रचनात्मकता और द्वंद्व राही डूमरचीर
राही डूमरचीर
05 अप्रैल 2026
पेड़-पौधों की ही तरह हर रचनाकार अपनी मिट्टी, अपने परिवेश की उत्पत्ति होता है । मेरा यह कहना बेहद सामान्य कथन है । यह तो कहा जाता ही रहा है । फिर मैं नया क्या कह रहा हूँ? मैं नया बिल्कुल नहीं कह रहा। मेरा मानना है कि एक कवि के रूप में भी मैं कुछ नया नहीं कहता हूँ। मुझे हर बार लगता है कि जो कह रहा हूँ, वह पहले भी कई दफ़ा और कई तरीक़ों से कहा जा चुका है । पुरखे उसे बहुत पहले कह-बरत गए हैं, बस हम उसे भूल गए हैं। अपनी कविताओं के माध्यम से मैं उन्हीं बातों को सिर्फ़ याद दिलाने की कोशिश भर करता हूँ। रचनाकार ज़रिया ही तो होता है, संवाद की प्रक्रिया जो टूट गई है, उसे वापस बहाल करने में मदद करने वाला।
मेरे द्वंद्व भी मेरे परिवेश से ही उपजे हैं, बल्कि कहूँ मेरी परेशानी मेरे घर से ही शुरू हो गई थी। इसका ठीक से एहसास मुझे बहुत बाद में हुआ, पर मेरे भीतर यह तनाव बहुत धीरे-धीरे घुलता ही रहा था । यह तनाव लगाव और हिक़ारत, प्यार और ग्लानि के द्वंद्व से उपजा था। जैसा मैंने कहा, ‘ह्रदय में रिस रहे ज्ञान के तनाव’ को तब महसूस नहीं कर पाया था, पर ये मेरे भीतर मुसलसल घुलता-पनपता रहा था । मैं संताल गाँव में पैदा हुआ, बड़ा हुआ । मेरे घर के भीतर एक तरह की दुनिया थी, जिसके अपने क़ायदे-क़ानून थे, मूल्य-आदर्श थे और घर से महज़ कुछ पेड़ों की दूरी पर एक ‘दूसरी’ और शानदार दुनिया आबाद थी। मैं जब वहाँ अपने संताल दोस्तों के घर जाता तो ख़ूब अपनापन, लगाव और प्यार मिलता। वहीं मेरा कोई संताल दोस्त मेरे साथ या मुझे खोजता हुआ घर आ जाता, तो मेरे घरवालों की नाक-भौं सिकुड़ जाती थी। उनकी ‘सुंदर’ दुनिया में जैसे किसी असहज कुरूपता का प्रवेश हो जाता। (कोई रूप कुरूप नहीं होता, यह सब हमारी ओछी निर्मितियाँ हैं, यह भी आदिवासियत ने ही धीरे-धीरे समझा लिया था) उनके यहाँ जाता तो सहजता, समभाव से भरी मुक्त दुनिया दिखाई पड़ती। वहाँ औरत-मर्द, बच्चे-बुज़ुर्ग, किन्नर सब मिलकर काम करते, हँसते-बोलते, नाचते-गाते और इधर आता तो दुकान से नमक लाने के लिए भी मेरी माँ को मेरा इंतज़ार करता हुआ पाता। बच्चों, लड़कियों, औरतों, बुज़ुर्गों सबके लिए बेजान मर्यादाओं और नाच-गान से दूर नीरस और दमघोंटू नियमों से भरी दुनिया थी इधर।
उनकी दुनिया में सबके लिए प्यार था और मेरे घर में उन्हीं के लिए सहज हिक़ारत थी। ऐसा कोई दिन नहीं जाता था, जब मिथ्या श्रेष्ठताबोध के दंभ में डूबे अपने परिवार-समाज में संतालों के ख़िलाफ़, आदिवासियों के ख़िलाफ़ कोई नस्लीय टिप्पणी नहीं सुनता था। आज भी बहुत आसानी से इसे मेरे घर और वैसे ही घरों वाले समाज में ऐसी बातों को सुना जा सकता है। एक तरफ़ मिलने वाले प्यार और दूसरी तरफ़ की हिक़ारत से मेरे अंदर जो द्वंद्व पैदा हो रहा था, वही मेरे रचनाकार की बुनियाद है। इस द्वंद्व को समझने-बरतने में अरसा लगा, क्योंकि मैं भी उसी श्रेष्ठताबोध से ग्रस्त रहा था। अब भी वह कहीं अंदर ही है; पर आदिवासियों के प्यार और अपनेपन ने धीरे-धीरे यह समझाया कि श्रेष्ठता न सिर्फ़ एक बेकार निर्मिति है, बल्कि धरती का वासी होने में भी बाधक है। कच्चा-पक्का जो भी रच-कह पाता हूँ, बीर-बुरु-गाडा (जंगल-पहाड़-नदी) और उनके लोगों का प्यार-आशीर्वाद है। उन्होंने मुझे बिल्कुल शुरू से ग़ैर नहीं समझा और मुझे बेहद प्यार से अपनाया। अपने घर, अपने आँगन, अपने खेतों-मैदानों, नाच-गान, हर सामूहिक कार्यों-उत्सवों में मुझे हक़ से शामिल किया। इस वजह से मुझे अपनी जगह से वह मोहब्बत हुई, जिससे मैं आदिवासियों का महज़ पड़ोसी भर नहीं रहा। यही स्वाभाविक है कि जो धरती के जिस हिस्से पर पैदा होता है, उसे उस हिस्से से बेहद लगाव होता है, पर अपने घर, परिवार, समाज में ऐसा न होता देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ।
हम बिहार और यूपी के बॉर्डर से लगभग दो सौ साल पहले संताल परगना के भीतरी इलाक़ों में पहुँचे-पहुँचाए गए थे। मेरे दादा के माँ-पिता का हमारे यहाँ के पहाड़ों-जंगलों-नदियों से लगाव नहीं होना स्वाभाविक है। दादा के पास भी अपने छूटे घर की शायद थोड़ी-बहुत स्मृति रही हो, इसलिए उन्हें भी यहाँ की धरती से लगाव नहीं हो पाया। पर मैं यह नहीं समझ पाता हूँ कि मेरे माँ-और पिता को, मेरे रिश्तेदारों को, जो डेढ़ सौ सालों से यहाँ रह रहे हैं, उन्हें क्यों नहीं लगाव हुआ? मेरी पीढ़ी के लोगों को और उनके बच्चे-बच्चियों को इस ज़मीन से लगाव क्यों नहीं है? लगाव नहीं होने तक बात होती तब भी ठीक था, पर उन्हें इतनी घृणा क्यों है? यह प्रश्न मेरा लगातार पीछा करता है कि आज भी पेड़ों, जंगलों, नदियों, आदिवासियों को वे देखते हैं तो पैसा देखते हैं, फ़ायदा देखते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है कि आप जिस पेड़ पर बैठे हों, उसे ही काटने पर आमादा हों? पर ऐसा हो रहा है कि यह देखकर दिल बेचैन होता है। बीर-बुरु-गाडा के प्यार ने मुझे एक बड़ी दुनिया को अपना और अपने ही घर में धीरे-धीरे पराया बना दिया। ऐसे में कोई अपनी रचनाओं के ज़रिए ख़ुद को अभिव्यक्त नहीं करेगा तो कैसे करेगा। अगर मुझे आदिवासी समाज में पलने-बढ़ने का विकल्प दिया गया होता तो मैं सबके साथ मिलकर नाचने-बजाने-गाने वाला होता, कविताएँ नहीं लिख रहा होता।
श्रेष्ठता का दंभ ही वह मुख्य वजह थी, जिसकी वजह से ‘हम’ आदिवासियों को हीन और निकृष्ट समझते थे। यह दंभ भी अनुवांशिक होता है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वतः हस्तांतरित होता रहता है और उन्हें बर्बाद करता रहता है। इसका भुक्तभोगी मैं भी था। इसी वजह से दोस्ती-प्यार के बावजूद आदिवासियों के प्रति हमदर्दी ही हिलोर मारती थी, प्यार नहीं कर पाता था। प्यार का सही मतलब भी तो नहीं समझता था। वह माहौल ही नहीं मिला था कि समझ पाता। पेड़ों की हत्या करने वाले, मेरे दोस्तों के खेत-तालाबों को लूटने-बर्बाद करने वाले, उनका घर उजाड़ने वाले, पानी-सा चमकते उनकी आँखों में दर्द घोलने वाले, मेरे समाज में सम्मानित पिता कहला रहे थे, ज़िम्मेदार नागरिक की तरह उनका सम्मान हो रहा था। ये लोग ही अपने गल्प और अपनी कविताओं में प्यार के पुरोधा थे और श्रेष्ठ नागरिक भी थे। बाद में पढ़ने के लिए बाहर निकला तो पता चला कि यहाँ तो मनुष्य ख़ुद ही ख़ुद को धरती की सबसे उत्कृष्ट, बुद्धिमान, ज़िम्मेदार जीव घोषित करके बैठा है। समझ आया कि यही उसकी नैसर्गिक नवैयत है। हमारे यहाँ वाले होमो सेपियंस, अमेरका वाले होमो सेपियेंस की पीठ थपथपाते हैं, अमेरिका वाले जापान की, पर पीठ तो एक इंसान ही दूसरे इंसान की थपथपा रहा है । क्या कभी कोई पेड़, कोई जानवर, कोई नदी हमारी पीठ थपथपाने आई? पूछकर देखिए श्रेष्ठता की सारी हेकड़ी अभी हवा हो जाएगी। हममें इतना साहस भी कहाँ है कि हम उनसे आँखें मिलाकर कुछ पूछ भी सकें?
आदिवासियों की दुनिया में मनुष्य दुनिया का सबसे श्रेष्ठ प्राणी नहीं है। वहाँ जीव-जगत और बाक़ी प्रकृति में भेद नहीं है। वे यह बेहद ज़रूरी बात समझते हैं कि मनुष्य है; क्योंकि धरती है, पर धरती मनुष्यों की वजह से नहीं है। इसलिए वे सिद्धांतों के शिकार नहीं हैं, बल्कि प्रकृति और साथी मनुष्यों के सह-अस्तित्व, उनकी सहभागिता और उनके साथ सामुदायिकता में यक़ीन रखते हैं। इसलिए यहाँ क़द, काठी, रंग, जाति जैसे भेद के अनंत पैमाने फ़िज़ूल हैं, यहाँ कोई श्रेष्ठ नहीं है। श्रेष्ठता के नकार के इस भाव ने मेरे सामने भाषा की एक समस्या खड़ी कर दी। इसे भाषा संबंधित द्वंद्व भी कहा जा सकता है। भाषा के रूप में एक ऐसी हिंदी मेरे पास थी; जिसमें मुझे जो अपमानित करने वाला लगता था, वह हिंदीवालों को सहज लगता था। अब अगर हिंदी में बोलकर हिंदीवालों को ही न समझाया जा सके तो इससे बड़ी समस्या क्या हो सकती है?
इस संदर्भ में एक ताज़ातरीन उदाहरण देना चाहता हूँ। मेरे रोज़गार की जगह, जहाँ से मैं फ़िलहाल आया हूँ, वहाँ अभी चुनाव संपन्न हुए हैं। एक शब्द जो वहाँ पूरे चुनाव में छाया रहा, हावी रहा और अब लोग कह रहे हैं कि वह शब्द सबसे ज़्यादा भारी भी साबित हुआ। आप लोग शायद समझ गए होंगे मैं किस एक शब्द की बात कर रहा हूँ। वह शब्द है—‘जंगलराज’। सुबह-शाम, उठते-बैठते, रास्तों पर, दफ़्तर में कभी लोगों के मुँह से तो कभी लाउडस्पीकर के मुँह से; यह शब्द लगातार सुनता रहा, परेशान होता रहा, अपमानित भी महसूस करता रहा। मुझे लगा नेता न सही हिंदी का कोई ज़िम्मेदार पत्रकार या कोई बुद्धिजीवी इस शब्द के इस्तेमाल पर सवाल ज़रूर उठाएगा। ऐसा हुआ नहीं, इसलिए आज इस मंच से मैं अपना विरोध दर्ज करता हूँ और भाषा में प्रकृति के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा की भर्त्सना करता हूँ।
हत्या, लूटपाट, बलात्कार की घटनाओं के बढ़ने, अराजक तत्त्वों की बेरोकटोक मनमानी और राज्य में क़ानून की व्यवस्था के न होने को जंगलराज कहना, सिर्फ़ हमारी कृतघ्नता-मूर्खता का परिचायक नहीं है; बल्कि यह भाषा को हिंसक हथियार की तरह बरतना है। जंगल में आराजकता का राज होता है, कोई क़ायदा-क़ानून नहीं होता; यह वही कह सकता है जिसे सिर्फ़ बग़ीचे वाली व्यवस्था नज़र आती है, जो पूँजीवादी तरतीब का अपनी ज़िंदगी में बुरी तरह शिकार है, वैसे क्रांतिकारी न्यूज़ चैनल भी जो बिहार में आख़िरी आदिवासियों को खोजते रहे; जिन्होंने बिरहोरों पर वाक़ई अच्छी रिपोर्ट भी की। बिरहोर शब्द का विच्छेद करके बताया भी कि ‘बीर’ का मतलब होता है जंगल और ‘होर’ का मतलब होता है लोग, बिरहोर मतलब जंगल के लोग। उन्हें भी ‘राज’ के साथ जुड़े ‘जंगल’ शब्द से कोई परेशानी नहीं हुई। क्यों इस शब्द ने ‘संवेदनशीलों’ की चेतना पर कोई असर नहीं डाला? क्योंकि भाषा हमारे संस्कारों के अनुरूप ही हमारे भीतर तक जज़्ब होती है।
‘जंगलराज’ का अर्थ ग़ुंडाराज समझा जाता है, अराजक व्यवस्था के अर्थ में बरता जाता है। जिस जंगल से हमारी साँसें सुरक्षित हैं, जिसके होने से हमारी दुनिया आबाद है, जो शहरियों को अपनी जड़ों से विस्थापित करने कभी शहर नहीं आया; बल्कि शहरों की ज़रूरतों को ख़ुद मिटकर भी पूरा ही किया, उसे ही भाषा में गाली की तरह बरता जा रहा है। जंगल की ज़िंदगी की सबसे बड़ी ख़ासियत सह-अस्तित्व और सहजीविता है जिसे जंगल के बाहर रहने वाले हम लोग, लाख जतन के बावजूद सीख नहीं पाए हैं। अभी तो हमें अपनी ही प्रजाति के साथ रहना, उनका सम्मान करना नहीं आया है। 10 से 21 नवंबर 2025 तक ब्राज़ील में चले जलवायु शिखर सम्मलेन (क्लाइमेट चेंज कॉन्फ़्रेंस-30) में अभी उसी जंगल को बचाने की बात ही केंद्र में थी, क्योंकि जंगल नहीं बचे तो हम भी कहाँ बचने वाले हैं। इसे प्रमुखता से स्वीकार किया गया है कि दुनिया को अब मनुष्य-केंद्रित नहीं; बल्कि प्रकृति केंद्रित दृष्टि से देखना ज़रूरी है। वहाँ यह भी स्वीकार किया गया है कि जंगल से जुड़े आदिवासियों की परंपरागत ज्ञान के बिना जंगल को बचाना संभव नहीं है और तापमान बढ़ने का मामला सिर्फ़ पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक संकट भी है । वैसे ही भाषा में प्रकृति के लगातार अपमान का यह संकट भी सिर्फ़ भाषिक नहीं, बल्कि सामाजिक-सांकृतिक संकट भी है।
यही एक उदाहरण नहीं है, हमारी भाषा में प्रकृति के ख़िलाफ़त की। धरती-प्रकृति के ख़िलाफ़ यह हिंसा बहुत सहज तरीक़े से हमारी भाषा, हमारे व्यवहार में शामिल है। ज़्यादा परेशानी वाली बात यह है कि इसका हमें इलहाम तक नहीं है, अफ़सोस कैसे होगा? एक युवा कवि हैं जिन्होंने इस भाव की कविता लिखी कि दुनिया भर की नदियाँ समंदर में मिलती हैं, पर समंदर मीठा नहीं हो पाता, खारा ही रह जाता है। अब इस सहज पर्यावरणीय ज्ञान का क्या किया जाए? समंदर खारा ही है नदियों की वजह से, यह उन्हें कौन बताए। हमारे वरिष्ठ शाइर बशीर बद्र ने तो इससे भी आगे बढ़कर लिखा है :
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समंदर से मिला दरिया नहीं रहता
छोटों की अस्मिता को हड़प जाने वाले ‘बड़े लोगों’ की तुलना देखिए किससे की जा रही है? उन बड़े लोगों की नकारात्मकता को सिद्ध करने के लिए समंदर यहाँ सबसे बड़े उपादान के रूप में मौजूद है। समंदर नहीं होता तो यह दुनिया कुछ ही दिनों में जलकर भस्म हो जाती। मानवजनित गर्मी को 90% तक और कार्बन उत्सर्जन के एक तिहाई भाग को समंदर अकेले सोखता है। 2023 की एक रिपोर्ट में बताया गया कि हमारी ज़्यादतियों की वजह से समंदर ने उस साल 10% कम कार्बन डाई ऑक्साइड को सोखा तो धरती के तापमान में वृद्धि हो गई और मौसम की पद्धति में बड़े बदलाव हो गए। यह 10% यानी एक अरब टन कार्बन डाई ऑक्साइड आधे यूरोपीय संघ के कार्बन उत्सर्जन के बराबर है। जिस समंदर की वजह से दुनिया सुंदर और रहने लायक़ है, उससे जब भी मिलने का मौक़ा बने हमें जाना चाहिए।
क्यों हमारे आस-पास की चीजें, जिनसे हमारा जीवन मूल रूप से जुड़ा हुआ है, उसके प्रति हम भाषा और व्यवहार में हिंसक हैं। पहाड़, जंगल, जानवर सबके प्रति हमारे अंदर एक सहज हिक़ारत का भाव है। ध्यान से देखिए तो औरतों, किन्नरों, समलैंगिकों, वंचितों के प्रति हिंसा की एक बड़ी वजह यह भी है। यह हमारे स्वभाव में है, इसलिए तो भाषा में है। रहेंगे इसी धरती पर और ‘इज़्ज़त’ के मिट्टी में मिलने से डरेंगे। बारिश पर कविता लिखेंगे, गाने फ़िल्माए जाएँगे पर क्रिकेट मैच के बीच या पहले बारिश हो जाए तो उसे विलेन कहेंगे। घर के बाहर झाड़ियों के उग आने को हिक़ारत से जंगल कहा जाएगा। ख़ूब खेलती-उछलती, मौज से बहती झरिया या नदी को नाला कहेंगे। सामुदायिकता के गुण गाये जाएँगे; पर जिन जानवरों से इसे मनुष्य ने सीखा है, उसे अपनी भाषा में अपमानित करते रहेंगे।
हम क्या हैं, भाषा ही तो हैं। भेद तो बात ही खोलती है न! बोलते हुए हम अपने आपको खोल ही तो रहे होते हैं। हिंदी की इस प्रकृति-विरोधी भाषाई संस्कार का सबसे पहले पहचान करनी होगी, इसे स्वीकार करना होगा और फिर इससे मुक्ति का प्रयास करना होगा। भाषा में प्रकृति के ख़िलाफ़ व्याप्त हिंसा पर कहीं कोई बात नहीं हो रही, इसे व्यर्थ का विलाप समझा जाता है। इसलिए इस मंच से मैं इस बात को भी ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि भाषा में व्याप्त प्रकृति के ख़िलाफ़ हिंसा पर बात शुरू होनी चाहिए।
एक द्वंद्व जो मुझे हमेशा सालता है कि जिसे हम वर्तमान कहते हैं, क्या वह वर्तमान है भी? जिसे वर्तमान कहा जाता है, वह मुझे वर्तमान से ज़्यादा आशंकाओं-त्रासदियों से भरे भविष्य की तरह दिखता है। तब वर्तमान क्या आशंकाओं से भरे भविष्य का ही नाम है? अतीत और भविष्य के बीच वह वर्तमान कहाँ है, जिसे सुनहरा बनाने के लिए तमाम क़वायदें चल रही हैं। पेड़ों का कम होना, नदियों में पानी नहीं होना, पहाड़ों का धीरे-धीरे स्मृति होते जाना, वह भविष्य ही तो है जिससे हम डरते हैं। तमाम इन्श्योरेंस के माध्यम से अपने और अपने परिवार को ‘इन्श्योर्ड’ करने वाली पीढ़ी के लिए, यह समझना इतना मुश्किल क्यों है कि नदियाँ नहीं लौटीं तो ख़ुशियाँ लौटकर कभी नहीं आएँगी। न हम सुरक्षित रह पाएँगे और न वर्तमान भी ख़ुद को आशंकाओं से भरे बदनसीब भविष्य में तब्दील होने से बचा पाएगा।
हमारा समय पुरखे, पेड़ों, नदियों और जंगलों में निवास करता है। उनके बीच पलता-बढ़ता है। उन्हीं के साथ-साथ चलता है। उनके बीतने से हमारा समय भी बीत जाता है, हमारे लोग बीत जाते हैं। वैसे समय का हम क्या करेंगे, जिनमें ये नहीं होंगे। आप भी क्या करेंगे ऐसे समय का? अस्ल सवाल तो यह है कि हम-आप क्या कर रहे हैं ऐसे समय में? इस दुनिया में कटते पेड़ों के साथ कटुता बढ़ती ही गई है। जंगलों-नदियों के नहीं होने से मनुष्य लगातार हिंसक होता गया है। यह समीकरण शायद आपको उलटा लगे, पर उस तरफ़ खड़े होकर देखिए जिधर नदियाँ धरती पर अपनी मौत का विलाप कर रही हैं। फिर आपको शायद यह अहसास हो कि सीधा क्या है और उलटा क्या है? कभी ग़ौर से अपने इतिहास पर हम विचार करें, तब शायद यह समझ पाएँ कि धरती के पास हमारी ज़रूरत को पूरा करने के लिए जब तक पर्याप्त होगा, मनुष्यता विकसित होती रहेगी। हमारे लालच से जैसे-जैसे धरती की क्षमता कम होती जाती है, मनुष्य और मनुष्य के बीच कटुता बढ़ती जाती है। यह कटुता दुनिया भर में जंगों के सिलसिले को जन्म देती रही है। हज़ारों साल पुराना एक नैटिव अमेरिकन मुहावरा है, ‘‘यह धरती हमें अपने पुरखों से विरासत में नहीं मिली है, बल्कि इसे हमने अपने बच्चों से उधार लिया है।’’ अब सोचिए कि हम किसका हिस्सा खसोट रहे हैं, हमें अपने बच्चों तक की परवाह नहीं । सोचिए कि कृतघ्नता की किस हद को हम जी रहे हैं। जी ही नहीं रहे, बल्कि उस कृतघ्नता का उत्सव मना रहे हैं और हमें इसका इलहाम तक नहीं। यह धरती और हमारी यह दुनिया पता नहीं इस कृतघ्नता को कब तक बर्दाश्त कर पाएगी? धरती से कुछ सुंदर मिटाया जा रहा हो और उसकी जगह कितना भी ‘सुंदर’ कुछ और क्यों न बनाया जा रहा हो, कमनीय नहीं हो सकता।
बहुत बार मुझे आदिवासी और जंगलों के रोमान में डूबा हुआ मान लिया जाता है। जैसे मैं विकास का, प्रगति का विरोधी, यथास्थितिवादी हूँ। जंगल के साथ रहना, उनके हक़ में खड़ा होना यथास्थितिवादी होना नहीं है। जैसा आज आदिवासी कह रहे हैं, मैं भी कहना चाहता हूँ कि मैं विकास-विरोधी नहीं हूँ; पर विनाश-विरोधी ज़रूर हूँ । सोचिए न, तमाम वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद हमें आज भी सूरज के उगने और धरती के घूमने से ज़्यादा भरोसा किस बात पर है? क्या हम दुनिया भर का विज्ञान लगाकर भी पानी से शुद्ध पानी, हवा से शुद्ध हवा, मिट्टी से ज़्यादा उपजाऊ मिट्टी और आसमान से साफ़ आसमान बना सकते हैं? इसलिए इनके पक्ष में खड़ा होना यथास्थितिवादी होना नहीं, बल्कि इस धरती के पक्ष में खड़ा होना है। कम से कम इस धरती पर न्याय और बराबरी के पक्ष में खड़े होने वालों को तो अब धरती के पक्ष में खड़ा होना ही चाहिए, क्योंकि यह सवाल मुझे हमेशा अपने आग़ोश में लिए रहता है कि मनुष्यविरोधी होकर तो फिर भी रहा जा सकता है, पर धरतीविरोधी होकर कितने दिनों तक बचे रह पाएँगे हम?
मेरे द्वंद्व, मेरी दुविधाएँ मुझे रचनाकार न बना पाएँ... न सही, पर अगर मुझे इस धरती के बाक़ी जीवों, वनस्पतियों, नदियों, पहाड़ों ,चट्टानों का सह-वासी बना पाएँ , साथी बना पाएँ, तो यह ज़िंदगी व्यर्थ नहीं जाएगी।
जोहार!
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‘अकार’ के 73वें अंक से साभार प्रस्तुत।
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