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राप्ती से गंगा तक, गंगा से राप्ती तक

राप्ती से गंगा तक

राप्ती एक सदाबहार नदी है जो मेरे गाँव से लगकर बहती है। मेरे घर के छत से उसकी विशालता को देखा जा सकता है। मेरा बचपन इसकी धाराओं के साथ खेलने में बीता है। इसकी नन्हीं-नन्हीं मछलियों से मैंने तैरना सीखा है। बचपन में जब मैं अपने सहेलियों संग इसकी धारा से खेलने जाती, तब माँ मुझे धमकाती, “कहाँ जाती हो राप्ती की धारा तेज़ है, मत जाओ डूब जाओगी।”

लेकिन माँ को क्या पता था कि मैं धाराओं से खेलने के लिए ही पैदा हुई हूँ। अब चाहे वह नदी की हो या जीवन की। उसके लाख मना करने पर भी मैंने राप्ती की धारा को नहीं छोड़ा। मैं प्रतिदिन उसके पास जाती रही उसके परिणामस्वरूप माँ से पिटाई खाती रही। आख़िर तंग आकर माँ ने मुझे शहर भेज दिया, ताकि मैं धारा से दूर रहूँ। कुछ समय के लिए ऐसा हुआ भी। समय बीतता गया मैं राप्ती से और राप्ती मुझसे दूर रही। आख़िरकार सोलह सालों बाद वह समय आया, जब मैं राप्ती से फिर मिली। मैं बहुत उत्साहित थी उससे मिलने को, उसकी धारा से खेलने को उसकी मछलियों संग बातें करते-करते दूर तक तैरने को। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, क्योंकि यह समय था कोरोना-काल का। 

मैंने राप्ती को हमेशा चंचल अवस्था में ही देखा था। उछलना, कूदना, प्रवाह में बहना उसकी प्रवृत्ति थी। बाढ़ के समय उसकी विशालता मेरे मन को पुलकित करती थी। कई बार तो वह मुझसे मिलने मेरे घर तक आ चुकी है। जब मैं उसको अपने मार्ग में आने वाली बाधाओं—बाँधों, पेड़ों, गाँवों को तोड़ते-उखाड़ते-बहाते देखती तो मुझे अपने जीवन की बाधाओं से लड़ने की शक्ति मिलती थी।

राप्ती का शांत और गंभीर रूप तो मैंने पहले भी देखा था, लेकिन कोरोना-काल में पहली बार मैंने उसकी विवशता और मौन को देखा। उसकी दोनों किनारों पर दीपक की भाँति लाशें रात-दिन जल रही थीं... और वह शांत थी, मौन थी, निःस्तब्ध थी। उसकी इस मौन दशा को मैं प्रत्येक शाम अपने छत पर बैठ घंटों निहारती थी। शायद इसलिए की मेरी भी दशा उसकी जैसी ही थी—शांत, मूक और निःस्तब्ध!

मेरी युवा अवस्था का यह पहला समय था; जब मैंने लगभग दो साल लगातार घर, राप्ती और गाँव के परिवेश में बिताया। इन दो सालों से पूर्व मैं चंचल धारा की तरह ही उद्दंड, उन्मत्त, धारदार और लक्ष्यभेदी थी। राप्ती जहाँ बाँध तोड़ती थी। वहीं मैं सहपाठियों का सिर फोड़ती और स्कूल की दीवार तोड़ती थी। राप्ती अपना विस्तार कर रही थी और मैं अपना...

इन दो सालों में मैंने समाज का विचित्र रूप देखा। एक ही ढोलक, मंजीरे और ताल के दो स्वर सुने। मनुष्यों के दो चरित्र देखें। शाम के समय दो तरह की ध्वनियाँ सुनाई देती थीं और दो तरह की बरातें उठती थीं। एक में जो ध्वनियाँ होती थीं वे हर्ष, उल्लास, जुनून से भरी होती थीं और नवीन जीवन-धारा का आरंभ करती थीं। 

दूसरी में भी ध्वनियाँ थीं; लेकिन वे चीख़, चिल्लाहट और सिसकियों से युक्त होती थीं। ये उन माताओं की चिल्लाहटें थीं जिनके घर के चिराग़ राप्ती के किनारे दीपक बन जल रहे थे, ये उन विधवाओं की चीख़ें थीं जिनका सिंदूर राप्ती में बह रहा था और ये उन नन्हें बच्चों की सिसकियाँ थीं जिन्होंने अपने पिता का नाम लेना भी नहीं सीखा था।

एक तरफ़ जीवन का निर्माण हो रहा था तो दूसरी तरफ़ उसका अंत। एक तरफ़ सिंदूर माथे पर लगाया जा रहा था तो दूसरी तरफ़ उसे धोया जा रहा था। एक तरफ़ भविष्य उजाले में था तो दूसरी तरफ़ अंधकार में। यह ग़ज़ब का द्वंद्व था—जीवन और मृत्यु का। कभी-कभी एक ही मनुष्य दोनों बरातों में शामिल हो जाता था। एक जगह रोता था तो दूसरी जगह नाचता था।

इन दोनों ही दृश्यों को मैं और राप्ती एक साथ मूक होकर देखा करती थीं। हम दोनों ही मनुष्य के इस रूप से हैरान थे और इससे मुक्ति चाहते थे।

कुछ समय बाद समय बदला। मैं सर्वविद्या की राजधानी काशी में आई और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में परास्नातक में प्रवेश लिया। हालाँकि स्नातक भी मेरा यहीं से हुआ है।

यहाँ आने पर मेरी मुलाक़ात गंगा से हुई। बचपन से ही प्रकृति मेरी सहेली रही है और उसमें भी नदी तो मेरी प्रिय संगिनी है। गंगा से भी मेरी मित्रता हुई, क्योंकि बिछड़ते समय  गंगा का परिचय राप्ती ने ही मुझे दिया था। मैंने घंटों गंगा के किनारों पर बैठ उससे बाते की हैं। उससे बातें करते समय उसके दर्द का अनुभव हुआ और पता चला कि मनुष्य जितना क्रूर और दिखावटी प्राणी दूसरा अभी नहीं बना है।

गंगा को लोग मोक्षदायनी, पतितपावनी और माँ आदि कहकर पुकारते हैं। लेकिन वहीं गिनती के सात लोग उसकी सुबह-शाम आरती उतारते हैं, तो सात हज़ार लोग उसकी छाती पर चढ़ सेल्फ़ी खींचते हैं। आरती के नाम पर बड़े-बड़े क्रूज उसके सीने को चीरते हैं। पवित्र जल के नाम पर उसकी साँसों को प्लास्टिक की बोतलों में भरते हैं। स्नान और आस्था के नाम पर अपने गंदे कपड़े उसमें प्रवाहित करते हैं... इससे अधिक दुर्गति किसी नदी की और क्या हो सकती है। संभवतः यह मनुष्य का स्वभाव ही है कि उसने अपनी सगी माँ की कभी क़द्र नहीं की—न घर में, न ही बाहर... अन्यथा आज इतने वृद्धा-आश्रम न होते। फ़िलहाल गंगा तो मुँहबोली माँ है। उसकी इज़्ज़त कैसे करेंगे! बहरहाल, गंगा से मिलने के बाद उसकी लहरों की ही भाँति मेरे मानस में विचारों की हलचल मची हुई है। न जाने कब शांत हो।

मैं तो ख़ुश हूँ कि मेरी राप्ती अभी इस दुर्गति से बची है। उसकी सुबह-शाम  गंगा की तरह आरती नहीं उतारी जाती, मात्र चंद दीपक ही जलाए जाते हैं। लेकिन वह ख़ुश है। निर्मल है। स्वच्छ है।

गंगा से राप्ती तक

प्रकृति ने मुझे हमेशा आकर्षित किया है... तब सबसे ज़्यादा जब आसमान में बादल घिरे हों, हवाएँ मदमस्त होकर चल रही हों, पेड़ों पर पत्ते हवाओं के धुन पर नाच रहे हों और फूलों की पंखुड़ियों संग उसकी ख़ुशबू तन-मन को छू रही हो। आज प्रकृति का यही रूप देखकर मन बादलों संग उड़ने लगा। यह उड़ान तब और बढ़ जाती है, जब उसमें जन्मभूमि की मिट्टी की सुगंध मिली हो।

महीनों बाद घर, घर की मिट्टी और राप्ती से मिलना हुआ। आज फिर से मैं घंटों राप्ती से रूबरू होती रही और उसका हाल-चाल लेती रही। बतियाती रही। वह अभी काफ़ी शांत है। यह उसके आराम का समय है। मैंने देखा उसकी धारा शिथिल है। वह अभी बहुत पतली हो गई है। पानी का स्तर नीचे जाने से उसके बीच-बीच में टीले निकल आए हैं। मैंने पूछा, “यह क्या हो रहा है तुम्हें! तुम इतनी पतली क्यों हो गई हो और तुम्हारे ऊपर ये मिट्टी के शैतान  क्यों सवार हैं।” न जाने वह क्यों हँस पड़ी और बोली, “अरे मेरी बच्ची, तुम इतनी परेशान क्यों हो रही हो! यह तो होता ही है। मैं जब गर्मियों में आराम करती हूँ तो सिकुड़ जाती हूँ, बिल्कुल वैसे ही जैसे तुम सोते समय बिस्तर में गुटुर-मुटुर करके सिकुड़ जाती हो और सो जाती हो वैसे ही... और ये टीले शैतान नहीं हैं। तुम इन पर ग़ुस्सा मत होओ। ये तो मेरे सहायक हैं। मैं नींद में इधर-उधर भटक न जाऊँ, इसलिए ये सब जगह-जगह निकल आते हैं और मुझे सही रास्ता दिखाते हैं। मेरी मछलियाँ भी तो इन पर दिन भर सवार रहती हैं। इन पर खेलती हैं। आख़िर उन्हें भी तो मिट्टी की ख़ुशबू पसंद है, जैसे तुम्हें अपने गाँव और अपने घर की मिट्टी की ख़ुशबू पसंद है।”

फिर मैं उसकी नन्हीं-नन्हीं हल्की-फुल्की धाराओं को देखने लगी। वे हवा संग हौले-हौले डोल रही थीं, मानो अपनी ही धुन में झूम रही हों। उन्हें देख मुझे उनके साथ खेलने का मन हुआ, लेकिन राप्ती ने मुझे रोक दिया वह बोली, “अभी इनसे दूर रहो यह उनके बढ़ने और लंबी धारा में बदलने का समय है। इनकी लय को मत तोड़ो, वरना दुबारा उनका विकास नहीं हो पाएगा। तुम्हारे पैरों की आहट से इनकी चेतना सक्रिय हो जाएगी और इनका बढ़ना रुक जाएगा और यह छोटी धारा में ही सिमटकर रह जाएँगी। क्या तुमने देखा नहीं है कि माँ दुधमुँहे बच्चे को कितना लंबे समय तक सोने देती है। बच्चा अपने ही राग में मस्त रहता है और माँ उसे देख ख़ुश होती रहती है, क्योंकि वह जानती है कि उसके बच्चे का निर्माण हो रहा है और उसकी हड्डियाँ मज़बूत हो रही हैं, उसकी मांसपेशियों में फैलाव हो रहा है। उसी तरह मैं भी इनको बढ़ता देख रही हूँ... अब तुम जाओ और कल आना इनसे मिलने, तब तक ये धाराएँ कुछ बड़ी हो जाएँगी।” 

मै इसके बाद उससे कल मिलने का वादा कर घर लौट आई।

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रूमा निषाद नई पीढ़ी की लेखक हैं। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय (प्रयागराज, उत्तर प्रदेश) में शोधार्थी हैं।

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