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सब एक-दूसरे को कॉकरोच समझ रहे थे!

इंट्री 

मुझे किसी ने कहा था कि शाम पाँच बजे के बाद पुलिस अंदर नहीं जाने देगी। मैं हड़बड़ाया हुआ जब जंतर-मंतर पहुँचा तो पाँच बजने में कुछ मिनट बचे थे। एक गेट एक बैरिकेडिंग, एक मेटल डिटेक्टर, तीन तरह के वर्दीवालों और एक तरह की वर्दीवालियों को पार करके देखा चटीकर धूप में मंच लगा है। सीजेपी, आइसा और एसएफ़आई के लोग डटे हुए थे। नारे लग रहे थे, इस्तीफ़ा माँगा जा रहा था, पानी बाँटा जा रहा था, मैलोडी की चर्चा थी और च्युइंगम चबाई जा रही थी। 

प्रेस्टियानी रूल

मंच पर सीजेपी-प्रवक्ता सौरभ दास अपना मुँह हाथ से ढक कर अभिजीत दीपके के कान में कुछ कह रहा था। बात करने के इस तरीक़े से आपके लिप-रीड करके आपकी बात समझने की संभावना से बचा जाता है। सौरभ शायद शोर की वजह से ऐसा कर रहा होगा, लेकिन मैंने ऐसे वीडियोज़ में जहाँ इतना शोर नहीं था वहाँ भी उसे इसी तरह बात करते देखा है, शायद उसकी आदत होगी। फ़ुटबॉल के मैदान पर इस तरह बात करने पर नए ‘प्रेस्टियानी रूल’ के तहत खिलाड़ी को दंडित किया जाता है। अभी 19 जून को पराग्वे के एक खिलाड़ी को इसके लिए रेड कार्ड दिया गया। मुझे लगा शायद सौरभ भी फ़ुटबॉल-फ़ैन है और उसका फ़ीफ़ा वर्ल्ड हाइलाइट्स के भरोसे चल रहा है। 

कॉकरोच

मुझे यों महसूस हुआ कि सब एक-दूसरे को कॉकरोच समझ रहे हैं। इस शब्द को पहचान के रूप में आत्मसात् करना ख़ुद में एक क्रांति ही है। इससे पहले जामिया के लड़के प्रोटेस्ट में संविधान वग़ैरा बनते रहे हैं; लेकिन कॉकरोच—यह कुछ बनने और बन पाने और न बन पाने पर कुछ भी बनने को प्रस्तुत रहने वाले समाज में बनने के चयन पर शानदार मॉकरी है। यह बेरोज़गार को मिली नई पहचान है, नया रूपक है। छोटे-छोटे कमरों में रहकर तैयारी करते युवाओं का जीवन इस मेटाफ़र के साथ ठीक ही बैठता है।

नए-पुराने पुलिसवाले

आंदोलन में पुलिसवाले आपको अलग नज़र आते हैं—चेहरे पर कोई भाव नहीं, सरापा मुस्तैदी और जिज्ञासा। वे आंदोलन के जोश के साथ बहते नहीं, चुटकुलों पर हँसते नहीं, ललकारे जाने पर शांत बने रहते हैं, हड़काए जाने पर निर्लिप्त और संबोधित किए जाने पर बहरे। नए पुलिसवाले कई बार शरीर का पूरा बोझ एक टाँग पर डालकर एक तरफ़ झुक कर खड़े हो जाते हैं, थक जाने पर दूसरी टाँग की तरफ़ झुक जाते हैं और थोड़ी देर में जब दोनों टाँगें थक जाती हैं, तब वे बैरिकेडिंग पर हाथ टिका कर झुक जाते हैं... थोड़ी देर में हाथ भी थक जाते हैं। वहीं पुराने पुलिसवाले अपनी ट्रेंनिग के सबक़ को कई बार व्यावहारिक धरातल पर आज़मा चुके हैं और जानते हैं कि बिना थके देर तक खड़े रहने के लिए शरीर का भार दोनों टाँगों पर बराबर बाँटकर खड़े होने से ज़्यादा मुफ़ीद तरीक़ा दूसरा नहीं। 

 ‘गो कोरोना गो’

मंच के सामने की तरफ़ नीचे बहुत से समर्थक थाली-चमचा या ऐसी ही अन्य बजाई जा सकने योग्य चीज़ों के साथ दरी पर जमे हुए हैं। वालंटियर्स पानी-शरबत इत्यादि सभी को बाँट रहे हैं। कोविड के बाद देश में थाली बजाने का यह दूसरा बड़ा अभियान है। ‘गो कोरोना गो’ से ‘गो प्रधान गो’ तक की एक स्वादिष्ट यात्रा है। हालाँकि सब जानते हैं कि थाली बजाने से कोरोना नहीं जाता...

वॉक ऑफ़ शेम 

कुछ शोर सुनाई दिया जाकर देखा तो एक महिला पत्रकार, इसे मैंने एंट्री लेते समय देखा था और विदेशी पत्रकार समझा था। अब ध्यान से देखा तो उसके माइक पर देवनागरी और रोमन का एक-एक अक्षर बना है, इस पत्रकार के आस-पास लोगों का हुजूम है और वह किसी आंदोलनकारी से बहस कर रही है। आंदोलनकारी चिल्ला रहा, “गोदी मीडिया है ये तो, गोदी मीडिया, दलाल मीडिया!”

आंदोलनकारियों ने पुलिस से कहा, “आंदोलन के बारे में सवाल नहीं कर रही, इधर-उधर के सवाल कर रही है।” 

भीड़ नारे लगा रही, “गोदी मीडिया गो बैक, दलाल मीडिया गो बैक!” पुलिस ने समझदारी से उस महिला को वहाँ से चले जाने को कहा और ख़ुद उसे लेकर एक्ज़िट गेट की तरफ़ बढ़ी। वह जा रही थी उसके आस-पास आंदोलनकारियों का अनुशासित हुजूम था, जो नारे लगा रहे थे, थाली पीट रहे थे। भीड़ के बीच से ज़लील होकर जाती महिला, नारे और थाली पीटने की आवाज़ से मुझे ‘गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ की सर्सी लैनिस्टर की ‘वॉक ऑफ़ शेम’ याद आ गई, फ़र्क सिर्फ़ इतना था की सर्सी प्रतिशोध से जल रही थी और यह पत्रकार बेशर्मी से हँस रही थी। 

यह प्रोटेस्ट अवैध है 

अचानक लाउडस्पीकर पर पुलिस कंट्रोल-रूम से अनाउंस किया गया :

“इस प्रोटेस्ट की अनुमति पाँच बजे तक थी। अब यह प्रोटेस्ट अवैध है। आप लोग इसे ख़त्म करिए!” 

वहाँ मौजूद किसी पर भी इसका कोई असर नहीं हुआ। आइसा की नेहा नारे लगवा रही थी। आंदोलनों के व्याकरण में नारे लगवाना एक बहुत ज़रूरी कौशल है और नेहा इसमें बहुत कुशल है, मुट्ठी तानकर हवा में उछालती हुई वह आसमान को चुनौती देती लगती है और नारों के प्रतिउत्तर को सिर हिलाकर सराहते हुए एक छोटे बच्चे की तरह अपने बोलने का इंतिज़ार करती है। आइसा-एसएफ़आई-केवाईएस ने इस पूरे प्रोटेस्ट को बिखरने से बचा लिया। गति और स्थिरता दी। यह कहना ही पडे़गा—प्रोटेस्ट किसी का भी हो बैंड आइसा का ही होता है।

दिल्ली पुलिस वी लव यू

मंच पर अभिजीत दीपके बोल रहा है और पुलिस से लाउडस्पीकर चालू करने को कह रहा है फिर नारे चालू हो जाते हैं, “हमारा माइक चालू करो, चालू करो, चालू करो...”

थोड़ी देर में माइक चालू हो जाता है और नारे बदल जाते हैं, “दिल्ली पुलिस वी लव यू, वी लव यू, वी लव यू...”

मैं जब वापस जा रहा था तो एक आदमी जो शायद पुलिस कंट्रोल-रूम की तरफ़ से आ रहा था, किसी से फ़ोन पर माफ़ी माँगने के अंदाज़ में बात करते हुए कह रहा था, “अरे सर किसी ने माइक बंद नहीं किया था, पता नहीं ये लोग क्यों...” 

पत्रकार

पारंपरिक पत्रकारों की स्थिति ऊपर बता चुका हूँ। इनके प्रति ग़ुस्सा बहुत तेज़ है, फिर भी मैंने एक चैनल के पत्रकार को बाक़ायदा ट्राइपॉड लगाए दो-तीन लोगों की टीम के साथ चिरकुटई करते देखा। यहाँ सोशल मीडिया के पत्रकारों का जमावड़ा था। बहुत से ऐसे पत्रकारों को देखा जिनके नाम मुझे याद नहीं, लेकिन एक पत्रकार का कुर्ता मुझे याद था और मैंने उसे उसके कुर्ते से पहचाना।

यह प्रोटेस्ट नागरिक पत्रकारिता का एक शानदार नमूना है। हर कोई अपने संसाधनों के साथ पत्रकारिता कर रहा है। एक दोस्त ऑफिस से छुट्टी वाले दिन भी पूरी रात प्रोटेस्ट में रुकी और हर आधे-पौने घंटे पर सोशल मीडिया पर अपडेट देती रही। ऐसे बहुत से क्रिएटर हैं, जिन्हें यह आंदोलन ‘मिलियन फ़ॉलोअर अकाउंट’ बनाएगा। 

दूसरी बार

मैं इस प्रोटेस्ट में दूसरी बार रात आठ बजे के बाद पहुँचा। जिस पत्रकार को पिछली बार मैंने ट्राइपॉड लगाए चिरकुटई करते देखा था; पिछली शाम को आंदोलनकारियों की उससे बहस हुई, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर भी आया। गोदी मीडिया के पत्रकारों के प्रति ग़ुस्सा और बढ़ गया है, मेरे देखते-देखते दो और ‘वॉक ऑफ़ शेम’ हो गईं। अब नारे थोड़े ज़्यादा कटु हो चुके हैं और ‘गोदी मीडिया’ के साथ-साथ एक ‘सुअर मीडिया’ गो बैक भी सुनाई दे रहा है। मैंने अपने पास में खड़े व्यक्ति से पूछा सुबह से कित्ते लोग मिले ऐसे? तो बोला, “बहुत सुअर आ रहे हैं यहाँ, गिनती नहीं!” कुछ आंदोलनकारी इन लोगों को लगातार शांत करने की कोशिश भी कर रहे हैं। 

यों लगता है कि अब यहाँ पत्रकारिता नहीं, सिर्फ़ समर्थन हो सकता है—एक भी क्रॉस क्वेश्चन पर आपको गोदी-मीडिया, सुअर-मीडिया बोल के बाहर किया जा सकता है। आंदोलन के नेताओं को इस ओर ध्यान देना होगा। आंदोलन को भीड़ का मनोरंजन बनने से बचना होगा। 

यहाँ दिन में बारिश हुई थी। दरियाँ गीली थीं। मंच पर टेंट लग रहा था। मौसम सुहावना था। हवा चल रही थी। मानसून दस्तक दे रहा था।

तीसरी बार

गए शुक्रवार (26 जून 2026) की शाम मैं तीसरी बार प्रोटेस्ट में आया हूँ। अब बहुत उमस है। सब या कहें सब कुछ पसीना-पसीना है। शिक्षा मंत्री ने अब तक इस्तीफ़ा नहीं दिया है। प्रधानमंत्री शिक्षा मंत्री को जन्मदिन की शुभकामनाएँ दे चुके हैं। दिशा छात्र संगठन के लोग आशु मिश्रा की कविता गा रहे हैं, “कहो नरेंदर मज़ा आ रहा...”

वापस आकर

मुझे जंतर-मंतर गाँव के साधनहीन नेता जैसा लगता है, जिसके यहाँ गाँव का हर पीड़ित अपना दुखड़ा लेकर आता है : वह उनकी बात सुनता है, उनसे पानी पूछता है और चल देता है—उनके साथ—लड़ने, पिटने, मरने... वह उनके साथ थाना-कचहरी जाता है। वह पीड़ित के साथ पीड़ित बनकर निकल पड़ता है। राजधानी से लेकर परिवार तक जिसे ठुकरा देते हैं, वह उससे भी बाँहें फैलाकर मिलता है। वह भूखे की भूख बाँटता है और प्यासे की प्यास। जिसके तन पर कपड़ा नहीं, उसके लिए वह भी अपने कपड़े त्याग देता है। गांधी को गोली बिरला हाउस में लगी; समाधि राजघाट में है, लेकिन गांधी के दिल का कोई न कोई टुकड़ा ज़रूर जंतर-मंतर में ही कहीं दफ़्न है।

याद

साक्षी मलिक! 
बजरंग पुनिया! 
और रोती हुई विनेश फौगाट... जिस दिन मैंने उन्हें देखा था उसी रात पुलिस ने क्रैक डाउन करके उनके पूरे आंदोलन को छिन्न-भिन्न कर दिया था। जंतर-मंतर के बारे में जब भी सोचता हूँ तो मुझे हाथ में लाठी लिए बच्चों जैसी निश्छलता से नाचता, पगड़ी-धोती-कुर्ता वाला वह किसान याद आता है जिसकी शक्ल मेरे सपनों के हिंदुस्तान से बहुत मिलती-जुलती है। वह नाच रहा है और पीछे गाना चल रहा है—“मेरा रंग दे बसंती चोला माई रंग दे बसंती चोला...” भगत सिंह बूढ़े हो पाते तो ऐसे ही लगते...

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रचित को और पढ़िए : दारा शुकोह, मैनेजर पांडेय और कुछ झूठ | 'दुपहिया' की डायरेक्टर सोनम नायर से बातचीत | जेन ज़ी का पॉलिटिकल एडवेंचर : नागरिक होने का स्वादभाड़े के श्रोता और दाद का कारोबारकेवल इम्तियाज़ हँस रहा है और सब रो रहे हैं 

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