प्रयागराज-यात्रा : सुकून की तलाश में
विनीता बाडमेरा
22 जुलाई 2026
लोग कुंभ या माघ मेले में पुण्य की कामना लेकर प्रयागराज आते हैं, किंतु मुझे मेले में जाने पर न जाने क्यों ख़ुद को खो देने का भय लगता है। फिर अपने पापों का हिसाब भी भला कौन रखता है! सच तो यह है कि जब-जब मैं स्वयं को खोने लगती हूँ, तो ख़ुद को बचाने के लिए किसी यात्रा पर निकल पड़ती हूँ। इस बार वही यात्रा मुझे मार्च के महीने में प्रयागराज ले आई।
बारह मार्च, गुरुवार की रात जियारत एक्सप्रेस अजमेर से रात बारह बजकर चालीस मिनट पर रवाना हुई थी। दूसरे दिन, शुक्रवार की शाम लगभग चार बजे हम—पति-पत्नी प्रयागराज पहुँचे। स्टेशन पर ‘प्रयागराज’ लिखा देखते ही लगा, मानो किसी गहरी नींद से जागी हूँ। बरसों से आँखों में पल रहा कोई सपना जैसे साकार हो गया हो। पता नहीं क्यों, मैं बुदबुदाई, “इलाहाबाद पहुँच गए।”
ज़माना ऑनलाइन का है। ग़नीमत है कि अभी हम अभी गूगल पर किसी शहर को देखकर यह नहीं मान लेते कि हमारी यात्रा पूरी हो गई। हालाँकि, भविष्य में ऐसा भी मुमकिन हो जाए तो? फ़िलहाल इस प्रश्न का उत्तर मैंने भविष्य पर ही छोड़ दिया है।
ख़ैर, दूसरे शहर में पहुँचकर किसी असुविधा का सामना न करना पड़े, इसलिए बिटिया ने पहले ही हमारे लिए होटल बुक कर दिया था। स्टेशन से होटल बहुत पास था; पैदल भी जाया जा सकता था, किंतु किसी नए शहर से इतनी जल्दी पहचान हो पाना आसान कहाँ होता है! हर नया शहर अपनेपन का परिचय देने में थोड़ा समय लेता है। इसलिए हम ऑटो से होटल पहुँचे। रेलवे स्टेशन के नज़दीक होने के कारण बाहर काफ़ी चहल-पहल थी। आख़िर धर्म का आकर्षण भी कम नहीं होता!
कमरे में पहुँचकर थोड़ा आराम किया और फिर यूँ ही प्रयागराज की सड़कों पर घूमने का मन हो आया। होटल से निकले तो सूर्यास्त हो रहा था। अँधेरा अपना काम करने में लगा था और सरकारी लैम्पपोस्ट की रोशनी उस काम को नाकाम करने में। एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि संगम सुबह जाना ज़्यादा अच्छा रहेगा। तब तक शाम की आरती भी समाप्त हो चुकी थी। थोड़ी निराशा होना स्वाभाविक था। हम कुछ देर यूँ ही टहलते रहे, फिर रात का भोजन कर होटल लौट आए। सफ़र की थकान इतनी थी कि बिस्तर पर लेटते ही आँखें ख़ुद-ब-ख़ुद मूँद गईं।
तड़के सुबह पर्दों से छनकर आती प्रभाती धूप कमरे में फैल रही थी। खिड़की से झाँकता नारंगी-लाल सूरज देखकर नर्सरी की वह अँग्रेज़ी कविता-पंक्ति याद आ गई—Early to bed, early to rise... होटल के बाहर ही एक चाय की गुमटी थी। गुमटी पर चाय पीने का अपना अलग मज़ा है। वहाँ पहुँचे तो देखा कि हमारी तरह कई दूसरे शहरों से आए परदेसी लोग भी चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। ‘परदेसी’—फिर इस दुनिया में कौन नहीं! देश तो शायद हम सबका कोई और ही है। यह सोचकर मैं मुस्कुरा दी। सामने बैठे कुछ अनजान चेहरों ने भी मुस्कान भरते हुए प्रतिउत्तर दिया। शहरों के नाम पूछे गए, दो-चार बातें हुईं और फिर समय ने सबको जल्दी-जल्दी चाय पीने और अपनी-अपनी राह पकड़ने को मजबूर कर दिया। होटल लौटे। जैसे किसी नए से पहली बार मिलने के लिए ख़ुद को ठीक तरह से तैयार करना होता है, वैसे ही किसी नए शहर से मिलने के लिए भी ख़ुद को तैयार करना पड़ता है।
हमारी इस यात्रा का आधा दिन यूँ ही ख़त्म हो चुका था। अब प्रयागराज देखने के लिए हमारे पास केवल एक दिन था। इस एक दिन को सही प्रकार से इस्तेमाल करने के लिए मोबाइल पर एक बार फिर दर्शनीय स्थलों की लिस्ट देखी। सबसे ऊपर था—नाव से संगम तक जाना।
तैयार होकर जैसे ही होटल से बाहर आए तो मार्च की सुबह का तेज़ सूरज देखकर आश्चर्य हुआ। अभी साढ़े सात ही बजे थे और सूरज अपने तेवर दिखाकर डरा रहा था। हमने तय किया कि पूरे दिन के लिए एक ऑटो कर लिया जाए। एक ऑटोवाले से बात हुई। उसने नौ सौ रुपये मेहनताना बताया। उसके मेहनताने पर बहस करना फ़िज़ूल था क्योंकि हमें एहसास था कि कितना कुछ है इस शहर में देखने को। फिर ऐसे शहर जिसके बारे में आप अधिक न जानते हों, वहाँ थोड़ा-बहुत, कम-ज़्यादा के बारे में सोचा नहीं जाता और यहाँ महत्त्व उस सुविधा का भी था, जो पूरे दिन निश्चिंत होकर घूमने से मिलने वाली थी।
कुछ दूर चलकर हमने एक दुकान पर नाश्ते के लिए ऑटो रुकवाया। वहाँ ब्रेड-पकौड़े का नाश्ता किया। पेट की आग कुछ शांत हुई तो ऑटोवाले से पिछले साल के कुंभ मेले की बातें होने लगीं। बातें करते-करते अचानक उसने ऑटो रोक दिया और हमें उतरने को कहा। हमने कारण पूछा तो हँसते हुए बोला, “संगम नहीं जाना?” हम भी हँस पड़े।
उन दिनों कोई त्योहार नहीं था, कोई ख़ास महीना भी नहीं; फिर भी वहाँ भीड़ थी। मन में आया—शांति और सुकून की तलाश आख़िर किस मौसम या महीने में करनी चाहिए? इस प्रश्न का जवाब कहाँ है!
हम किनारे पर खड़े जमुना [यमुना] के जल और अनगिनत नावों को देख रहे थे। किनारे पर लोग नाववालों से किराया तय कर रहे थे। हमने भी दो जन के लिए बारह सौ रुपये में एक नाव तय कर ली। कौन जाने फिर दुबारा आएँ! न आएँ!
हम नाव पर बैठे और शांत लहरों से होते हुए आगे बढ़ने लगे। पतवार थामे दोनों नाविक भाई थे। उन्होंने बताया, “नावों का ठेका चलता है। यह नाव हमारी नहीं है। हम तो सिर्फ़ यात्रियों को संगम तक ले जाकर वापस किनारे छोड़ने का काम करने वाले नाविक हैं। एक तरह से यह हमारी नौकरी है।”
उनकी बात सच थी या नहीं, यह जानने की न तो कोई आवश्यकता थी और न ही इच्छा। मैं सोच रही थी कि यदि यहाँ आकर भी मन ऐसे ही सवालों में उलझा रहेगा, तो फिर सुकून हरगिज़ नहीं मिलेगा? इसलिए मैं मौन हो यमुना में उठती लहरों को देखती रही। तभी नाववाले ने इठलाती चली आई गंगा दिखाते हुए कहा कि सरस्वती लगभग लुप्त हो चुकी हैं। नाव में बैठे-बैठे मुझे सहसा ही ‘बंदिनी’ फ़िल्म का गीत ‘मेरे साजन है उस पार, मैं मन मार हूँ इस पार’ कैसे याद आया, पता ही नहीं चला। अचानक मन भारी हो गया। कुछ गीत ऐसे ही होते हैं। उदास करने वाले। परंतु यह भी आश्चर्य है कि लहरों को देख उदासियाँ उठीं और कुछ देर बाद ही मन फिर से सहज हो गया।
इसी बीच जल में असंख्य प्रवासी पक्षी दिखाई दिए। नाविक ने बताया, “अब ये अपने देश लौटने वाले हैं।” नाविक की बात सुनकर मैं सोचने लगी, “कौन है जो इन्हें दूसरे देश के बारे में बताता है और कौन इनके आगे दुनिया का मानचित्र रखता है! ये आते हैं, लौट जाते हैं। यह आवागमन चलता रहता है, जब तक साँसे हैं।”
मैं इन ख़यालों में खोई थी कि तभी एक दूसरी छोटी नाव पर नज़र पड़ी। उसमें पक्षियों के दाने के पैकेट थे। दूसरा नाविक आस-पास की नावों में बैठे सैलानियों से उन्हें ख़रीदने की गुहार कर रहा था। यहाँ भी बाज़ार था। एक क्षण को लगा कि बाज़ार का प्रवेश हर जगह हो जाता है। फिर तुरंत ही यह विचार भी आया कि इन पक्षियों की भूख से ही कुछ नाविकों के परिवार का पेट भरता है। जीवन का चक्र इसी तरह चलता है।
कुछ ही देर बाद हम संगम पहुँच गए तो पाया कि दूर-दूर तक देश के कोने-कोने से आए लोग मंत्रोच्चार करते हुए डुबकियाँ लगा रहे थे। किसी नाव पर दो बाँसों के बीच चादर बाँधकर अस्थायी पर्दा लगाया गया था, जिसकी आड़ में स्त्रियाँ कपड़े बदल रही थीं। पुरुषों के लिए कैसी आड़! आख़िर वे पुरुष हैं। उनके लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी।
ख़ैर, संगम में डुबकियाँ लगाते मानुष को देखकर बचपन से जन्मी आस्था बलवती हुई और ठंडे पानी में जो एक डुबकी लगाई तो न जाने मन में सकारात्मकता की कितनी ही उमंगें उठने लगीं। फिर एक के बाद एक कई डुबकियाँ स्वतः लगती रहीं।
दुनिया में पापी कौन नहीं है! जाने-अनजाने ही सही, कुछ न कुछ ग़लत होता ही है। जैसे हमारे कारण किसी मच्छर या चींटी का मरना जैन धर्म में पाप है। संगम में स्नान करके मेरे कौन-से पाप धुले, नहीं जानती; लेकिन कुछ तो था जिसने मन को सुकून दिया। अंततः उसी चादर से बने अस्थायी टेंट में कपड़े बदले। जानती हूँ, यह सब अकथनीय है, फिर भी मन कहता रहा कि यह कैसी श्रद्धा है! कैसा भरोसा है! कौन-सी पुकार है, जो गंगा, जमुना और सरस्वती नदियों के संगम को देखने, उसमें डुबकी लगाने और सूर्य को अर्घ्य देने के लिए सदियों से आदमी यहाँ आता रहा है।
दोनों हाथों में पतवार थामे ये नाविक एक दिन में न जाने कितने ही लोगों को संगम तक ले जाते हैं और फिर किनारे लाकर छोड़ देते हैं। उनके लिए यह सब नई बात नहीं थी, पर मेरे लिए यह नई बात थी। संगम को देखना नई बात थी। मैं गंगा-जमुना की लहरों को देख रही थी। दूसरी नावों में बैठे लोगों के चेहरों पर आते भावों को देख रही थी और इसी देखा-देखी में नाविक ने नाव किनारे पर लगा दी।
हम आगे बढ़े। यमुना नदी के तट पर ‘अकबर का क़िला’ था। हम वह देखने पहुँचे, लेकिन हमें मायूस लौटना पड़ा क्योंकि साल 1583 में अकबर द्वारा बनवाया गया यह क़िला अब भारतीय सेना के नियंत्रण में है। इसलिए इसे भली-भाँति देखना संभव नहीं हो पाया। परंतु वहाँ हमने ‘अक्षय वट’ देखा, जिसके बारे में मान्यता है कि इसे कितना ही नष्ट करने का प्रयास किया गया, यह फिर-फिर उगता रहा। साथ ही यह भी कहा जाता है कि भगवान राम ने यहाँ विश्राम किया था। पातालपुरी मंदिर—जो एक गुफ़ारूपी मंदिर है, वहाँ कई देवताओं की मूर्तियाँ थीं। मूर्तियाँ पत्थर की हैं और आस्था पत्थर में भगवान देखती है। मूर्तियों के आगे हाथ स्वतः जुड़ते रहे। पंडितजी इस जन्म के पापों से मुक्ति और भविष्य में सुखी-संपन्न जीवन के लिए आए दर्शनार्थियों से चढ़ावा चढ़ाने का आग्रह करते रहे। हर कोई जानता है कि आख़िर इस चढ़ावे से पंडितों का जीवन अधिक सुखी हो रहा था, पर लोग भविष्य के दुख से वर्तमान में डरते हैं। डर तो मुझे भी लगता है, किंतु मैंने चढ़ावा नहीं चढ़ाया।
क़िले के नज़दीक ही लेटे हुए पवनपुत्र हनुमान तथा अलोपी माता के मंदिर थे। अलोपी माता के मंदिर के बारे में मान्यता है कि यह एक सिद्धपीठ है। कहा जाता है कि यहाँ देवी सती की हथेली गिरी थी और अदृश्य हो गई थी। मंदिर में दर्शन करने वालों की लंबी कतारें थीं। हम दर्शन करके बाहर आए तो पाया कि मंदिरों के बाहर ही कई खोमचेवाले तथा गन्ने के जूसवाले थे। सूरज का जलवा बरक़रार था। हमने गर्मी से राहत पाने के लिए गन्ने का जूस पी लिया।
प्रयागराज में केवल मंदिर ही नहीं हैं, कुछ ऐसे ख़ास स्थान भी हैं जिन्हें लोग ज़रूर देखना चाहते हैं। उनमें ‘आनंद भवन’ सबसे ऊपर आता है। दूर से ही आकर्षित करता आनंद भवन का प्रवेश टिकट 80 रुपये का था। आनंद भवन, जो नेहरू परिवार का पुश्तैनी घर था, वर्तमान समय में एक संग्रहालय है। इसका प्रबंधन-कार्य जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फ़ंड द्वारा किया जा रहा है।
हमने वहाँ भवन में मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के कमरे देखे। कमरों में उनकी अलमारियाँ, पलंग और पलंग पर बिछी धुली हुई सफ़ेद चादरें देखीं। इसके अलावा दीवारों पर उनकी तस्वीरें, मेज़ पर रखी उनकी किताबें आदि ज्यों की त्यों देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो आज भी कोई बड़ा परिवार यहाँ निवास कर रहा हो। कहीं धूल का नामोनिशान नहीं था। दो-तीन गैलरियों में इंदिरा गांधी के बचपन, युवावस्था, कॉलेज, विवाह और उनके बच्चों (राजीव और संजय गांधी) के बाल्यकाल की तस्वीरें थीं। इसके अलावा इंदिरा गांधी की विभिन्न देशों की यात्राओं की तस्वीरें भी लगी थीं। ये मानो बोलती हुई तस्वीरें थीं। इन्हें देखकर यह विश्वास करना मुश्किल था कि हम इस समय देश के दो भूतपूर्व प्रधानमंत्रियों के घर में हैं। इसी आनंद भवन में बड़े-बड़े उद्यान थे। उद्यानों में रंग-बिरंगे फूल और बड़े-बड़े पेड़ थे। हरियाली मन मोह रही थी। एक कमरे में पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखी कई किताबें ख़रीदनेवालों के लिए रखी गई थीं। मैं उन किताबों को देखकर हतप्रभ थी कि राजनीतिक व्यस्तता भरे जीवन में कोई कैसे इतनी सारी किताबें लिख सकता है! यह समय-नियोजन का कितना अद्भुत उदाहरण है कि उन्होंने अपने लिखने के शौक़ को भी बरक़रार रखा।
यहाँ आने से पहले जब कभी किसी से आनंद भवन के बारे में सुनाती थी तो मन यहाँ आने के लिए मचल-मचल जाता था। अब जब इस आनंद भवन को देखा तो बहुत आनंद आया। पता चला कि इस भवन को इतना व्यवस्थित रखने के लिए एक बहुत बड़ा स्टाफ़ है, जो यहाँ की देखभाल करता है और इसी आनंद भवन के अंदर बने स्टाफ़ क्वार्टर्स में रहता है।
कहीं से लौटने के बाद, आख़िर में वहाँ की यादें ही साथ रहती हैं। इन्हीं यादों के लिए हमने आनंद भवन के कई फ़ोटोग्राफ खींचे। हम समय पर यहाँ पहुँचे तो कितना कुछ देख पाए, लेकिन कई ऐसे पर्यटक थे जो देर से आए। कम समय में कितना कुछ देखने से छूट जाता है, उन्हें देख मैं यह कल्पना कर रही थी।
हम आनंद भवन से बाहर आए और पास ही ऋषि भारद्वाज का मंदिर था। मान्यता है कि वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और सीता ने यहाँ विश्राम किया था। आध्यात्मिक दृष्टि से इस स्थान का ख़ूब महत्त्व है।
अभी हमारी लिस्ट में चंद्रशेखर आज़ाद उद्यान था। इस बीच ऑटोवाले से हमने गुज़ारिश की कि वहाँ जाने से पहले हमें दुपहर का खाना खिलवा दे। पेट की भूख से बड़ी कोई भूख नहीं। खाना खाने के बाद सुस्ती आना स्वाभाविक था, लेकिन दूसरे शहर में हमें सुस्ती ने नहीं सताया और हम चंद्रशेखर आज़ाद उद्यान पहुँचे। यहाँ भी प्रवेश टिकट था। यह वह स्थान था, जहाँ चंद्रशेखर आज़ाद ने स्वयं को गोली मारी थी। चंद्रशेखर जैसे लोग विरले ही होते हैं। बिना किसी प्रसिद्धि की चाह के ये लोग बस त्याग करना जानते हैं। वर्तमान में इन जैसे लोगों का नामलेवा कौन है, किसे ख़बर! हमने देखा कि उद्यान काफ़ी व्यवस्थित और साफ़ था। मुझे लगता है, इसका बड़ा कारण टिकट होना भी है। यहाँ भी बड़े और लंबे वृक्षों के अलावा विभिन्न प्रकार के ख़ूबसूरत फूल थे। बाहर से आने वाले पर्यटकों के अलावा यहाँ स्थानीय लोग भी थे।
उनमें कॉलेज के स्टूडेंट भी थे। सब अपने मोबाइल के कैमरे से फ़ोटो लेने में मशगूल थे। मुझे लगता है कि कई बार फ़ोटो लेने से कहीं बेहतर होता है उस स्थान विशेष को देखना। लोग फ़ोटो लेने के लिए कई बार बहुत कुछ देखने से वंचित रह जाते हैं। वैसे यह भी है कि स्मृतियों के लिए भी फ़ोटो लेना ज़रूरी होता है। यह मन ही मन सोच मैं मुस्कुराते हुए अपने ऑटो में बैठी तो ऑटोवाले भैया कहने लगे, “सुबह कब से निकले हैं और आप धीरे-धीरे देख रही हैं। थोड़ा जल्दी करा कीजिए।”
मैं उसकी स्थानीय भाषा में कही इस बात पर पहले तो हँसी, फिर कहा, “न जाने कितने वर्षों का सपना है, इसलिए जो तसल्ली से देखना है, वह तसल्ली से ही देखना होता है।” मैं जानती हूँ कि उसके लिए इस बात का शायद महत्त्व नहीं है, क्योंकि वह यहाँ का निवासी है। मेरे शहर अजमेर में मेरे लिए भी रोज़ पुष्कर जाना कहाँ संभव है और फिर उतनी दिलचस्पी भी नहीं है, क्योंकि अपने शहर को कभी भी देखा जा सकता है। लेकिन किसी और शहर को देखने का ढंग अलग होता है।
मैंने उसे इस बार जल्दी करने का भरोसा दिलाया तो वह भी मुस्कुरा पड़ा। अब हम ‘ख़ुसरो बाग़’ पहुँचे। मैं अब तक इस ख़ुसरो बाग़ को प्रसिद्ध सूफ़ी संत अमीर ख़ुसरो से जोड़ रही थी। उद्यान में किसी तरह का कोई टिकट नहीं था। यह उद्यान पुरातात्त्विक विभाग के नियंत्रण के अंतर्गत आता है। इस उद्यान के भीतर प्रवेश किया तो देखा, यहाँ दोनों तरफ़ खजूर के पेड़ थे। लेकिन उद्यान में लगी घास कहीं सूख रही थी, तो कहीं बहुत बढ़ गई थी और कहीं बिल्कुल ख़ाली ज़मीन थी। पतझड़ के कारण पेड़ों से टूटकर पत्ते बिखरे पड़े थे। यहाँ मुझे सफ़ाई का अभाव खटका। वैसे यह तो रखरखाव की बात थी। इस उद्यान को जहाँगीर ने बनवाया था और ख़ुसरो, जहाँगीर का बेटा था। यहाँ ख़ुसरो, उसकी बहन निसार बेग़म और माँ मानबाई (शाह बेग़म), जो राजा मानसिंह की बहन थीं, तीनों के अलग-अलग मक़बरे थे। मक़बरे भी सुंदर होते हैं, यह ताजमहल को देखकर कहा जा सकता है। हालाँकि इन मक़बरों का ताजमहल से कोई मुक़ाबला नहीं था, तथापि बलुआ पत्थर से बने इन मक़बरों की कारीगरी अद्भुत थी। ऊँचे चबूतरे पर बने इन मक़बरों की छतरियाँ देखने लायक़ हैं। इन मक़बरों के समीप ही उनसे संबंधित जानकारी लिखी थी। ख़ुसरो बाग़ काफ़ी विशाल है। यहाँ स्थानीय लोग टहलने भी आते हैं। किसी पर्यटक ने शौचालय के बारे में पूछा तो पता चला कि शौचालय पर ताला जड़ा है। कारण पूछा तो जवाब आया कि युवा शौचालय में अनुचित कार्य करते हैं। ‘अनुचित’ के आगे सब मौन हो गए। अनुचित कार्य को कितनी श्रेणियों में बाँटा जाए, इसके बारे में फिर कभी।
हम ख़ुसरो बाग़ से बाहर चले आए। शाम होने को थी और हम किसी तरह प्रयागराज की आरती देखना नहीं छोड़ सकते थे, इसलिए हमने ऑटोवाले से ऑटो तेज़ चलाने को कहा। वह मुस्कुरा रहा था। हम उसकी मुस्कुराहट का कारण समझ रहे थे। उसने सही समय पर हमें गंगा आरती वाले स्थान पर लाकर छोड़ दिया। हमने उसका मेहनताना दिया और वहाँ दर्शकों के लिए रखी बेंचों पर बैठ गए। धीरे-धीरे मजमा जमता गया और वहाँ इस अलौकिक, अद्भुत कार्यक्रम की शुरुआत शंख बजाकर की गई। माइक पर आरती गाते भक्तजन और आरती करते पंडितजन—ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हम किसी और ही दुनिया में पहुँच गए हों। ऐसे दृश्य को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। लगा, कोई शक्ति है जो हमें सकारात्मक जीवन जीने की ओर पुकार रही है। आँखें मूँदे बैठे रहे। आरती कब समाप्त हुई, घंटे-घड़ियाल कब बजना बंद हुए, पता ही नहीं चला। लेकिन यह जो भी था, वह बरसों ज़ेहन में रहेगा।
प्रसाद लेकर हमने गंगा माँ को प्रणाम किया। एक बार फिर ऑटो किया और ऑटोवाले को रेस्तराँ ले जाने को कहा। सुबह से निकले थे। हम बुरी तरह थक चुके थे। पेट में चूहे उछल-कूद करने लगे थे। रेस्तराँ में घर जैसा खाना तो नहीं था, लेकिन खाना स्वादिष्ट था। एक स्त्री को बिना परिश्रम के खाना मिल जाए, यह उसके लिए सबसे बड़ी बात है। पेट भरा और हम होटल चले आए। दूसरे दिन सुबह सात बजे की ट्रेन थी। थके लोग जब बिस्तर पर पड़े तो नींद ने अधिक इंतज़ार नहीं करवाया।
नींद के आगोश में जाने से पहले मैंने पति से कहा, “सुकून के ये डेढ़ दिन मैं भूल नहीं पाऊँगी। कभी फिर मौक़ा मिला तो प्रयागराज मैं ज़रूर आऊँगी।”
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