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रागदर्पण : नियति को मुझसे प्रेम है

नए साल का पहला महीना जब आधा बीतने को था, मैं गए बरस की यादावरी में रही। तमाम लोग अपनी दीवारों पर बीते बरस के नफ़े-नुक़सान का हिसाब-किताब लगाकर, क्या खोया-क्या पाया लिख चुके थे। साल-ए-नौ की आमद का जश्न मनाकर वे सुस्त भी पड़ गए थे। यों कुछ नया नहीं हुआ; बस कैलेंडर बदला... ज़िंदगी में शेष सब कुछ यथावत—वही रोज़ के खटराग, ऊब और एकरसता। वही पिछले बरस की आशंकाएँ, चिंताएँ, भय और हताशाएँ। यह बरस भी यूँ ही झाँई-झप्पा देकर भाग जाएगा।

अस्ल में, क्या बदलता है!

अपने आस-पास के लोगों को देखती हूँ तो अचरज और अवसाद से भर जाती हूँ। सारे सुख चंद-रोज़ा और चंद-साला हैं। जो बात किसी साल एक बड़ा सुख बनकर सुकून देती रही, जिसके लिए ख़ुद को नसीबवर समझकर इतराते रहे, दूसरे बरस उसी का सोग मनाया। उसी के लिए ख़ुद को लानतें भेजीं, ख़ुद को कोसा। जिनके सामने मन की गाँठ खोली, थाली, कपड़े, बिस्तर और शराब के कासे साझा किए, उन्हीं को अपशब्द कहे। एक वक़्त जो राहत का सबब था, जो हमदर्द-हमनशीन रहा, बाद को वही दर्देसर हो गया।

मन बाज़ीगर है। रोज़ नए तमाशे करता है। एक वक़्त का सुख कब दूसरे वक़्त का दुःख बन जाए, कोई नहीं जानता। पाने-खोने के हिसाब में खोना ही बड़ा ठहरता है। लेकिन जिसे खो चुका जान बैठे हों, वह निरायास ही मिल जाए तो! मेरा ढुलमुल यक़ीन पुख़्ता हो जाता है—हो न हो, नियति को मुझसे प्रेम है।

मैं पारसालों की चक्करदार वीथियों से गुज़रने लगती हूँ।

नब्बे के आख़िरी साल हैं। जर्नलिज़्म की क्लास में सर अपनी धाराप्रवाह अँग्रेज़ी में इंटरव्यू लेने के गुर सिखा रहे हैं। मैं ख़ामख़्वाह ही कॉपी के वरक़ पलटे जा रही हूँ। अचानक सर पूछते हैं, “किसी को समझने में दिक़्क़त तो नहीं? माध्यम हमारे बीच बाधक नहीं होना चाहिए।”

मैं शशोपंज में हूँ। कहना चाहती हूँ कि मैं अँग्रेज़ी के साथ सहज नहीं हूँ। अँग्रेज़ी बोलते-समझते मेरा दम घुटने-सा लगता है। मैं हिंदी में बेहतर कर सकती हूँ। लेकिन चुप रहती हूँ। अपने दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे देखती हूँ। मेरे दाएँ एक लहीम-ओ-शहीम अफ़्रीकी लड़की है, उसका नाम ‘पेशेंस’ है। बाएँ भी वैसी ही भारी-भरकम मलयाली ‘मरियम्मा’। ठीक आगे उत्तर-पूर्व की कृशांगी ‘रुथ’ और पीछे ब्रिटेन से आई एक भारतीय ‘श्रुति भावना’। वह मुस्कुराती भी है तो अँग्रेज़ी में। मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखती।

मैं सोचती हूँ, कोई अगुवा होकर अपना हाथ खड़ा करे और कहे कि वह हिंदीभाषी है। सहसा, बिना अकड़-अचक के एक हाथ उठता है। जैसे आप गिर रहे हों और कोई तपाक से आपका हाथ थाम ले।

मैं हैरान होती हूँ। वह दमकदार आँखों वाली एक सलोनी लड़की है। मैं उसका नाम नहीं जानती। उसकी आँखों में काजल पड़ा है। काजल पड़ी चार आँखें आपस में टकराती हैं। दूर ही से मूक बात होती है। अनालाप में भी अपनत्व मुखर हो उठता है। दो आँखों में आत्मविश्वास भरा है और दो में कृतज्ञता। अगले रोज़ से सर बड़ी उदारता के साथ अपनी चटपटी अँग्रेज़ियत में हिंदीपन की मिठास भी घोल देते हैं।

उसे गायकी में कमालियत हासिल थी। पूरे नाद-विधान के साथ, सुरों के आरोह-अवरोह को साधकर गाती थी। मैं उसे घंटों सुन सकती थी। गीतों से भी मीठी थी उसकी हँसी। मैं सोचती थी, वह हरदम इतनी ख़ुश कैसे रहती है! दरअस्ल, उसके भीतर दूसरों को ख़ुश करने की एक ऊर्जा थी। वही ऊर्जा उसकी हँसी में ऐसी खनक भरती थी। जब वह हँसती तो उसकी हँसी के क़तरे मेरे चारों तरफ़ बिखर जाते—क्लास में, कैंटीन में, डार्करूम में और अक्सर फ़ोन से निकलकर मेरे घर में भी। उसकी हँसी छोटी घंटियों की तरह थी, जिसकी गूँज कानों में देर तक बनी रहती थी।

मेरे लिए गाना असाध्य था। आज भी सोचती हूँ कि अगर मैं गा सकती तो तनिक समृद्ध और तुष्ट होती। फिर भी, मैंने हिचकते हुए उसके सुर में सुर मिलाकर बारंबार गाया था। घर लौटकर भी एक ही गीत को अहर्निश अलापने से कंठ खुल गया था। मुझे समझ आने लगा था कि क्यों बंगाली लड़कियाँ मुझे लुभाती हैं। उनमें ज़रूर ही आम लड़कियों से कुछ ज़्यादा होता है।

ये उन दिनों की बातें हैं, जब मेरी हिमाक़तों की ख़बर पिता को हो चुकी थी। दुनिया के सबसे ज़्यादा प्यार करने वाले, नाज़बरदार पिता और बहुत बोलने वाली, फ़रमाबरदार बेटी के दरमियान संवाद बहुत कम होने लगे थे। माहौल में हर वक़्त एक तल्ख़ी भरी रहती थी।

ऐसे में जाने कैसे मुझसे एक छोटे बटुए में सँभालकर रखे मेरी फ़ीस के रुपए कहीं गुम हो गए। मैंने हिचकते हुए फिर से माँग की।

“फ़ीस के रुपए खो गए हैं।”

“कैसे खो गए! अच्छा होता कि तुम भी खो जातीं,” पिता चिल्लाए थे।

“कल फ़ीस भरने की आख़िरी तारीख़ है।”

“तो पढ़ाई छोड़ दो... वैसे भी तुम कौन-सा कुल का नाम रोशन करने वाली हो। मेरे पास और रुपए नहीं हैं।”

एक चिरांदा लम्हा भभककर गुज़र गया।

“ठीक है, छोड़ देती हूँ।”

मैं भी उतनी ही तल्ख़ थी। मैंने उसे फ़ोन किया।

“मैं कोर्स छोड़ रही हूँ।”

“ऐसे कैसे! अच्छा, कल भर तो आ,” उसने कहा।

अगले दिन मैं उदास थी। वह हमेशा की तरह खिली हुई। तूत के पेड़ के तले सूखी पत्तियों का ढेर था। हम वहीं बैठ गए। वह दो काग़ज़ी प्यालों में कॉफ़ी ले आई थी।

“पक्का इरादा कर लिया है?”

“हाँ।”

“और अगर फ़ीस जमा हो जाए तो?”

“कैसे! कोई छोटी-मोटी रक़म है!”

“इतनी बड़ी भी नहीं है।”

उसने फ़ीस की रसीद मेरी हथेली पर रख दी। मैं उसका मुँह ताकती रह गई।

“देख, इमोशन-विमोशन मत दिखाना। मुझसे नहीं झिलता।”

मैं रोने को थी कि उसका हाथ थामकर हँस पड़ी।

हम आख़िरी दफ़ा मेरी शादी पर मिले थे। उसने कबूदी रंग की साड़ी पहनी थी। शादी में तमाम बातें अच्छी भी हों, मगर एक ख़राब बात ज़रूर होती है कि कुछ दिनों के लिए हम बाक़ी सब कुछ भूल जाते हैं। वे कुछ दिन वसीअ होते गए। मैं उसे भूल गई थी, ऐसा नहीं था, मगर मैंने उसे याद नहीं किया था। यह याद न करना कितनी बड़ी भूल थी! इस भूल ने मुझे सत्रह साल की तवील बेचैनी दी।

जब उसकी सुध हुई, तब हमारे पुराने पते और फ़ोन नंबर बदल चुके थे। मैं उसे पागलों की तरह सोशल साइटों पर तलाशती रही। यह कितना भारी काम था! विजयश्री शर्मा जब विजयश्री तनवीर हो गई थी, तब दीपिका भट्टाचार्य भी तो कुछ और हो गई होगी। विजयश्री कितना अवांछित और बोझिल नाम है! देश भर में इस नाम की सौ-एक लड़कियाँ भी न होंगी। मुझे ढूँढ़ लेना फिर भी सरल था, लेकिन दीपिका—कैसा जगभाता नाम है! बोलते ही मन में सैकड़ों चराग़ जल उठते हैं। इस नाम की अनगिनत लड़कियाँ हैं। और वह सूरत भी तो अब पहले-सी न रही होगी। मेरे चेहरे पर ही वह जवाँसाल शोख़ी कहाँ रह गई है! उम्र देह में काहिली और माँदगी बाद में भरती है, सूरत पहले बदल देती है। उमंग और ख़्वाहिशें बाद में लीलती है, चेहरे का नूर पहले छीन लेती है। आख़िर, वह मुझे किसी ढब न मिली।

गए दिसंबर में, जब दुनिया भर में क्रिसमस के पेड़ सज रहे थे, बच्चे कैरोल गाने लगे थे, रेड लाइटों पर सफ़ेद गोट वाली लाल टोपियाँ बिकने लगी थीं और लोग एक-दूजे को उपहार बाँट रहे थे, सहरदम की पवित्र दुआ की तरह एक सेंटा ने अपनी जादुई घंटी बजाई।

“विजयश्री तनवीर, आपके लिए इनबॉक्स में कुछ ख़ास है।”

मैंने सेंटा का नाम पढ़ा। दिमाग़ में एक खटका हुआ। मेरी शहरग फड़क उठी—काश! काश!

और सेंटा का संदेश देखते ही मैं ख़ुशी और हैरानी से चीख़ पड़ी, “दीपिका मिल गई!”

सेंटा ने उसकी तस्वीर और फ़ोन नंबर भेजा था। यह एक करिश्मा था।

इतने सालों में क्या हुआ, वह किस दौर से गुज़री—इन निजी बातों का कोई औचित्य नहीं। ख़ास बात यह है कि उन्नीस साल बाद बड़े दिन की शाम हम एक साथ थे। हमने क्रिसमस के नहीं, यारान-ए-क़दीम के नाम पर केक काटा था।

तस्वीर उसी रंगीन शाम की है और यह आवाज़ उसी कलकंठा, कलहासिनी की।

यह लड़की न केवल गाती है, बल्कि शानदार अंदाज़ में कहानियाँ भी कहती है और पार्श्व स्वर देती है। आप सबसे गुज़ारिश है कि एड-जिंगल गाने का काम हो या गीत-गायकी का, कहानी-वाचन हो या वॉइस-ओवर—किसी को आवश्यकता हो तो मुझसे संपर्क करे। दीपिका किसी भी सोशल नेटवर्क साइट पर नहीं है।

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