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पत्र : तुकाराम मुंढे के लिए : कार्रवाई के तमाशे का आकर्षण

आदरणीय तुकाराम मुंढे जी,

अभिनेता अनिल कपूर की एक फ़िल्म है ‘नायक’। आपने भी देखी ही होगी। इसमें एक पत्रकार एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनने की चुनौती स्वीकार करता है और चौबीस घंटे में इतने काम करता है कि सब कुछ नामुमकिन-सा लगता है। एक दृश्य में वह सरकारी राशन की दुकान का निरीक्षण करता है और तराज़ू में नीचे छिपे पेच को पकड़ लेता है। दुकानदार के ख़िलाफ़ कार्रवाई होती है, टाइपराइटर चलता है और जनता ख़ुशी से शोर मचाती है।

निरीक्षण हो चुका था। भ्रष्टाचार पकड़ा जा चुका था। नायक मिल चुका था।

इन दिनों आप चर्चा में हैं। महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन में आपके नेतृत्व में हो रहे निरीक्षणों और कंपनियों को जारी किए जा रहे नोटिसों की ख़बरें सामने आ रही हैं। अख़बार की भाषा में ‘शिकंजा कसा जा रहा है’, टीवी की भाषा में ‘कंपनियों पर गाज गिर रही है’ और मुहावरे की भाषा में कहें, तो कंपनियाँ ‘नप गईं’। लेकिन सोशल मीडिया की भाषा सबसे दिलचस्प है। वहाँ एक वाक्य घूम रहा है—“Country so cooked that a bureaucrat simply doing his job feels unusual.” यानी देश का हाल ऐसा है कि अफ़सर अपना काम कर दे, तो भी बड़ी बात लगती है।

मुंढे जी, इस वाक्य में आपकी प्रशंसा से ज़्यादा हमारी व्यवस्था पर टिप्पणी है। परीक्षा की तैयारी के दौरान मॉक इंटरव्यू में ईमानदारी के क़सीदे पढ़ने वाले कुछ युवा अधिकारी पद सँभालने के बाद भ्रष्टाचार के मामलों में पकड़े जाते हैं। दूसरी ओर कोई अधिकारी अपना काम ठीक से करे तो उसकी चर्चा होने लगती है। एक नागरिक होने के नाते आपकी सक्रियता देखकर मुझे प्रसन्नता होती है, लेकिन मैं यह भी पूछना चाहता हूँ कि क्या इस देश में हर सुधार को निरीक्षण का इंतज़ार है?

निरीक्षण होगा तभी सड़क की ख़स्ता हालत सुधरेगी। निरीक्षण में ही पता चलेगा कि सरकारी अस्पताल का वॉटर कूलर सदियों से ख़राब पड़ा है। निरीक्षण वाले दिन सड़क के किनारे चूना डाला जाएगा। तभी सबको कॉकरोच दिखाई देंगे। सरकारी स्कूल के मिड-डे मील में भी निरीक्षण वाले दिन पानी कम और दाल ज़्यादा होगी।

निरीक्षण हो चुका था। चोरी पकड़ी जा चुकी थी। गाज गिर चुकी थी।

इस देश में अब तक करोड़ों निरीक्षण हो चुके हैं, लाखों चोरियाँ पकड़ी जा चुकी हैं और हज़ारों ठेकेदारों पर गाज गिर चुकी है। फिर भी यह वही देश है, जहाँ कंपनियों के दावों की ऐसी होड़ है कि देसी घी का ‘101 प्रतिशत शुद्ध’ होना ही बाक़ी रह गया है; जहाँ दूध वाले पनीर की तुलना में बिना दूध का पनीर ज़्यादा बिक जाता है; जहाँ तरबूज़ में इंजेक्शन लगाए जाने की ख़बरें सामने आती हैं और रेहड़ियों पर बिसलेरी की जगह ‘Bislei’, ‘Bilseri’ जैसे नामों वाली बोतलें दिखाई देती हैं।

यहाँ ज़ब्त, ध्वस्त और रद्द जैसे शब्द भी एक तरह की ‘फ़ैंटेसी’ का हिस्सा हो गए हैं। किसी का घर बुलडोज़र से ध्वस्त होता है, तो दूर बैठा व्यक्ति उसे न्याय की तरह देखता है। किसी दुकान से सामान ज़ब्त होता है, तो पड़ोसी दुकानदार की बाँछें खिल जाती हैं। कोई आदेश रद्द होता है, तो सबको मज़ा आ जाता है। कार्रवाई का दृश्य इतना आकर्षक हो गया है कि उसके परिणाम और प्रक्रिया पर विचार करना पीछे छूट जाता है।

‘इस मुल्क़ ने हर शख़्स को जो काम था सौंपा, उस शख़्स ने उस काम की माचिस जला के छोड़ दी!’ ये बोल अनुराग कश्यप की 2009 में आई फ़िल्म ‘गुलाल’ में पीयूष मिश्रा बोले थे। तब हम ढूँढ़ रहे थे कि इसे किसने लिखा होगा। आज, क़रीब 17 साल बाद, हालत यह है कि हम इसे हर जगह फ़िट कर सकते हैं।

समस्या यह बिल्कुल नहीं कि आपके नेतृत्व में विभाग सक्रियता से निरीक्षण कर रहा है। समस्या यह है कि इस निरीक्षण को असाधारण घटना माना जा रहा है। चेक्स ऐंड बैलेंसेज़ ज़रूरी हैं, औचक जाँच भी ज़रूरी है और गड़बड़ी करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई भी। लेकिन अगर व्यवस्था को ठीक रखने के लिए हर बार किसी ईमानदार अधिकारी के निरीक्षण की ज़रूरत पड़े, तो क्या हमने वास्तव में कोई व्यवस्था बनाई है?

यही तमाशा दूसरे मामलों में भी दिखाई देता है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अधिकारी समीर वानखेड़े द्वारा अभिनेता शाहरुख़ ख़ान के बेटे आर्यन ख़ान को एक क्रूज पर कथित तौर पर आयोजित रेव पार्टी से जुड़े मामले में पकड़े जाने के बाद कितने दिन तक ड्रामा चला, यह सबको मालूम है। शाहरुख़ के घर ‘मन्नत’ में साँस लेने तक की घटना ख़बर बन गई थी। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद मीडिया ट्रायल में आरोपी का पीछा करती कारें और सार्वजनिक होती निजी वॉट्सऐप चैट्स भी इसी तमाशे का हिस्सा थीं।

अराजकता में अपनी कुंठा निकालने की गुंजाइश बहुत होती है। जब चारों ओर शोर हो तो आपकी हूटिंग किसको दिखाई दे रही है? इस तमाशे के भी स्तर हैं। आप कार में बैठे हैं तो लाल बत्ती पर ई-रिक्शा वाले पर लाठी भाँजता पुलिसकर्मी व्यवस्था बनाए रखता हुआ दिखाई दे सकता है। अतिक्रमण-विरोधी अभियान में दुकानें हटाई जाएँ, तो ठीक लगता है; गला तब सूखता है, जब सड़क चौड़ीकरण में अपने घर का छज्जा भेंट चढ़ता है। दूसरों पर हुई कार्रवाई हमें न्याय लगती है, अपने ऊपर आई कार्रवाई अन्याय।

कार्रवाई के परिणाम से ज़्यादा, कार्रवाई का दृश्य हमारे सार्वजनिक विमर्श में आकर्षक हो गया है। हम यह कम पूछते हैं कि कार्रवाई के बाद क्या बदला, गड़बड़ी दुबारा हुई या नहीं और उसे रोकने के लिए कोई स्थायी व्यवस्था बनी या नहीं।

ख़ैर, बात फ़िल्म में एक अधिकारी के सही तरीक़े से काम करने पर उसे नायक बना देने की हमारी आदत पर सोचते हुए शुरु हुई थी तो राजकुमार राव की 2017 में आई फ़िल्म ‘न्यूटन’ का एक संवाद याद आता है :

“तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है, न्यूटन, पता है?”

“मेरी ईमानदारी?”

“नहीं, ईमानदारी का घमंड!”

नैतिक शिक्षा की किताबों का सार यही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की सफलता इस बात में नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने घोटाले पकड़े गए, कितने नोटिस जारी हुए, कितना सामान ज़ब्त हुआ या कितने घरों पर बुलडोज़र चला। असली सफलता तो तब होगी, जब इन सबकी ज़रूरत ही कम पड़ती जाए। जब नियमों का पालन किसी निरीक्षण की आशंका से नहीं, बल्कि व्यवस्था की नियमित कार्यप्रणाली से होने लगे। जब नागरिक को अपना काम कराने के लिए किसी 'नायक' की तलाश न करनी पड़े।

मुंढे जी, आपकी सक्रियता से उम्मीद है कि गड़बड़ियाँ सामने आएँगी और जवाबदेही तय होगी। लेकिन उम्मीद इससे भी आगे की है कि एक दिन किसी अधिकारी के अपना काम करने पर चर्चा न करनी पड़े, क्योंकि वह कोई असाधारण घटना ही नहीं रह जाएगी।

वरना हम हर कुछ साल में एक नया ‘नायक’ ढूँढ़ते रहेंगे और वाक्य यही रहेगा : निरीक्षण हो चुका था। नायक मिल चुका था। ताली बज चुकी थी।

शुभकामनाओं सहित,
शशांक

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