेरा पूरा राज्य दिल्ली में मुझे जिस शर्मिंदगी से बचाने में बे-असर था, अकेला इलाहाबाद वहाँ काम आ जाता था। एक तो इलाहाबाद की देसी ऐंठ में अपना चौड़ा-पन है, दूसरा वह ऐतिहासिक-सांस्कृतिक शहर है। इलाहाबाद का नाम लेते ही बातचीत का तापमान बदल जाता था। सम्मुख के हर व्यक्ति के पास उस शहर की एक छवि थी—विश्वविद्यालय, कोर्ट, साहित्य, राजनीति, सिविल लाइंस, संगम, पुराने लोग… अब बातचीत में एक अतिरिक्त जगह खुल जाती थी।    

सोचो मंज, मैं इसी देस की एक जगह का आदमी था जिसे दूसरी जगह अपनी जगह पाने के लिए एक तीसरी जगह का नाम उधार लेना पड़ा!

प्रस्ताव

इलाहाबाद मेरे घर-शहर और दूर-दिल्ली-महानगर के बीच एक सरहद की तरह भी रहा। घर से निकलता तो इलाहाबाद के गुज़रते यह ख़याल भीतर उठता कि अब अपनी चौहद्दी पीछे छूट गई। अपनी-सी बोली, आदतें, पहचान सब पीछे रह जाती थीं और आगे उस शुष्क महानगर की अपरिचिता सामने आ जाती थी। इलाहाबाद उस रुख़सती का मक़ाम था। दिल्ली से लौटते हुए वही इलाहाबाद अपना सलीक़ा बदल लिया करता। ट्रेन वहाँ से गुज़रती और मन में कैसी रौनक़ उतर आती। घर अभी सामने नहीं था, लेकिन उसकी ख़ुशबू जैसे पहले ही पहुँच जाती थी। कुछ दूर और। कुछ देर और... आगे कुछ दिन बेफ़िक्री से अपनी भाषा, अपने रवैयों में टहला जा सकता था।

मिलन

मैं इलाहाबाद जा रहा हूँ। 

इस वाक्य के कहने में उतना अधिक नहीं है, जितना अधिक इस वाक्य के घटित होने में है। मैं एक ऐसे शहर जाने की बात कर रहा हूँ, जिसे जानता हूँ और जानता नहीं हूँ। यह विरोधाभास मुझे अच्छा लगता है। जीवन में कुछ चीज़ें इसी तरह अपनी बन जाती हैं—घटित में अघटित और अघटित में घटित। मैं इलाहाबाद जाऊँगा तो वहाँ अपने लिए कुछ नहीं ढूँढूँगा। ढूँढ़ने वाला आदमी पहले ही तय कर चुका होता है कि उसे क्या मिलना चाहिए। मैं उस शहर को उसके विस्मय में देखना चाहता हूँ और कुछ मेरे अपने विस्मय में। मैं उसे नहीं देखना चाहूँगा मेरी अपनी चाहनाओं में। मैं उस शहर के जीवन में अनावश्यक बना रहूँगा। शायद तभी मैं पहली बार उसके निकट हो सकूँगा।

मेरा इलाहाबाद मेरे अंदर बसा मेरा अपना निजी शहर है, ऐसा मुझे लगता है। यह उन लोगों का शहर है जो मेरे प्रति करुण रहे थे। वह मेरे अंदर बसा रहा है उन लोगों की बची हुई स्मृति से। वह बसा रहा है बहुत कुछ उस ख़ाली जगह से, जहाँ अनुभव कम था और मैंने अपनी कल्पनाओं के सामान रख दिए। किसी शहर को पहली बार देखना केवल उसे देखना नहीं है। यह अपने भीतर उसके लिए बनाई हुई जगह को भी देखना है। पता चलता है कि हमने वहाँ शहर कम और अपने मन की ज़रूरत अधिक रखी है। फिर भी मैं इलाहाबाद जा रहा हूँ। 

विच्छेद

...और मुझे भय है कि इलाहाबाद मेरा दिल तोड़ देगा।

यह भय उस शहर के बदल जाने का नहीं है। शहरों के पास हमारे लिए वैसा ही बने रहने की कोई बाध्यता नहीं होती जैसा हमने उन्हें अपने भीतर रखा है। भय यह है कि मैं स्वयं अपने बनाए हुए भ्रम के सामने खड़ा हो जाऊँगा और उसे पहचान लूँगा। मन की कुछ इमारतें बहुत सावधानी से बनती हैं। उनमें दरवाज़े होते हैं, कमरे होते हैं, रोशनी होती है। केवल उनकी ज़मीन नहीं होती। मेरा इलाहाबाद मेरे लिए ऐसी ही एक इमारत है। मैंने उसमें लोगों को रखा है। आवाज़ें रखी हैं। अपने कवि की कुछ ख़ुशियाँ रखी हैं। अपने पुराने संकोच रखे हैं। वहाँ अपने जीवन के वे हिस्से भी रख दिए हैं, जिनके लिए कोई वास्तविक जगह नहीं थी। इसलिए वहाँ जाकर मुझे शहर से अधिक अपने ही मन से मिलना होगा। और अपने मन से मिलना हर बार इतना सुखद तो नहीं होता! कहीं ऐसा न हो कि मैं बस एक दिन के लिए इस शहर में हूँ और इस शहर ने उद्घाटित कर दिया कि इतने वर्षों तक जिस शहर को मैं याद करता रहा, वह कभी बाहर था ही नहीं। वह मेरी अपनी ज़रूरत पर बसा एक ख़याल भर था। तब मैं किसे दोष दूँगा? शहर को या स्वयं को? उन लोगों को जिन्होंने मेरे लिए यह शहर बसाया? दिल टूटने की सबसे निर्मम अवस्था यही होती है—जब सामने कोई दोषी नहीं होता। मुझे भय होता है कि वहाँ मुझे अपने प्रेम की सीमा न दिख पड़े। प्रेम की सीमा से अधिक भयावह उसकी सीमा का पता चलना है। जब तक कोई चीज़ दूर है, हम उसके साथ अनंत व्यवहार कर सकते हैं। निकटता उसे एक निकट-मनुष्य की तरह बना देती है—सीमित, असंगत, कभी-कभी नीरस। और तब संभव है कि लौटते हुए मेरे पास इलाहाबाद तो हो, पर वह इलाहाबाद न हो जिसे मैं इतने वर्षों से अपने भीतर लेकर चलता रहा हूँ।

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